अन्ना हज़ारे भ्रष्टाचारी: कांग्रेस

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Image caption अन्ना हज़ारे ने 16 अगस्त से अनिश्चितकालीन अनशन की बात की है.

अन्ना हज़ारे के 16 अगस्त से प्रस्तावित अनिश्चितकालीन अनशन से पहले रविवार को सरकार के कांग्रेसी मंत्रियों और पार्टी ने अन्ना के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है और उन पर आरोप भी लगाए.

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि सरकार के लोकपाल के मसौदे को जलाने का कोई तुक नहीं बनता है.

अन्ना के इस बयान पर कि कांग्रेस पार्टी को मिले दान का ब्यौरा दिया जाए, दिग्विजय सिंह का कहना था, '' अन्ना साहब हज़ारे को ये पता होना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी हर साल चुनाव आयोग के सामने हलफनामा दायर करती है और उसमें हर ब्योरा होता है.''

दिग्विजय सिंह का कहना था, '' किरन बेदी के संगठन को लेहमैन ब्रदर्स से दान मिलता है उसकी भी जांच होनी चाहिए.''

इससे पहले केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी, कपिल सिब्बल और कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने अन्ना को निशाना बनाया.

अंबिका सोनी और कपिल सिब्बल का कहना था कि वो टीम अन्ना के सवालों और आरोपों का जवाब दे रहे हैं. जब पत्रकारों ने ये पूछा कि क्या सरकार में बौखलाहट है और सरकार डरी हुई है तो दोनों मंत्रियों ने इससे इंकार किया.

सबसे तीखे अंदाज़ में कांग्रेस प्रवक्ता मनीश तिवारी ने अन्ना पर हमला किया और अन्ना हज़ारे को “भ्रष्टाचारी” बताया. उन्होंने वर्ष 2005 में जस्टिस पीबी सावंत कमीशन रिपोर्ट का हवाला दिया जिसने अन्ना हज़ारे के ट्रस्ट की जाँच में अनियमितता पाई गई थी.

मनीश तिवारी ने कहा, “भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अनशन की बात करते हो. ऊपर से नीचे तक तुम भ्रष्टाचार में खुद लिप्त हो.”

जस्टिस सावंत रिपोर्ट

उधर जस्टिस सावंत ने बीबीसी से कहा, “रिपोर्ट में मैने लिखा था कि अन्ना की आज़ाद हिंद ट्रस्ट, जिसके वो अध्यक्ष थे, उसमें से करीब 2.2 लाख उन्होंने (अन्ना ने) खुद के सम्मान समारोह के लिए खर्च किए थे. ये तो ग़ैर-कानूनी है. ये भ्रष्टाचार ही होता है.”

सावंत कहते हैं कि चूँकि अन्ना ट्रस्ट के प्रमुख थे, वो ही खर्चे के लिए ज़िम्मेदार थे. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में किसी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की सिफ़ारिश नहीं की थी.

दरअसल, अन्ना ने महाराष्ट्र सरकार के चार मंत्रियों के खिलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे. उसके बाद एक मंत्री ने अन्ना के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे जिसकी जाँच के लिए कमेटी का गठन किया गया था.

उधर अन्ना हज़ारे ने मनीश तिवारी के आरोप के जवाब में कहा कि कमेटी का गठन उनके आग्रह की वजह से ही किया गया था ताकि उनके खिलाफ़ आरोपों की जाँच हो. उन्होंने सभी आरोपों को झूठा करार दिया.

अन्ना ने कहा, "पीबी सावंत ने कहीं नहीं लिखा कि अन्ना हज़ारे भ्रष्टाचारी है. अभी भी मेरी कोशिश है कि जाँच हो. जब तक मेरे ऊपर लगे आरोपों की जाँच नहीं होती, तब तक मैं अनशन वापस नहीं लूँगा."

आरोपों से बेहद नाराज़ अन्ना हज़ारे ने कहा कि उनके पास एक झोला रहता है और वो लोगों से पैसे मांगकर खर्च चलाते हैं.

आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस को चुनौती दी कि वो पार्टी को मिलने वाले चंदे की सूची वेबसाईट पर डाले, लेकिन मनीश तिवारी का कहना था कि पार्टी हर साल आयकर रिटर्न फ़ाईल करती है और सारी जानकारी सार्वजनिक तौर से उपलब्ध है.

पत्र पर आपत्ति

उधर अन्ना हज़ारे के शनिवार को प्रधानमंत्री को लिखे पत्र की भाषा पर कपिल सिब्बल और अंबिका सोनी ने आपत्ति जताई.

सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने कहा, “ये किस तरह की भाषा है? पिछले 64 सालों में किसी ने भी किसी प्रधानमंत्री पर इस तरह से व्यक्तिगत तौर पर अशोभनीय ढंग से हमला नहीं किया. ये महात्मा गाँधी की सोच का प्रतीक नहीं है.”

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि अन्ना को प्रदर्शन का हक़ तो है, “लेकिन आप कहाँ प्रदर्शन करेंगे, ये कोई संवैधानिक हक़ नहीं है. अगर आप कहें कि उच्चतम न्यायालय के सामने 5,000-10,000 लोग खड़े कर दूँगा, तो कोई मानेगा.”

प्रदर्शन ग़ैर-कानूनी

उधर वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अनिश्चितकालीन प्रदर्शन को ग़ैर-कानूनी करार दिया.

उन्होंने कहा, “हमारे कानून में किसी को भी जान देने का हक़ नहीं है, इसलिए हमेशा से ही ये प्रणाली रही है कि प्रदर्शन निश्चित अवधि का होना चाहिए, ये अनिश्चित नहीं हो सकता.”

उधर अंबिका सोनी ने कहा कि अन्ना की ये सोच कि लोकपाल बिल पारित होने से देश में भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, तो ये सोच गलत है.

सोनी ने कहा, “क्या एक लोकपाल बिल भ्रष्टाचार खत्म कर देगा? लोगों को गुमराह किया जा रहा है कि लोकपाल बिल आया, भ्रष्टाचार खत्म हुआ.”

उन्होंने पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी पर चुटकी लेते हुए उनके दौर में दिल्ली में वकीलों के प्रदर्शन पर पुलिस बल के प्रयोग का वाकया याद दिलाया. अरविंद केजरीवाल के बारे में उन्होंने कहा, एक तरफ़ अरविंद खुद को आरटीआई कार्यकर्ता कहते हैं, जबकि यूपीए की सरकार ही आरटीआई कानून लेकर आई थी.

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