’उत्तर प्रदेश को जागना होगा’

Image caption सर्वेक्षण में सामने आई जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर करने की ज़रूरत है.

स्वास्थ्य-सूचकों पर भारत के पहले ज़िला-स्तरीय सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश के 34 ज़िलों का प्रदर्शन सबसे बुरा पाया गया है.

सर्वेक्षण में जन्म दर, मृत्यु दर, बच्चों की जन्म दर, मातृ मृत्यु अनुपात और लिंगानुपात जैसे स्वास्थ्य सूचकों की जानकारी जुटाई गई.

उत्तर प्रदेश में मृत्यु दर, नवजात शिशुओं की मृत्यु दर और बच्चों की मृत्यु दर सबसे ज़्यादा है. साथ ही उत्तर प्रदेश के 34 ज़िलों में इन सूचकों के साथ-साथ मातृ मृत्यु अनुपात और लिंगानुपात भी बहुत ज़्यादा है.

राजधानी दिल्ली में एक पत्रकार वार्ता में इस सर्वेक्षण की जानकारी देते हुए स्वास्थ्य सचिव के चन्द्रमौली ने माना कि उत्तर प्रदेश के हर ज़िले की ख़ास स्थिति को ध्यान में रखते हुए सरकारी नीतियां बनानी होंगी.

उन्होंने कहा, “उत्तर प्रदेश के लिए ये जागने का समय है, केन्द्र सरकार और राज्य सरकार को देखना होगा कि कैसे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना और अन्य कार्यकलापों के ज़रिए राज्य की स्थिति सुधारी जाए.”

ग़ौरतलब है कि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की एक टीम ने हाल में उत्तर प्रदेश के कुछ ज़िलों का दौरा करने के बाद लगभग 400 पन्नों की एक रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी है.

इस रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम के तहत मोबाइल मेडिकल गाड़ियों, अस्पतालों के निर्माण, स्वच्छ पेयजल, कचरे की सफाई और दूसरे कामों का ठेका देने में गंभीर गड़बड़ियाँ हुईं.

पिछले महीने उत्तर प्रदेश के दो मुख्य स्वास्थ्य अधिकारियों यानि सीएमओ की संदिग्ध हालात में हत्या भी कर दी गई थी.

छोटे राज्य बेहतर

इस सर्वेक्षण में असम और एम्पावर्ड ऐक्शन ग्रुप (ईएजी) के आठ राज्यों के कुल 284 ज़िलों से आंकड़े इकट्ठे किए गए.

वर्ष 2001 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने ईएजी राज्यों की पहचान की थी. इनमें उन आठ राज्यों को शामिल किया गया जो जनसंख्या को सीमित करने में नाकाम रहे थे - बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और राजस्थान.

इन नौ राज्यों के सर्वेक्षण में देश की क़रीब आधी आबादी आ गई.

सर्वेक्षण में पाया गया कि बड़े राज्यों से अलग होकर बने उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड के स्वास्थ्य सूचक, अन्य राज्यों के मुकाबले बेहतर हैं.

उत्तराखंड, मृत्यु दर, लिंगानुपात, बच्चों की मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर समेत लगभग सभी स्वास्थ्य सूचकों पर सबसे आगे है.

सर्वेक्षण में जन्म के समय लिंगानुपात, बच्चों के लिंगानुपात और कुल लिंगानुपात, पर जुटाई जानकारी से पता चलता है कि शहरी इलाकों में ये अनुपात ग्रामीण इलाकों के मुकाबले कहीं ज़्यादा है.

स्वास्थ्य सचिव के चन्द्रमौली के मुताबिक इसकी एक वजह ये है कि शहरों में भ्रूण की लिंग जांच कर उसकी हत्या करवाने के साधन आसानी से ख़रीदे-बेचे जाते हैं.

चन्द्रमौली ने कहा कि लोगों में जागरूकता फैलाकर और उनकी मानसिकता बदलने के प्रयासों से ही ये चलन बदला जा सकता है.

ग़ौरतलब है कि ये जानकारी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के कार्यान्वित होने के साथ-साथ पिछले तीन सालों के दौरान इकट्ठी की गई.

ये सर्वेक्षण रेजिस्ट्रार जेनरल के दफ़्तर ने करवाया और अब इस जानकारी की मदद से केन्द्र सरकार, राज्यों के अलग-अलग ज़िलों में ज़रूरत के मुताबिक विशेष स्वास्थ्य योजनाएं लेकर आएगी.

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