ज़हरीले साँप ले रहे हैं जान

जंगल

छत्तीसगढ़ में हर साल सर्प दंश यानी साँप के काटने से औसतन 1000 से 1500 लोगो की मौत हो जाती है. साँप के काटने का ज़्यादातर शिकार ग्रामीण लोग होते हैं.

यह संख्या इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि राज्य के सुदूर अंचलों में रहने वाले लोग आज भी साँप के काटने पर झाड़-फूँक और जड़ी-बूटियों का सहारा ही लेते हैं.

ये आंकड़े सामाजिक क्षेत्र में काम कर रही संस्था जन-स्वास्थ सहयोग ने जुटाए हैं.

संस्था का कहना है कि आंकड़े छपी रिपोर्टों और उनके कार्यक्रताओं के नेटवर्क के माध्यम से इकट्ठी की गई हैं. यहां ये बता देना ज़रूरी है कि सरकारी स्तर पर इस मामले पर कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.

बरसात के मौसम में तो हालात और भी ख़राब हो जाते हैं. हालाँकि यह आंकड़े अनुमान पर आधारित हैं क्योंकि अभी तक साँप काटने से हो रही मौतों का कोई सरकारी आकलन नहीं हुआ है, लेकिन राज्य में स्वास्थ्य सेवा से जुड़े लोग मानते हैं कि सर्पदंश एक गंभीर मामला है.

छत्तीसगढ़ के जशपुर ज़िले का फरसाबहार का इलाक़ा नागलोक के नाम से जाना जाता है. ऐसा माना जाता रहा है कि इस इलाक़े की आबोहवा और मिट्टी साँपों के प्रजनन के लिए काफी उपयुक्त हैं इसलिए यहाँ ज़्यादातर ज़हरीले सापों की बड़ी तादात है.

जशपुर के इस इलाक़े से गुज़रते हुए सड़क पर गाड़ी के पाहियों के नीचे कुचले हुए साँपों का दृश्य आम बात है.

प्रजातियां

Image caption स्वास्थ्य सेवाओं के उपलब्ध न होने की वज़ह से ज्यादातर मौत होती है.

केवल जशपुर ही नहीं छत्तीसगढ़ में ज़हरीले साँपों की कई प्रजातियां पाई जातीं हैं. इनमें जो प्रजाति यहाँ प्रमुख रूप से पाई जाती है वह है करेत.

करेत पूरे छत्तीसगढ़ में पाए जाते हैं और ये माना जाता है कि करेत के डसने से ही यहाँ पर ज़्यादातर मौत होती है.

बिलासपुर से क़रीब तीस किलोमीटर दूर गनियारी में एक नीजि सहायता समूह जन स्वस्थ्य सहयोग का चिकित्सा में एक महिला को लाया गया है. इस महिला को करेत साँप ने काटा है.

महिला की स्थिति काफी गंभीर बनी हुई है क्योंकि उसे अस्पताल साँप के काटने के 38 घंटों के बाद लाया गया है. मगर यह महिला जिसका नाम बैसखिया है वह काफ़ी ख़ुशकिस्मत है क्योंकि यहाँ पर अनुभवी डाक्टर मौजूद हैं.

बैसखिया के पति अशोक कुमार से जब अस्पताल देरी से पहुंचने का कारण पुछा गया तो उनका कहना था, उनके घर के बुजुर्गों नें अस्पताल ले जाने से ये कहते हुए मना कर दिया कि साँप के काटने पर झाड़ फूँक ही इलाज का पारंपरिक तरीका है.

लेकिन जब बैसखिया के शरीर में ज़हर फैलता गया तो उसके पति नें कई घंटों के बाद उसे अस्पताल पहुंचाया.

बैसखिया का इलाज कर रहे जन स्वस्थ्य सहयोग के डॉक्टर अतुल जैन कहते हैं, "बैसखिया को करेत ने काटा है. उनका कहना है कि साँप के काटने के 38 घंटे बीत गए हैं और उसके शरीर में ज़हर के लक्षण दिख रहे हैं. अब उसे साँप के काटने पर दी जाने वाली दवा दी जा रही हैं, जिसकी दस बोतलें सिर्फ एक घंटे में उसे चढ़ाई जानी हैं."

डॉक्टर अतुल जैन कहते हैं कि साँप के काटने से ज़्यादातर मौतें उन्हीं इलाक़ों में होतीं हैं जो दुर्गम हैं या फिर जहाँ चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध नहीं है.

पारंपरिक तरीका

वह कहते हैं, "यह वह इलाक़े हैं जो सामाजिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर है. जहाँ चिकित्सा की सुविधा नहीं हैं वहां सर्प दंश से ज्यादा मौत हो रहीं हैं."

जिन इलाकों में चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं या फिर जो इलाक़े बिलकुल सुदूर हैं वहां बैगाओं यानी ओझाओं का राज हैं.

यह बैगा साँप के काटने पर झाड़ फूँक करने का काम करते हैं.

अचानकमार के जंगल में बसे एक आदिवासी गाँव में ऐसे ही कुछ बैगा मौ़जूद है जो जड़ी बूटियों के माध्यम से सर्पदंश के मरीज़ को ठीक करने का दावा करते हैं.

बैगा कहते हैं, "झाड़ फूँक से वह सर्प दंश के मरीजों को तात्कालिक लाभ पहुंचाने की कोशिश करते हैं. वह दावा करते हैं कि कई मामलों में उन्हें चमत्कारिक सफलता भी मिली है."

एक बैगा कहते हैं कि उनकी पंचायत के सरपंच की पत्नी को साँप नें तालाब में काटा था. बाद में उसे उन्होंने झाड फूँक और जड़ी बूटियों से ठीक कर दिया.

लेकिन डाक्टर अतुल जैन का कहना है," ये देखा गया है कि कुछ साँप ज़हरीले होते हैं तो कुछ में ज़हर नहीं होता. अब बिना ज़हर वाला साँप किसी को काटता है तो उसे यह नहीं पता रहता है कि यह विषैला है या नहीं. ओझा और बैगा इसी का फ़ायदा उठाते हैं".

सर्पदंश से जुडा दूसरा पहलू है, साँप की पहचान. डॉक्टर जैन के अनुसार अगर पीड़ित यह पहचान कर लेता है कि उसे किस साँप ने काटा है तो उसका इलाज आसान हो जाता है.

Image caption सांप से बचने के लिए राज्य सरकार लोगो को मच्छरदानियां बांट रही है

साँप के काटने से जुड़ी कई मान्यताएं भी हैं या यूँ कहिए कि अंधविश्वास हैं.

छत्तीसगढ़ के जंगली इलाक़ों में ऐसी मान्यता है जब साँप काटता है तो उसे घर की चौखट से नहीं निकाला जाता है. उस मरीज़ को निकलने के लिए घर के छप्पड़ को काटना पड़ता है.

अंधविश्वास

अचानकमार के जंगलों में स्थित एक ऐसे ही गाँव में दशरथ नाम के एक युवक की मौत साँप के काटने से इसलिए हो गयी क्योंकि घर का छप्पड़ काटकर उसे निकालने में बहुत देर हो गई.

दशरथ की दादी बताती हैं कि जब तक वह जिंदा था वह सामान्य लोगों की तरह बात कर रहा था. जब छप्पड़ काट के उसे निकाला गया उसके कुछ ही देर बाद उसकी मौत हो गई.

जन स्वस्थ्य सहयोग के कार्यकर्ता उन लोगो तक मदद पहुंचाने की कोशिश में लगे हैं जिनके पास मदद पहुंचाना काफ़ी मुश्किल काम है.

लेकिन इसके बावजूद संस्था के कार्यकर्ताओं को बैगाओं के विरोध का सामना भी करना पड़ता है.

संस्था के कार्यकर्ता अनिल बामने बताते हैं, "जब साँप से डसे हुए किसी मरीज़ को गांव से लेने गए तो उन्हें बैगाओं के विरोध का सामना करना पड़ा. बाद में उन्होंने जब पुलिस को बुलाने की धमकी दी तब जा कर वह मरीज़ को अस्पताल तक ला पाए."

जन-स्वास्थ सहयोग का कहना है कि छत्तीसगढ़ में साँप के काटने से हर साल औसतन 1500 लोगों की मौत हो जाती है.

डॉक्टर अतुल जैन मानते हैं कि अगर सुदूर अंचलों में भी उचित चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध करा दी जाए तो यह आंकड़ें कम हो सकते हैं.

वह कहते हैं, "अगर बिलासपुर ज़िले को ही ले लिया जाए तो यहाँ हर साल औसतन 100 लोग सर्प दंश से मरते हैं. यह आंकड़े दूसरे जिलों में भी कुछ कम नहीं हैं."

जशपुर के फरसाबहार के इलाक़े में राज्य सरकार नें लोगों को साँप से बचने के लिए मच्छरदानियाँ बांटनी शुरू कर दी हैं.

राज्य के अन्य इलाक़ों में आज भी सरकारी अस्पतालों और चिकित्सा केन्द्रों में साँप के काटने की दवाइयों और डॉक्टरों का घोर अभाव है. शायद यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों के लोग आज भी जड़ी-बूटियों और ओझा-तांत्रिकों के चक्कर में फँस कर रह गए हैं.

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