ट्विटर से मदद की कोशिश

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Image caption ट्विटर का गूगल डॉक्युमेंट जिसे लोग लगातार अपडेट कर रहे थे

मुंबई में कल हुए बम धमाकों के बाद भारी अफ़रा-तफ़री फैल गई, सड़कों पर ट्रैफ़िक रुक गया, एक साथ हज़ारों लोगों के मोबाइल इस्तेमाल करने की वजह से नेटवर्क जाम हो गया, ऐसी हालत में मुंबई के लोगों ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स की मदद ली.

दो घंटे के ही भीतर ट्विटर पर एक पन्ना उपलब्ध था जिस पर ज़रूरी टेलीफ़ोन नंबर तो थे ही, ऐसे लोग भी अपने लैंडलाइन फ़ोन नंबर के साथ संदेश भेज रहे थे जो ज़रूरतमंद लोगों की सहायता करना चाहते थे.

अंधेरी में रहने वाले डॉक्टर प्रदीप वडगांवकर ने संदेश लिखा कि अगर किसी को मेडिकल सहायता चाहिए तो उनसे संपर्क किया जा सकता है, घाटकोपर में रहने वाले मिहिर ने लिखा कि उनके घर का दरवाज़ा खुला है और जो लोग अपने घर नहीं पहुँच सकते वे उनके यहाँ खा और सो सकते हैं.

वसई के नरेंद्र रावत ने संदेश भेजा कि उनका ब्लड ग्रुप ओ पाज़िटीव है और वे रक्तदान करने के लिए तैयार हैं, इसी तरह माहिम के योगेश्वर ने संदेश भेजा कि वे अपनी कार से किसी ज़रूरतमंद को उसके ठिकाने तक पहुँचा सकते हैं.

इसी तरह की मदद की पेशकश करने वाले प्रशांत कोहली इस प्रयास के बारे में बताते हैं, "जब धमाका हुआ तो मैं फेसबुक पर था, वहाँ से मुझे पता चला कि एक ऐसा पेज है जिस पर लोग मदद करने के लिए अपना नाम और फ़ोन नंबर लिख रहे हैं तो मैंने भी अपना नाम दर्ज कर दिया, मुझे लगा कि ऐसी हालत में बैठकर सरकार को कोसना आसान है लेकिन हमें भी तो कुछ करना चाहिए."

'मुंबईकर स्पिरिट'

धारावी में रहने वाले कुणाल का कहना है कि मुंबई में इतने हमले हो चुके हैं कि वे अपने अनुभव से जानते हैं कि लोगों को ऐसे मौक़ों पर कितनी मदद की ज़रूरत होती है,"मैंने 1983 और उसके बाद हुए धमाके देखे हैं, लोगों को बहुत मदद की ज़रूरत होती है और ऐसी हालत में आम नागरिकों को अपनी भूमिका निभानी चाहिए."

यह कहना मुश्किल है कि इस तरीक़े से मदद माँगने और मदद देने की पेशकश से असल में कितना फ़र्क़ पड़ा, जिन तीन-चार लोगों से बीबीसी हिंदी ने बात की उनमें से किसी को सचमुच कुछ करने की ज़रूरत नहीं पड़ी लेकिन उन्होंने एक तरह का जोखिम लेकर अपने घर का दरवाज़ा अनजान लोगों के लिए खोल दिया था.

कुणाल कहते हैं कि मुंबई के लोग ऐसे मौक़ों पर इन बातों की परवाह नहीं करते, वे कहते हैं, "लोगों में बेचैनी थी कि वे किस तरह संकट की इस घड़ी में अपने महानगर के काम आएँ, यह मुंबईकर स्पिरिट है, यहाँ के लोग बहुत मददगार हैं, वे भावुक होकर अपने लोगों को अपने घर बुला रहे थे उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि इसका दुरुपयोग भी हो सकता है, यह अपने बारे में सोचने का मौक़ा नहीं था."

मुंबई के धमाकों के चंद घंटों के भीतर आम नागरिकों का इस तरह संगठित होना यही दिखाता है कि लोगों में कुछ करने की बेचैनी थी और अब उस बेचैनी को अभिव्यक्त करने का एक तरीक़ा उन्हें मिल गया है.

दूसरे ये भी कि ऐसी परिस्थितियों में फ़ेसबुक और ट्विटर के इस्तेमाल की अपार संभावनाओं का अंदाज़ा मिलता है, जैसे जैसे इनका इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़ेगी, असर भी बढ़ेगा.

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