एक कंपनी ऐसी भी !

  • 24 अक्तूबर 2013
विकलांग
सरकार ने विकलांगों को नौकरियों में तीन फीसदी आरक्षण दिया है, लेकिन विकलांगों को आमतौर पर नौकरियां नहीं दी जातीं.

रोज़मर्रा की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में जितनी जद्दोजहद आगे निकलने की है उतना ही डर इस बात का भी है कि कहीं हम पीछे न छूट जाएं.

लेकिन आगे से आगे बढ़ने की होड़ में शायद ही कभी उन लोगों का ख्याल हमारे ज़ेहन में आता है जो शारीरिक रुप से विकलांग हैं और शायद इस दौड़ का हिस्सा भी नहीं.

आज मुलाक़ात गुजरात के निशीथ मेहता से जिन्होंने अपनी कंपनी के ज़रिए विकलांगों को मुख्यधारा से जोड़ने का एक नायाब तरीक़ा इजाद किया है.

''मेरा नाम निशीथ मेहता है और मैं गुजरात के भावनगर ज़िले में रहता हूं. साल 1978 में मैंने ‘माइक्रो साइन’ नामक कंपनी की शुरुआत की जिसमें ऑटो और इलैक्ट्रॉनिक क्षेत्र के लिए प्लास्टिक और फ़ाइबर के कल-पुर्ज़े बनाए जाते थे.

निशीथ की कहानी सुनने के लिए क्लिक करें

कुछ ही सालों में मेरी कंपनी ने बीएचईएल, पवन हंस हेलिकॉप्टर्स और लारसेन एंड टुब्रो जैसी नामी कंपनियों के साथ काम करना शुरु कर दिया.

लेकिन लगातार मिल रही ये सफलता भी मुझे अधूरी लग रही थी. मेरा मानना है कि पैसा कमाना एक बात है लेकिन समाज के साथ उसे बांटकर ही हम अपने इंसान होने का परिचय दे सकते हैं.

मैं अपनी कामयाबी को उन लोगों के साथ बांटना चाहता था जिन्हें ज़िंदगी ने इस तरह आगे बढ़ने का मौक़ा नहीं दिया.

मैंने देखा कि भावनगर में कई ऐसे स्कूल हैं जहां मानसिक और शारीरिक रुप से विकलांग लोगों को पढ़ाया-सिखाया जाता है लेकिन इन स्कूलों से निकलने के बाद उनके लिए मुख्यधारा से जुड़ने का कोई ज़रिया नहीं.

सरकार ने भले ही विकलांगों को नौकरियों में तीन फीसदी आरक्षण दिया हो लेकिन सच ये है कि विकलांगों को शायद ही कभी नौकरियां मिल पाती हैं.

नायाब तरीका

मैंने इन लोगों को अपनी कंपनी में नौकरी देने का फ़ैसला किया और उनके लिए काम आसान बनाने के लिए एक नायाब तरीक़ा अपनाया.

हमने व्यक्ति में विकलांगता के आधार पर उसकी ताक़त को तलाशना शुरु किया और उन्हें ऐसी जगहों पर काम के लिए रखा जहां वो आसानी से काम कर सकें.

मसलन ऐसी जगह जहां मशीनों का ज़बर्दस्त शोर हो और सामान्य व्यक्ति के लिए ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो वहां हमने मूक-बधिर लोगों को काम दिया.

इन लोगों के लिए यहां काम करना आसान था और इस तरह की इकाई में उन्हें बोलने या सुनने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

एक प्रयोग के तौर पर शुरु की गई मेरी इन कोशिशों ने बेहतरीन परिणाम दिए.

कुछ साल पहले हमारे साथ जुड़े धर्मेंद्र शाह कहते हैं, ''बचपन में ही मुझे पोलियो हो गया था और मेरे दोनों पैर बेकार हो गए. मैं जब निशीथ जी के पास आया तो मेरी हालत बहुत ख़राब थी. मैं चल फिर नहीं सकता था इसलिए उन्होंने मुझे अकाउंट्स विभाग में काम दिया जहां चलना-फिरना नहीं होता. अब काफ़ी कुछ सीख गया हूं और बढ़िया काम कर रहा हूं.''

मेरी कंपनी में हर किसी के लिए कोई न कोई काम मौजूद है.

बराबरी का हक़

भावनगर की ही रहने वाली मीना शाह जब ‘हाईपर एक्टिविटी’ नामक मानसिक विकार से पीड़ित अपने बेटे को लेकर मुझसे मिलीं तो मैं समझ गया कि उसकी ज़रूरत हमारी कंपनी के प्रोडक्शन विभाग को है.

ये वो विभाग है जहां बहुत तेज़ी से काम करना होता है और बहुत ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है.

मीना कहती हैं, ''मेरा बेटा अब कंपनी के काम में इतना रम गया है कि उसका घर में मन नहीं लगता. पहले लोग उस पर हंसते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होता. उसमें आत्मविश्वास भी आ गया है. सबसे बड़ी खुशी है कि अब वो ख़ुद अपनी ज़रूरतों के लिए पैसे कमा रहा है.''

मैं इन लोगों को किसी भी रुप में अपनी कंपनी के लिए बोझ नहीं मानता क्योंकि जितना मैंने इनके लिए किया है उससे कहीं ज़्यादा फ़ायदा इन लोगों ने मुझे पहुंचाया है.

इन लोगों की कोई मांग नहीं होती और थोड़े से प्रोत्साहन के बदले ये लोग दिल लगाकर काम करते हैं. इन लोगों के आने से मेरी कंपनी का मुनाफ़ा और उत्पादन क्षमता दोनों बढ़ी हैं.

यहां तक की अब जब भी मेरी कंपनी में लोगों की ज़रूरत होती है मैं ये सोचता हूं कि किस तरह की विकलांगता के व्यक्ति को नौकरी पर रखा जाए.

मैं चाहता हूं कि इस तरह के प्रयोग देशभर में हों क्योंकि किसी भी कंपनी के लिए ये घाटे का सौदा नहीं.

यही इस प्रयोग की सबसे बड़ी सफलता भी है कि ये कोशिश दया और भीख पर नहीं बल्कि बराबरी के हक़ पर टिकी है.''

निशीथ की तरह अगर आपने भी समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए कोई पहल की है तो आप भी अपनी कहानी हमसे बांट सकते हैं. अपनी प्रतिक्रियाएं और अपनी कहानियां हम तक पहुंचाने के लिए संपर्क करें. parul.agrawal@bbc.co.uk पर.

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