दिल्ली में निकला बेशर्मी मोर्चा

स्लट-वॉक
Image caption इस तरह के जुलूस का चलन इस साल कनाडा में शुरु हुआ था

कनाडा, लंदन और दुनिया के दूसरे शहरों की तर्ज़ पर दिल्ली के जंतर-मंतर में भी स्लट-वॉक यानि बेशर्मी मोर्च निकला.

बेशर्मी मोर्चा का मक़सद है महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले यौन हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना. लड़कियों को आम ज़िंदगी में जिस तरह के यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, उसके ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करना.

किस तरह उन पर छींटाकशी होती है, चाहे वो बस में हो, या फिर कॉलोनी के गेट पर, इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना.

इस तरह के जुलूस का चलन इस साल कनाडा में शुरु हुआ था जब टोरंटो के एक पुलिस अधिकारी ने टिप्पणी कर दी थी कि अगर ‘महिलआएँ पीड़ित होने से बचना चाहती हैं तो उन्हें वेश्याओं के तरह कपड़े पहनने से बचना चाहिए.’

टिप्पणी के विरोध में कनाडा, अमरीका, यूरोप, एशिया और ऑस्ट्रेलिया में विरोध प्रदर्शन हुए हैं. इन प्रदर्शनों का मकसद इस हक़ की माँग करना है कि यौन प्रताड़ना के डर के बिना महिलाएँ अपने मन मुताबिक कपड़े पहन पाएँ.

जंतर-मंतर में भी महिलाओं ने अपने हाथों में बैनर लिए हुए थे.

“मेरी छोटी स्कर्ट का तुमसे कोई लेना-देना नहीं है.” “सोच बदलो, कपड़े नहीं.”

आशिमा और आकांक्षा के हाथों में भी बैनर था.

आशिमा कहती हैं, “मैने अगर टी-शर्ट, जींस पहनी हुई है, इसका ये मतलब नहीं कि मैं किसी से कह रही हूँ कि आओ मुझसे छेड़छाड़ करो. मेरे कपड़ों का तुम्हारी बुरी नज़र से कोई लेना-देना नहीं है.”

आकांक्षा मुस्कुराते हुए पूछती हैं, “माता-पिता भी कहते हैं कि बस में जा रहे हो, ठीक से कपड़े पहन के जाओं. ये क्या बात हुई?”

नुक्कड़ नाटक

दूसरी तरफ़ कुछ लड़के, लड़कियों का गुट एक नुक्कड़ नाटक पेश कर रहा था.

Image caption इस प्रदर्शन का मक़सद महिलाओं के साथ होने वाले यौन हिंसा के मसले को उजागर करना था.

“लड़की देखी मुँह से सीटी बजी हाँथ से ताली, साला, आला, उपमा, टपोरी आली आली.”

मै खिलाड़ी, तू अनाड़ी फ़िल्म का सुपरहिट गाना जो कुछ और कहे बहुत कुछ कह देता है.

पेश हुए कुछ छींटाकशी के नमूने.

“अरे देखो, क्या माल जा रहा है.”

“तुम्हारे लिए तो दिल कुर्बान है.”

बहरहाल, पुरुषों की भी अच्छी खासी संख्या बेशर्मी मोर्चा में महिलाओं के मुद्दों का समर्थन करने मौजूद थी.

अमित आयुश ने भी एक बैनर उठा रखा था.

उनका कहना था, “हमारे घर में भी लड़कियाँ हैं, बहने हैं. हम चाहते हैं कि महिलाओं की इज़्ज़त हो.”

तो क्या आप दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि आप निजी ज़िंदगी में भी महिलाओं की इज़्ज़त करते हैं?

मुस्कुराते हुए अमित ने जवाब दिया, “बिल्कुल. तभी तो हम यहाँ आए हैं.”

पास ही खड़े एक पुरुष ने कहा, “ये बलात्कारी भूल जाते हैं कि उनकी भी बहने हैं. इन्हें फ़ांसी से नीचे कोई भी सज़ा नहीं होनी चाहिए.”

उनके एक साथी ने कहा कि पुलिस और अधिकारियों को ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए कि किसी ने कम कपड़े पहने, इसलिए उनके साथ बलात्कार हो गया, क्योंकि उन औरतों का भी बलात्कार होता है जो साड़ियाँ पहनकर घूमती हैं. उन बच्चियों का भी बलात्कार होता है जिन्हें उनके पिता नहीं छोड़ते.”

‘मीडिया सर्कस’

हालाँकि जंतर-मंतर पर बहुत भीड़ नहीं थी, कुछ का कहना था कि लड़कियों और महिलाओं से ज़्यादा दुनिया भर के पत्रकार जंतर-मंतर के चक्कर लगा रहे थे. कोई पानी की टंकी पर चढ़कर फ़ोटो खींच रहा था या फिर टीवी कैमरों से बातें कर रहे था.

जंतर-मंतर में बेशर्मी मोर्चा प्रदर्शन के ठीक बगल में ही सड़के के किनारे पनवारी लाल और सुमन ने एक छोटा सा झोपड़ा खड़ा किया है, जहाँ पिछले कुछ महीनों से वो अपनी छह साल से गायब बेटी लक्ष्मी को ढूँढ़ने के लिए प्रशासन के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.

उनके पास ना ही मीडिया का साथ है, ना ही प्रदर्शनकारियों की फ़ौज. बस बेटी की छोटी सी तस्वीर बाहर टाँग रखी है.

उनका कहना है कि उनके कुछ रिश्तेदारों ने ही उनकी बेटी को अगवा कर लिया है, लेकिन पुलिस जानबूझकर कोई भी कार्रवाई नहीं करती. उन्हें सभी अफ़सरों के नाम मुँह ज़बानी याद हैं.

वो बहुत गौर से मीडिया के जमावड़े को देख रहे थे.

पनवारी लाल अख़बारों और टीवी चैनलों का नाम गिनाते हुए कहते हैं कि उन्होंने कई बार इन संस्थानों से अपनी बेटी की खोज के मदद मांगी लेकिन किसी ने साथ नहीं दिया.

“मेरी एक बार एक टीवी चैनल के पत्रकार से लड़ाई भी हुई कि क्या हम इंसान नहीं कि तुम यहाँ देखकर चले जाते हो, कुछ करते नहीं हो.”

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