किराए की कोख ने बदली ज़िंदगी

महिलाएँ

हर महिला की इच्छा होती है कि वह मां बने. लेकिन जब एक महिला माँ नहीं बन पाती तो वह दूसरे विकल्प तलाशती है.

अब संतान का सुख पाने के लिए यूरोप और अमरीका के दंपति भारत का रुख़ कर रहे है.

भारत में किराए पर कोख लेना पश्चिमी देशों के मुक़ाबले अभी भी सस्ता है.

ऐसी ही एक कहानी है आयरलैंड से आई कैरोलिना की, जिन्होंने सोनल को पैसे देकर उसकी कोख उधार में ली थी.

छब्बीस वर्षीय सोनल ने हाल ही में एक बच्चे को जन्म दिया है, जिसे अब वह कभी नहीं देख पाएँगी.

उसका कहना था, "वे लोग बच्चे के पैदा होने के तुरंत बाद उसे लेकर चले गए."

सोनल का कहना था, "जब वह बच्ची पैदा हुई, तब मैं उस समय बेहोश थी. इसलिए बच्ची को देख नहीं पाई. जब मैंने होश संभाला तो अपनी मां से पूछा कि क्या हुआ था, तब जाकर उन्होंने मुझे बताया कि लड़की पैदा हुई थी."

पैसा

सोनल पश्चिमी गुजरात के एक शहर की रहने वाली है और प्रसव के लिए एक छोटे से शहर आनंद में स्थित आकांक्षा क्लीनिक आई थी.

सोनल का एक बेटा और बेटी है और उनके पति सब्ज़ी बेचकर घर चलाते हैं. वे एक महीने में केवल 1,500 रुपए ही कमा पाते हैं.

इस कमाई से घर का ख़र्च तो मुशिकल से ही चलता है. ऐसे में बच्चों को अच्छी शिक्षा देना तो दूर की बात है.

सोनल ने दूसरी बार अपनी कोख किराए पर दी है, जिसके एवज़ में उन्हें तीन लाख रुपए मिल रहे हैं.

उसका कहना था, "मेरा एक घर होगा और मैं आराम से उसमें अपने बच्चों के साथ रहूँगीं. मैं भी अपने बच्चों को पढा़ऊँगी."

सोनल ने हाल ही में जो बच्ची पैदा की है, वह अब उनसे सात हज़ार किलोमीटर दूर जा चुकी है.

कैरोलिना को 21 साल की उम्र में सर्वाइकल कैंसर हो गया था जिसकी वज़ह से उसके सर्विक्स को शरीर से अलग करना पड़ा. हालाँकि डॉक्टरों ने कैरोलिना को ये कहा था कि वह मां तो बन सकती है लेकिन वह नौ महीने तक बच्चे को अपनी कोख में नहीं रख पाएँगी. कैरोलिना कहती हैं, "मैं हमेशा से मां बनना चाहती थी. लेकिन जब आप बीमार हो जाते है और वह मौक़ा जब आपसे छीन लिया जाता है तो आपके पहले कुछ साल तो यही सोचने में चले जाते है कि अब क्या किया जाए और जब तक पता चलता है, तो एक लंबा समय ऐसे ही बीत जाता है."

भारत में पैसे के लिए किराए पर कोख देने को साल 2002 में वैधानिक करार दिया गया था, लेकिन यह अभी भी एक विवादास्पद मुद्दा है.

जब सोनल ने अपने पति को ये बताया कि वह अपनी कोख किराए पर देना चाहती है तो उन्होंने उन्हें साफ़तौर पर मना कर दिया था.

सोनल के पति का कहना था कि समाज में ऐसी चीज़ों को सहमति नहीं दी जाती है. लेकिन बाद में सोनल ने अपने पति को मना लिया.

आलोचना

Image caption गुजरात में किराए पर कोख़ देने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है

सोनल कहती हैं कि जब उन्होंने पहली बार अपनी कोख किराए पर दी थी, तब उन्होंने पैदाइश के बाद बच्चे को तीन दिनों तक अपना दूध पिलाया था और उसे ऐसा लगा था कि जैसा वह उनका अपना बच्चा है.

उन्होंने कहा, "जब वे उसे लेकर चले गए, तब मैं तीन दिन तक रोती रही थी. मैं अब भी उसे याद करती हूँ."

सोनल ने जब दोबारा अपनी कोख किराए पर दी तो उनकी माँ ने उसका पूरा साथ दिया, लेकिन उसने अपने सास-ससुर को इस बारे में कुछ नहीं बताया था.

आकांक्षा क्लीनिक चला रही आईवीएफ़ विशेषज्ञ डॉक्टर नैना पटेल कहती है, "मैं जानती हूँ कि इसकी आलोचना होती है लेकिन इस बात को मानने से इंकार कर रही हूँ कि ऐसी महिलाओं को शोषण किया जाता है."

वे कहती है कि एक ओर जिन दंपतियों को बच्चा नहीं होता, उन्हें बाद में बच्चे का सुख मिलता है तो दूसरी ओर कोख किराए पर देने वाली ग़रीब महिला को इतना पैसा मिल जाता है, जिससे वो अपना घर-बार सुखी रख सकती हैं और बच्चों को पढ़ा-लिखा सकती हैं.

डॉक्टर नैना पटेल का कहना है कि ऐसी स्थिति में उन्हें किराए के कोख की आलोचना से फ़र्क नहीं पड़ता.

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