अन्ना पर कार्रवाई की आलोचना

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सरकारी लोकपाल विधेयक के ख़िलाफ़ आमरण अनशन पर जाने की तैयारी कर रहे अन्ना हज़ारे को हिरासत में लिए जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई है.

विपक्षी पार्टियों ने जहाँ अन्ना के ख़िलाफ़ कार्रवाई की आलोचना की है, तो केंद्र सरकार का कहना है कि ये क़ानून व्यवस्था का मामला है और अन्ना को हिरासत में लेना पुलिस का फ़ैसला है.

भारतीय जनता पार्टी ने अन्ना हज़ारे की गिरफ़्तारी की कड़ी आलोचना की है. पार्टी का कहना है कि इस गिरफ़्तारी से सरकार एक बड़ा सबक सीखेगी.

भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा, "ये बहुत खेदजनक और निंदनीय है. ये सरकार हर उस व्यक्ति को कुचल देना चाहती है, जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना चाहता है." उन्होंने कहा कि ये सरकार कुछ सबक नहीं सीखना चाहती.

बयान

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने एक बयान जारी करके अन्ना हज़ारे के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाई की आलोचना की है. पार्टी का कहना है कि ये कार्रवाई शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर हमला है.

पार्टी ने संसद में पेश किए गए लोकपाल विधेयक को कमज़ोर बताया है.

केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में विपक्ष के रुख़ की आलोचना की और कहा कि गृह मंत्री पी चिदंबरम को बयान देने का मौक़ा नहीं दिया गया.

उन्होंने कहा, "इस देश में सबको विरोध प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन क़ानून-व्यवस्था भी कोई चीज़ होती है. और हर चीज़ की एक प्रक्रिया होती है."

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने उन आरोपों को ख़ारिज किया कि केंद्र सरकार के निर्देश पर अन्ना हज़ारे और उनके समर्थकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई है.

प्रतिक्रिया

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Image caption अन्ना हज़ारे को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया है

उन्होंने कहा, "दिल्ली पुलिस किसी राजनीतिक दबाव में काम नहीं कर रही है. जब भी संसद का सत्र चलता है, ऐहतियात के रूप में धारा 144 लगा दी जाती है."

दूसरी ओर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी अन्ना के ख़िलाफ़ कार्रवाई को लोकतंत्र की हत्या बताया है.

पत्रकारों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, "ये लोकतंत्र पर कुठाराघात है. केंद्र में बैठे लोगों को लोकतांत्रिक मूल्यों का अहसास है. ये प्रतिरोध को कुचलने की कोशिश है, लेकिन ऐसा हो नहीं सकता. ये आपातकाल का पूर्वाभ्यास है, जिसे देश की जनता बर्दाश्त नहीं करेगी."

उन्होंने कहा कि अन्ना को अविलंब छोड़ा जाना चाहिए और उन्हें आंदोलन की आज़ादी मिलनी चाहिए.

सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने भी कार्रवाई की आलोचना की है, तो लेखिका अरुंधति रॉय ने अन्ना हज़ारे को हिरासत में लिए जाने की कड़ी निंदा की है.

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