गोरखालैंड के लिए त्रिपक्षीय समझौता

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Image caption गोरखालैंड की स्थापना के लिए हिंसक आंदोलन हुए हैं.

पश्चिम बंगाल के नेपाली भाषी-बाहुल्य दार्जिलिंग में गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन की स्थापना के लिए केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल हुकुमत और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बीच सोमवार को एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किया गया.

गोरखा मुक्ति मोर्चा पिछले कुछ सालों से नेपाली भाषियों के लिए पश्चिम बंगाल से अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन चलाता रहा है.

दार्जिलिंग के सुकना में हुए समझौते पर हस्ताक्षर किए जाते समय केंद्रीय गृह मंत्री, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के रोशन गिरी वहां मौजूद थे.

केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि क्षेत्रीय प्रशासन को बहुत व्यापक अधिकार दिए गए हैं और उनके पास रोज़मर्रा के काम काज से संबंधित लगभग सभी विभाग मौजूद हैं.

मगर साथ ही साथ उन्होंने रोशन गिरी को ये सलाह भी दी कि जिस तरह भारत विविधता का देश है उसी तरह गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन के भातर पड़ने वाले इलाक़ों मे विभिन्न भाषाई, जातीय और संसकृति से तालुक्क़ रखनेवाले लोग हैं और नए प्रशासन को उन सभों का आदर करना चाहिए.

हालांकि अभी तक क्षेत्रीय प्रशासन की रूपरेखा को लेकर काफ़ी बातें साफ़ नहीं है लेकिन कहा जा रहा है कि इसमें 45 निर्वाचित और पांच मनोनीत सदस्य होंगे.

लेकिन इसके पास क़ानून बनाने का कोई अधिकार नहीं होगा.

पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि नई व्यवस्था को लागू करने के लिए विधान सभा में एक विधेयक लाया जाएगा.

ममता बनर्जी ने एक समीति के गठन की भी घोषणा की है जो तराई और दोआर्स के कुछ इलाकों को गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन के भीतर लाने के मामले पर अपना सुझाव देगी.

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Image caption गोरखालैंड में पहले भी इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं.

विरोध में बंद

गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन की स्थापना के लिए दार्जिलिंग में होनेवाले त्रिपक्षीय समझौते के विरोध में पश्चिम बंगाल के दूसरे इलाक़ों में 48 घंटो का बंद जारी है.

ये बंद राज्य के मैदानी इलाक़ों में मौजूद संस्थाओं, आमरा बंगाली, जन जागरण, जन चेतना ने आयोजित किया है. ये संस्थाएं क्षेत्रीय प्रशासन क़ायम किए जाने के विरूद्ध हैं और उनका मानना है कि समझौता नई समस्याओं को जन्म देगा.

नई व्यवस्था दो दशक पहले बनाई गई गोरखा हिल कांउसिल की जगह बनाई जा रही है. हालांकि गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन के पास हिल कांउसिंल के मुक़ाबले ज़्यादा अधिकार होंगे.

ख़बर है कि दार्जिलिंग के मैदानी इलाक़ों, और पड़ोसी ज़िले जलपाईगुड़ी के कई इलाक़ो में समझौते के विरोध में दुकानें बंद हैं और सड़कों पर वाहनो की आवाजाही नहीं के बराबर है.

समाचार एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि बंद का असर दोआर्स क्षेत्र के चाय बग़ानों में काम-काज पर भी पड़ रहा है.

इस क्षेत्र में बंद को स्थानीय अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद का समर्थन हासिल है. परिषद दोआर्स और तराई के क्षेत्रों को गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन में लाए जाने का विरोध कर रहा है.

नई दिक्क़तें

पश्चिम बंगाल की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी सरकार में मंत्री रह चुके अशोक भट्टाचार्य मानते हैं कि जिस तरह से दार्जिलिंग के अलावा तराई और दोआर्स के इलाक़ों के कुछ हिस्सों को भी गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन में मिलाने की बात हो रही है उससे नई दिक़्कतें पैदा हो सकती है.

नए समझौते के तहत एक समिति बनाई जाएगी जिसे इन क्षेत्रों को प्रशासन में मिलाए जाने पर अपनी राय देने को कहा जाएगा.

अशोक भट्टाचार्य कहते हैं, "तराई और दोआर्स के इलाक़ो को गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन में लाए जाने से इन इलाक़ो में मौजूद आदिवासियों, बंगालियों, बोडो और राजवंशी समाज के लोगों के मन में निराशा पैदा होगी, जिससे समस्या के समाधान की बजाए नई दिक़्कते उपजेंगी."

उनका आरोप है कि ममता बनर्जी ने अपनी छवि को बेहतर बनाने के लिए राज्य के हितों को ताक़ पर रख दिया है.

गोरखालैंड की समस्या का हल ममता बनर्जी के चुनावी वायदों में से एक था.

राजनीतिक दलों का कहना है कि ममता बनर्जी ने उसे पूरा करने के लिए दूसरे दलों को नज़रअंदाज़ किया है और इस मसले पर पूरी तरह से विचार विमर्श नहीं किया गया है.

पहाड़ी क्षेत्र में मज़बूत बताई जानेवाली कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ रेवोल्यूशनरी मार्कसिस्ट के नेता आरबी राय का कहना है कि नया समझौता नेपाली भाषी लोगों को उनकी पहचान नहीं देगा जो भाषा के आधार पर नई राज्य की स्थापना का उद्देश्य रहा है.

आरबीराय कहते हैं, "नेपाल की सीमा के पास रहने से लोग हमें वहां का मानते हैं, जबकि हमारे पूरखे भी यहीं के मूल निवासी थे. हम भारत की फौज में हैं, लगभग हर सूबे में मौजूद हैं लेकिन हमारे ऊपर विदेशी का ठप्पा इसीलिए है क्योंकि हमारा अलग राज्य नहीं है. ये समझौता उस समस्या का निदान नहीं करता है."

अनदेखी

गोरखालैंड की स्थापना के लिए लंबे समय से आंदोलन कर रहे अखिल भारतीय गोरखा लीग और सुभाष घीसिंग के गोरखा लिबरेशन फ्रंट जैसी संस्थाएं इसलिए भी नाराज़ हैं क्योंकि केंद्र और राज्य सरकार ने सिर्फ गोरखा जनमुक्ति मोर्चो को ही समझौते का हिस्सा बनाया है.

गोरखा लीग ने ही भारत की आज़ादी के बाद से गोरखा मूल के लोगों का सवाल उठाया था और सुभाष घीसिंग के 1980 के दशक में चलाए गए हिंसक आंदोलन के बाद 1988 में अर्ध-स्वायतशासी दार्जिलिंग गोरखा हिल काऊंसिल का गठन किया गया था.

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का निर्माण 2008 में हुआ लेकिन तबसे वो अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन में आगे आगे रही है.

मिल रही सूचना के मुताबिक़ नए समझौते के तहत गोरखालैंड प्रशासन के पास 54 विभाग होंगे जिसके तहत भूमि के मामले की देख-रेख का अधिकार भी शामिल है.

इस बीच घोषणा की गई है कि केंद्र सरकार क्षेत्रीय प्रशासन को 600 करोड़ रूपयों की आर्थिक मदद देगी.

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