"चक्रव्यूह में फँस गई हूँ"

“मै हरियाणा के गुड़गाँव में किराए के मकान में रहती हूँ. मै और मेरे पति दोनों ही नौकरीपेशा है. हाल ही में हमने दिल्ली से यहाँ शिफ्ट किया है.

इससे पहले मैं हैदराबाद में नौकरी करती थी. मकान ख़रीदने के बारे में सोचने की शुरूआत हैदराबाद से ही हुई.

मैने सोच रखा था कि इस बार जब दिल्ली जाऊंगी तो एक मकान ज़रूर बुक कराऊंगी.

मैंने और मेरे पति ने इस बारे में अच्छी ख़ासी खोज-पड़ताल की कि मकान लेना कहाँ ठीक रहेगा और कहाँ नहीं.

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मायावती का सपना

Image caption पूजा और उनके पति ने नोएडा एक्सटेंशन में फ़्लैट बुक करने के फ़ैसला किया

विकल्प के तौर पर मेरे सामने नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुड़गाँव, गाज़ियाबाद और फ़रीदाबाद का भी विकल्प था और तो और मैं तो जयपुर में भी मकान लेने के लिए तैयार बैठी थी. उस दौरान तमाम अख़बार, टीवी चैनल और यहाँ तक कि एफ़एम चैनलों पर नोएडा एक्सटेंशन के ही विज्ञापन गूँज रहे थे.

महीनों की मेहनत और सारे प्रोजेक्ट्स पर निगाह दौड़ाने के बाद हमारी खोज आकर नोएडा एक्सटेंशन पर थम गई.

एक बात और. ये भी पता चला कि नोएडा एक्सटेंशन उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का सपना है और वो उनके लिए अति-महत्वाकाँक्षी परियोजना है.

तमाम ब्रोकर्स और डीलर्स से बात करने पर भी यही पता चला तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं रही.

हमने भी तय किया कि इस समय सबसे बेहतर निवेश नोएडा एक्सटेंशन ही है.

आखि़रकार हमने भी फ़ैसला किया कि क्यों ना यहीं पर एक ऐसा फ्लैट बुक किया जाए जो कि हमारी जेब के दायरे में हो और साथ ही तीन साल की तयशुदा समय-सीमा में मिल भी जाए. हम चाहते थे कि निवेश 15 से 20 लाख के बीच में हो ताकि हम पर बहुत ज़्यादा भार भी ना पड़े.

हमने टू-बेडरूम फ़्लैट बुक किया और फ़्लैट की 10 फ़ीसदी रक़म का भुगतान कर दिया. ये रक़म पौने दो लाख की थी. बाकी का 85 फ़ीसदी तो बैंक को देना था.

हालाँकि ये सब हमने बहुत पड़ताल करने के बाद किया था और इस दौरान ये मालूम ही नहीं चला कि इस गाँव में किसानों और बिल्डरों को लेकर कोई झगड़ा भी है. इसका कारण था ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण. क्योंकि उन्होंने ज़मीन किसानों से खरीदी थी और बिल्डरों को बेची थी, इसलिए विवाद का तो कोई सवाल ही नहीं था.

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तगड़ा झटका

झटका तब लगा जब बैंक से रक़म की भुगतान की बारी आई. मई महीने में बैंक को पहली किश्त जारी करनी थी. मैने कई बार बैंक को फ़ोन किया तो मालूम चला कि वो फ़िलहाल कोई रक़म बिल्डर के लिए जारी नहीं कर रहे हैं.

मैं आनन-फ़ानन में नोएडा एक्सटेंशन में बिल्डर के पास पहुँची तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, एचडीएफ़सी बैंक फ़ाईनेंस कर रहा है, वहाँ से करवा लो.

मैने दोबारा प्रोसेसिंग फ़ीस के साथ एचडीएफ़सी में आवेदन किया. कुछ दिनों बाद मैने बैंक को फ़ोन किया तो मालूम चला कि वो जल्द ही भुगतान करने वाले हैं. बावजूद इसके महीने गुज़र गए मगर रक़म नहीं मिली.

आख़िरकार पता चला कि बैंक ने पूरे नोएडा एक्सटेंशन के प्रोजेक्ट्स पर पैसा देना बंद कर दिया. मेरे पास अब कोई विकल्प नहीं था.

अदालत का फ़ैसला आने के बाद तो स्थितियाँ और ख़राब हो गई हैं.

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चक्करों का दौर

पिछले एक महीने से मैं एक चक्रव्यूह में फँस गई हूँ. हफ्ते के पाँच दिन ऑफिस और जिस दिन छुट्टी होती है उस दिन बिल्डर के चक्कर काटो, आप सोच सकते हैं कि गुड़गाँव से बार-बार नोएडा एक्सटेंशन आना आसान काम नही है.

अभी तो बहुत तनाव है पर मुझे नहीं लगता कि ऐसा बहुत दिन तक चलेगा. क्योंकि किसान भी अपनी ज़मीन वापस नहीं चाहते. वो सिर्फ़ बढ़ी हुई रक़म चाहते हैं.

फ़िलहाल गड़बड़ी तो दिख रही है लेकिन मैं निराश नहीं हूँ. मुझे लगता है कि इससे फ़्लैट मिलने में देरी तो ज़रूर हो जाएगी. तीन साल के बजाए शायद चार साल लग जाएँ.

बेहतर यही होगा कि निवेशक, ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण, सरकार और किसान मिल बैठकर किसी नतीजे पर पहुँचे. उम्मीद तो अब भी बाक़ी है. पर ये कब होगा ये कह नहीं सकती."

(पूजा की आपबीती बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा से की गई बातचीत पर आधारित है.)

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