नए अधिग्रहण बिल पर धरना शुरू

मेधा पाटकर
Image caption मेधा कहती हैं कि जिन लोगों की ज़मीन ली गई है, उनके भविष्य का भी ध्यान रखा जाना चाहिए

ज़मीन अधिग्रहण कानून 1894 की जहाँ देश भर में आलोचना होती रही है, सरकार के नए राष्ट्रीय ज़मीन अधिग्रहण और पुनर्वास बिल 2011 के ख़िलाफ़ भी शिकायतें कम नहीं हैं.

इन्हीं शिकायतों पर आवाज़ बुलंद करने के लिए दिल्ली में बुधवार से तीन दिन का धरना शुरु हुआ, जिसमें देश के विभिन्न भागों से आए किसानों ने भाग लिया. इन लोगों ने नए बिल पर असंतोष ज़ाहिर किया और सरकार में अविश्वास.

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने बिल के मसौदे को वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है और 31 अगस्त से पहले तक लोगों से इस बारे में विचार मांगे गए हैं.

इस मसौदे के मुताबिक़ ऐसी ज़मीन जो सिंचाई की हुई है और जिस पर एक से ज़्यादा फ़सल उगती हो, उसका अधिग्रहण नहीं किया जाएगा.

बिल का अर्जेंसी क्लॉज़ यानी जब आवश्यकता के मुताबिक ज़मीन का अधिग्रहण करना हो, तभी लागू हो पाएगा, जब देश की सुरक्षा के मद्देनज़र ऐसी कोई ज़रूरत हो, या फिर कोई अति आवश्यक कारण हो.

मसौदे के मुताबिक़ शहरी इलाकों में हर्जाने की रक़म ज़मीन की बाज़ार की कीमत से दोगुनी और ग्रामीण इलाक़ों में छह गुना से कम नहीं होगी. साथ ही अधिग्रहण से प्रभावित 80 प्रतिशत लोगों की सहमति लेने की बात भी मसौदे में की गई है.

आलोचना

Image caption अखिल गोगोई ग्राम प्रधानों को पूर्ण अधिकार दिए जाने की बात कहते हैं

लेकिन बुधवार को दिल्ली के जंतर-मंतर में इकट्ठा हुए लोगों ने सरकारी क़दमों और सरकार पर कॉरपोरेट जगत के कथित प्रभावों पर चिंता और नाराज़गी जताई.

असम से आए अखिल गोगोई कहते हैं कि जहाँ मसौदे के मुताबिक़ सिंचित ज़मीन का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा, असम में सिंचित ज़मीन ना के बराबर है.

उन्होंने कहा, “ज़मीन के अधिग्रहण पर गाँववालों और ग्रामसभा की बात ही मानी जानी चाहिए, जबकि इस बिल में कई अधिकार सरकार और कंपनियों को दिए गए हैं.”

कई गाँव वालों का कहना था कि दरअसल ज़मीन को सिर्फ़ लीज़ पर दिया जाना चाहिए और लीज़ को नया रूप देते वक्त किसानों को नए दाम दिए जाने चाहिए.

ऐसे आंदोलनों से सालों से जुड़ी रहीं मेधा पाटकर हालाँकि मसौदे के कुछ भागों से संतुष्ट हैं, लेकिन उन्हें इसमें अभी भी कई कमियाँ नज़र आती हैं.

वो कहती हैं कि सरकार को कंपनियों के लिए ज़मीन का अधिग्रहण करना ही नहीं चाहिए, और अधिग्रहण करते वक्त ग्राम सभा की सहमति बेहद ज़रूरी होनी चाहिए.

मसौदे में ये कहे जाने पर कि अधिग्रहण के वक़्त 80 प्रतिशत लोगों की सहमति ज़रूरी है, मेधा कहती हैं, “ये स्पष्टता होनी चाहिए कि 80 प्रतिशत कौन से लोग होंगे. उनमें दलित, महिलाओं का शामिल होना आवश्यक है, नहीं तो सभी सवर्ण दलितों के खिलाफ़ हो जाएंगे और उनकी ज़मीन हड़पने देंगे.”

मेधा के मुताबिक ये भी साफ़ होना चाहिए कि सार्वजनिक हित का निर्धारण कौन करेगा. अभी इसकी ज़िम्मेदारी एक कमेटी पर डाली गई है जिसकी अध्यक्षता मुख्य सचिव करेगा, लेकिन मेधा के मुताबिक़ इसमें ग्राम सभा की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए.

मेधा कहती हैं कि जिन लोगों की ज़मीन ली गई है, उनके भविष्य का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि वो आगे चलकर क्या करेंगे.

मेधा के मुताबिक सरकार का ज़्यादा ज़ोर हर्जाने की रक़म बढ़ाने पर है, ना कि उनके भविष्य के विकास पर.

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