'ईसाई होने के कारण भेदभाव'

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Image caption दिनाकरन के ख़िलाफ़ भूमि पर कब्ज़ा करने और आय से अधिक संपत्ति के मामले हैं.

सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद से इस्तीफ़ा दे चुके जस्टिस पीडी दिनाकरन ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि उनके ख़िलाफ़ इसलिए भेदभाव हो रहा है क्योंकि वो ईसाई समुदाय के हैं और उनके खिलाफ़ मामला षणयंत्र का हिस्सा हैं.

दिनाकरन के ख़िलाफ़ भूमि पर कब्ज़ा करने और आय से अधिक संपत्ति के मामले हैं. उनके खिलाफ़ राज्यसभा में सभापति द्वारा नियुक्त जांच समिति की सुनवाई होनी थी.

दिनाकरन ने कहा, “क्योंकि में अल्पसंख्यक समुदाय से हूँ, इसी वजह से कुछ राजनीतिक दलों और निहित स्वार्थों के द्वारा ये तोडफ़ोड़ का काम किया जा रहा है. ये एक व्यक्ति पर नहीं, ये एक संस्था पर हमला है, ये एक समुदाय पर हमला है.”

हालाँकि ये पूछने पर कि क्या वो किसी संवैधानिक संस्था में शिकायत दर्ज करवाएँगे, जस्टिस दिनाकरन ने बात की कोई सीधा जवाब नहीं दिया.

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को भेजे अपने दो पन्नों के त्यागपत्र में दिनाकरन ने कहा, “मुझे संदेह है कि जो कुछ भी मेरे साथ हुआ उसके पीछे मेरा सामाजाकि रूप से शोषित और वंचित समाज में पैदा होना है. अपने पद पर रहते हुए मैं ऐसे अनुरोधों को स्वीकार नहीं कर पाया जो राजनीति से प्रोरित थे क्योंकि मैने बिना भय और अनुराग के न्याय करने की शपथ ली है.”

‘धोखा’

कागज़ों से घिरे दिनाकरन की आवाज़ में पीड़ा थी. उन्होंने घंटों अपने खिलाफ़ प्रस्तुत कागज़ातों में मौजूद “गलतियाँ और विसंगतियाँ” दिखाईं.

दिनाकरन ने कहा कि उन्होंने लोकतंत्र, न्याय प्रणाली और कानून पर विश्वास किया, लेकिन उनके साथ धोखा हुआ.

उन्होंने कहा, “व्यवस्था ने मेरे साथ धोखा किया. इस देश के लोगों को मेरे दर्द का पता चल रहा है. उन्हें पता चल रहा है कि मैं निर्दोश हूँ. मुझे बलि का बकरा बनाया गया.”

दिनाकरन जब कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे तो उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के तौर पर उनके नाम को मंजूरी दी थी.

लेकिन कुछ संगठनों के भ्रष्टाचार, ज़मीन हथियाने, अघोषित संपत्ति और फ़ायदे के लिए फैसला देने के आरोपों के बाद दिनाकरन की पदोन्नति पर रोक लगा दी गई और उन्हें उन्हें सिक्किम उच्च न्यायालय भेज दिया गया. उन्होंने बार बार आरोपों का खंडन किया है.

संसद में जस्टिस दिनाकरन के ख़िलाफ़ 12 मामले तय किए जाने के बाद उप-राष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति हामिद अंसारी ने आरोपों की जाँच के लिए जनवरी 2010 में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था. दिनाकरन के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाने की तरफ़ ये एक क़दम था.

आरोपों का खंडन

बीबीसी से बातचीत में दिनाकरन बार-बार भारत सरकार के विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय द्वारा गठित कमेटी की 25 फ़रवरी 2010 की पेश की गई रिपोर्ट का ज़िक्र करते हैं जिसमें उन्हें क्लीन चिट दी गई थी.

दिनाकरन की नाराज़गी तीन-सदस्यीय कमेटी में मौजूद वरिष्ठ वकील पीपी राव से हो जिनका बर्ताव उनके हिसाब से पक्षपातपूर्ण है.

उन्होंने कहा, “क्या ऐसे हालात में मैं न्याय की उम्मीद कर सकता हूँ? नहीं. मेरा विश्वास ख़त्म हो गया है. अगर एक मुख्य न्यायाधीश के साथ ऐसा हो सकता है, तो एक आम आदमी के साथ क्या होगा?”

उनकी नाराज़गी मीडिया से भी है, जो उनके मुताबिक बिना पूरी जानकारी के लोगों को विभिन्न नामों से पुकारने लगती है.

ये पूछे जाने पर कि मीडिया में उन पर दलित ईसाई कार्ड के इस्तेमाल के आरोप लगे हैं, दिनाकरन ने कहा, “मीडिया में ये भी कहा जा सकता है कि मैं डरपोक की तरह चला गया, लेकिन मैने जानबूझकर ये फ़ैसला किया. ईसाई धर्म में हम किसी जाति को नहीं मानते. मैं जात-पात के खिलाफ़ हूँ.

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार

न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार पर जस्टिस दिनाकरन ने कहा कि ये साक्षेपिक है और इसकी तुलना नहीं की जानी चाहिए और ये कहना कि हर जगह भ्रष्टाचार है, गलत है.

दिनाकरन ने न्यायापालिक में विभिन्न किस्मों के विभाजन की ओर इशारा किया.

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