एक अनोखा पोस्टकार्ड अभियान..

Image caption श्याम सिंह पिछले 25 सालों से एक पोस्टकार्ड अभियान चला रहे हैं.

राजस्थान-मध्यप्रदेश की सीमा से सटे मंदसौर ज़िले की एक आम सुबह और साइकिल पर तेज़ी से पैडल मारते श्याम सिंह चंदावत.

श्याम सिंह पेशे से शिक्षक हैं बच्चों को समय का पाबंद बनाने के लिए हर दिन खुद समय से पहले स्कूल पहुंचते हैं.

लेकिन समय की इस पाबंदी के अलावा श्याम सिंह की एक आदत ऐसी भी है जिसने उन्हें अपने गांव ही नहीं बल्कि भारत के कई गावों, कस्बों और शहरों में एक जाना पहचाना नाम बना दिया है.

श्याम सिंह पिछले 25 सालों से एक अनोखा पोस्ट-कार्ड अभियान चला रहे हैं.

इस पोस्ट-कार्ड अभियान के ज़रिए उनका मकसद है पानी की बर्बादी, पेड़ों की कटाई, पोलियो उन्मूलन और दहेज-प्रथा जैसे न जाने कितने मुद्दों पर आम लोगों को सोचने के लिए मजबूर करना.

पेश है सिटीज़न रिपोर्टर श्याम सिंह चंदावत की कहानी उनकी अपनी ज़बानी

'' मेरा नाम श्याम सिंह चंदावत है और मैं राजस्थान-मध्यप्रदेश की सीमा से सटे मंदसौर ज़िले में रहता हूं.

जिस इलाके में मैं रहता हूं वहां पानी की बेहद कमी है. कई साल पहले मैंने देखा कि मेरे इलाके में पानी के लिए झगड़े बढ़ते जा रहे हैं. मैं जानता था कि पानी के संरक्षण और उसके इस्तेमाल को लेकर जागरुकता ही इन झगड़ों को खत्म कर सकती है.

इसके लिए ज़रूरी था आम लोगों तक अपनी बात पहुंचना, वो भी कुछ इस तरह की लोग उसे अनदेखा न कर सकें.

शब्दों के बनिस्पत चित्रों का प्रभाव कहीं अधिक होता है. ऐसे में लोगों को जागरुक करने और उन्हें एक ज़िम्मेदार नागरिक बनाने के लिए मैंने पोस्टकार्ड पर हाथ से बने रंग-बिरंगे चित्रों के ज़रिए अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने का फैसला किया.

पोस्टकार्ड आंदोलन

अलग-अलग मुद्दों पर आधारित हाथ से बनी इन तस्वीरों के साथ अपना संदेश लिखकर मैंने पानी की बर्बादी, बारिश के पानी को सहजने और सूख रहे जल-स्त्रोतों को बचाने की अपील मैंने गांव, कस्बों और शहरों तक फैलानी शुरु की.

पहले-पहल मैंने 100-200 की संख्या में पोस्टकार्ड बनाए और अखबारों, किताबों से पते लेकर अलग-अलग जगहों पर उन्हें पोस्ट किया.

इस कोशिश के चमत्कारी परिणाम सामने आए. दूर-दराज़ के जिन इलाकों तक भी ये पोस्ट कार्ड पहुंचे वहां से कई लोगों ने मुझे फोन किया.

उन्होंने मुझसे इस अभियान के बारे में जानना चाहा और कई संदेशों पर अमल भी किया.

कुछ समय बाद अलग-अलग पतों पर पोस्टकार्ड भेजने के अलावा मैंने इन्हें ऐसी जगहों पर चिपकाना शुरु किया ज्यादा से ज्यादा लोग इन्हें देख सकें.

स्कूल की छुट्टी के दिन मैं बसों और रेलगाड़ियों में भी ये पोस्टकार्ड चिपकाने जाता हूं, ताकि जहां-जहां यातायात के ये साधन जाएं मेरे संदेश वहां पहुंचें.

बस स्टैंड, चाय कि दुकानों और सरकारी दफ्तरों के आस-पास से गुज़रते लोगों की नज़र अक्सर हाथ से बने इन पोस्टकार्ड पर टिक जाती है और लोग इन्हें देखकर ठिठक जाते हैं.

Image caption हाथ से बने इन पोस्टकार्ड पर टिक जाती है और अक्सर इन्हें देखकर लोग ठिठक जाते हैं.

कई बार मुझे गुजरात, जम्मू, उड़ीसा जैसे इलाकों से फोन आते हैं. मैं हैरान रह जाता हूं यह देखकर कि इस पोस्टकार्ड अभियान के ज़रिए मेरे संदेश कहां-कहां तक पहुंच रहे हैं.

कई लोगों ने मुझे बताया कि किस तरह मेरा कोई संदेश पढ़कर उन्होंने एक पेड़ लगाया, जल संरक्षण की कोशिश की या अपनी बेटी को पढ़ने भेजा.

अपनी इस कोशिश के लिए मैंने आज तक किसी से कोई आर्थिक मदद नहीं ली है. हर महीने अपनी आमदनी का आधे से ज़्यादा हिस्सा मैं पोस्ट-कार्ड, रंग, डाक टिकट जैसी चीज़ें खरीदने और किराए पर खर्च कर देता हूं.

गांव के लोग यहां तक कि मेरे घरवालों ने भी अक्सर इस काम को फिज़ुल कहकर मेरा मनोबल तोड़ा लेकिन मैं जानता हूं कि मेरी ये कोशिश आने वाली पीढ़ियों को मदद पहुंचाएगी.

आज हमारे पास संचार के कई साधन हैं लेकिन मैं आज भी हाथ से बने इन पोस्टकार्ड के ज़रिए अपनी बात कहता हूं क्योंकि मेरा मानना है कि बदलाव के जज़्बे की शुरुआत एक आत्मीय कोशिश से ही हो सकती है. एक ऐसी कोशिश जो किसी के मन में घर कर जाए.''

सिटीज़न रिपोर्ट की इस कड़ी पर अपनी राय ज़ाहिर करने या श्याम सिंह चंदावत से संपर्क के लिए हमें लिखें hindi.letters@bbc.co.uk पर.

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