मायावती सरकार की साख पर चोट

किसानों के साथ मायावती (फ़ाइल फ़ोटो)

ऊपरी तौर पर देखने से लगता है कि ग्रेटर नोएडा में ज़मीन अधिग्रहण अधिग्रहण रद्द करने का फ़ैसला बिल्डर्स और फ़्लैट ख़रीदने वालों के ख़िलाफ़ है.

लेकिन टीकाकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय वास्तव में माया सरकार की साख पर चोट है.

विधान सभा चुनाव अब कुछ महीने बाक़ी हैं, इसलिए ज़ाहिर है कि विपक्ष को सरकार पर हमले का एक और मज़बूत हथियार मिल गया है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मौखिक टिप्पणी में मुख्य बात यह है कि ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी यानी उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से किसानों को सुनवाई का मौक़ा दिए बग़ैर 'तत्काल ज़रुरत' यानी 'अर्जेंसी' के आधार पर ज़मीन अधिग्रहण करना सरकार को मिली शक्तियों का दुरूपयोग है.

दूसरे यह कि जिस औद्योगिक विकास का उद्देश्य दिखाकर ज़मीन ली गई, वह धोखा था और असली उद्देश्य बिल्डर्स को फ़ायदा पहुंचाना था.

भट्टा परसौल

भट्टा परसौल में मई में हुई घटना ने भूमि अधिग्रहण के सवाल को गहरा दिया है

इसका सीधा मतलब है कि ज़मीन अधिग्रहण का फ़ायदा पाने वाली कंपनियों और सरकार चलने वालों के बीच कहीं न कहीं नापाक गठजोड़ है यानी भ्रष्टाचार हुआ है.

तीसरी बात यह कि अगर किसान उचित मुआवज़ा पाने के लिए आंदोलन करता है तो उन्हें लाठी-गोली और गिरफ़्तारी मिलती है और महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है.

दरअसल इसमें केवल किसानों के साथ अन्याय नहीं हुआ है , जिन लोगों ने प्रस्तावित बहुमंज़िली रिहायशी कालोनियों में बैंक से कर्ज़ , प्राविडेंट फंड से उधार लेकर या जेवर बेचकर पैसा लगाया वे लोग भी ठगे गए हैं.

वे इस धोखे का शिकार इसलिए हुए क्योंकि इन बिल्डर्स ने अपनी योजनाओं पर ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी यानी उत्तर प्रदेश सरकार की मोहर लगा रखी थी.

विपक्ष का कड़ा रुख़

उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार ने अब तक गंगा एक्सप्रेस-वे , यमुना एक्सप्रेस-वे और ताज कॉरिडोर वे के नाम पर टाउनशिप बनाने का लाइसेंस पूंजी वाले घरानों को बांटा है. किसानों से सस्ती ज़मीन लेकर बिल्डरों को देने में सरकार ने बिचौलिए का काम किया है और अपना कमीशन बनाया है

अहमद हसन, प्रवक्ता, समाजवादी पार्टी

सुप्रीम कोर्ट ने जितनी कड़ी टिप्पणी कर दी है उसके बाद तो विपक्ष को यह कहने का और मौक़ा मिल गया है कि कंपनी वाले मायावती की सरकार चला रहे हैं.

विधान परिषद में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के नेता अहमद हसन ने एक बयान में कहा है,"उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार ने अब तक गंगा एक्सप्रेस-वे , यमुना एक्सप्रेस-वे और ताज कॉरिडोर वे के नाम पर टाउनशिप बनाने का लाइसेंस पूंजी वाले घरानों को बांटा है. किसानों से सस्ती ज़मीन लेकर बिल्डरों को देने में सरकार ने बिचौलिए का काम किया है और अपना कमीशन बनाया है."

उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव ने एक बयान में कहा,"राहुल गांधी की भट्टा-परसौल से शुरू की गई पदयात्रा से बुरी तरह डरी, सहमी एवं घबराई हुई मायावती सरकार के मुंह पर उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय करारा तमाचा है, जो लगातार धोखाधड़ी और छल का सहारा लेकर किसानों की ज़मीनों को सस्ते दामों में अधिग्रहीत करके हजारों करोड़ रूपये की कमीशनखोरी और वसूली करके बिल्डरों और भू-माफियाओं को बेच रही थी."

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा, "एक ओर तो छले गए किसानों को उनकी ज़मीन वापस मिलेगी वहीं दूसरी ओर साज़िश के तहत किसानों की ज़मीनें हड़पकर बड़े पूंजीपतियों, बिल्डरों और भू-माफियाओं को हस्तांतरित करने के मायावती सरकार की साज़िशों पर अंकुश लगेगा."

आरोप-प्रत्यारोप

पदयात्रा पर राहुल गांधी

राहुल गांधी पदयात्रा करके किसानों से मिल रहे हैं

कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपनी पदयात्रा में भी मायावती सरकार की ओर से किसानों के साथ अन्याय और कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने की बात कह रहे हैं.

जहाँ मुख्यमंत्री मायावती ने आम आदमी तो क्या अपनी पार्टी के विधायकों और मंत्रियों से भी दूरी बना रखी है, राहुल गांधी सीधे आम आदमी के बीच जाकर उनसे भावनात्मक रिश्ता जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने तो ज़मीन अधिग्रहण घोटाले पर बाक़ायदा श्वेत पत्र जारी किया है.

बहुजन समाज पार्टी के प्रवक्ता ने कहा है, "उनका किसान प्रेम मात्र एक दिखावा है और उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनाव को देखते हुये यह राजनीतिक ड्रामेबाजी कर रहे हैं."

मायावती सरकार हर बार केवल यही बात कह रही है कि केन्द्र पुराना ज़मीन अधिग्रहण कानून बदले.

मायावती यह भी कह रही है कि राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश में पदयात्रा की नौटंकी न करके दिल्ली जाकर भूमि अधिग्रहण कानून बदलवाएं और डीज़ल का बढ़ा दाम वापस कराकर किसानों को राहत दिलाएं.

नई नीति पर भी सवाल

किसानों का आंदोलन

जगह-जगह किसान ज़मीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं

लेकिन यहाँ सवाल क़ानून बदलने से ज़्यादा उसे लागू करने में निजी स्वार्थ और बदनीयती का है.

ख़बरें है माया सरकार ने अपनी नई अधिग्रहण नीति में कंपनियों की ओर से क़रार नियमावली के तहत सीधे किसानों से ज़मीन खरीदने का जो प्राविधान किया है उसमें भी सरकारी मशीनरी किसानों पर ज़ोर ज़बरदस्ती करके कंपनी को ज़मीन दिलवा रही है.

जानकार लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश नज़ीर बन गया है और अभी प्रदेश भर में दूसरे स्थानों पर ज़मीन अधिग्रहण के जो मामले अदालत में चल रहे हैं , उनमे भी माया सरकार को झटका लग सकता है.

इनमें इलाहाबाद की करछना बिजली परियोजना, यमुना एक्सप्रेस-वे , गंगा एक्सप्रेस-वे के अलावा लखनऊ एवं दूसरे बड़े शहरों में प्रस्तावित हाई-टेक सिटी परियोजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं.

राजनीतिक नुक़सान

मायावती और बहुजन समाज पार्टी कि सबसे बड़ी पूँजी यह थी कि दलित और ग़रीब उन्हें अपना हितैषी समझता था.

लेकिन बलिया से नोएडा तक भूमि अधिग्रहण की जो कार्रवाई चार सालों से चल रही है उसमें छोटे किसान और भूमिहीन खेतिहर मज़दूर भी प्रभावित हो रहे हैं.

मायावती

मायावती को अगले साल विधानसभा चुनाव का सामना करना है

पिछले लोक सभा चुनाव के परिणामों पर नज़र डालें तो साफ़ दिखता है कि बहुजन समाज पार्टी को बलिया से गौतम बुद्धनगर तक उन अधिकांश सीटों पर हार का सामना करना पड़ा जो प्रस्तावित गंगा एक्सप्रेस-वे योजना का इलाक़ा है.

पश्चिम में तो इस समय पांच एक्सप्रेस-वे योजनाएँ प्रस्तावित हैं.

अकेले यमुना एक्सप्रेस-वे में छह ज़िलों के लगभग बारह सौ गाँव प्रभावित हैं.

पूरे प्रदेश में कई हजार गाँव हैं जो उत्तर प्रदेश सरकार की ज़मीन अधिग्रहण की कार्रवाई से प्रभावित हैं.

बिल्डर्स और कंपनी वाले शायद अभी तक इस भरोसे में थे कि पहले की तरह मायावती सरकार सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत दिला देंगीं. मगर ऐसा नहीं हो पाया.

चर्चा तो यह भी है कि न्यायमूर्ति के जी बालाकृष्णन के ज़माने में मायावती के सर पर अदालत का हाथ था. अब वह स्वयं जांच के घेरे में हैं.

सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक तरह से माया सरकार के लिए खतरे की घंटी है.

सरकार संभलना चाहे तो नौकरशाही को किनारे करके प्रभावित किसानों से सीधे बात करे उनकी समस्याओं का समाधान करे या फिर चुनाव में राजनीतिक नुक़सान उठाने के लिए तैयार रहे.

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