अन्ना पर हंगामा, संसद में नहीं हुआ कामकाज

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मंगलवार को दिन भर जहाँ भारत के विभिन्न शहरों में अन्ना हज़ारे के समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं वहीं राजनीतिक सत्ता के गलियारों में भी इसी मुद्दे का बोलबाला रहा.

संसद के दोनों सदनों में अन्ना हज़ारे को हिरासत में लिए जाने के लेकर काफ़ी शोरगुल हुआ और कामकाज नहीं हो सका.

मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की माँग थी कि प्रशन काल स्थगित किया जाए और अन्ना को हिरासत में लिए जाने पर चर्चा हो. लेकिन कांग्रेस ने इसका विरोध किया. इसके बाद हुए शोरशराबे के बीच स्पीकर ने कार्यवाही पहले 12 बजे तक और बाद में दिन भर के लिए स्थगित कर दी. राज्य सभा में भी यही स्थिति रही.

संसद ने बाहर लोक सभा में विपक्ष की नेता सुषणा स्वराज ने सरकार को आड़े हाथों लिया.

उनका कहना था, “वर्ष 2011 दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए जाना जाएगा. ये सरकार आपातकाल के पथ पर चल रही है.. हमने प्रश्न काल स्थगन के लिए नोटिस दिया था. हमारे प्रश्न काल का नोटिस अस्वीकार करते हुए भी अपने विशेषाधिकार के अंतरगत स्पीकर ने हमें बोलने की अनुमित दी थी. लेकिन संसदीय कार्यमंत्री समेत कांग्रेस के लोगों ने हमें बोलने नहीं दिया. ”

सुषमा ने कहा, "सदन को चलाने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती है लेकिन आज सदन का काम रोकने का काम सरकार ने किया है. हम चाहते हैं कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री बयान दें, गृह मंत्री का बयान हमें स्वीकार्य नहीं है. सरकार आपातकाल की ओर बढ़ रही है. धारा 144 को जीपी पार्क में लगी थी फिर अन्ना को क्यों उठाया."

'विरोध का तरीका होना चाहिए'

उधर संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल का कहना था कि सरकार केवल इतना चाहती था कि प्रश्न काल होने दिया जाए जिसके बाद चर्चा हो सकती है लेकिन विपक्ष ने ऐसा नहीं होने दिया. वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी कहा कि गृह मंत्री को विपक्ष ने बयान नहीं दिया.

वामदलों ने कहा है कि वे भले ही अन्ना के सभी बातों से सहमत नहीं है लेकिन उनको हिरासत में लेने की आलोचना करते हैं.

सीपीएम सांसद बृंदा करात ने कहा, "अन्ना हज़ारे के अनशन पर रोक लोकतांत्रिक तरीकों से विरोध करने के हक़ पर हमला है. ये अलोकतांत्रिक क़दम मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हो रहा है. प्रधानमंत्री को संसद में बताना चाहिए कि किन हालातों में अन्ना को हिरासत में लिया गया."

जबकि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अन्ना को हिरासत में लेने का बचाव किया है..

उनका कहना था, “विरोध प्रदर्शन करना सबका अधिकार है. कोई भी विरोधी स्वरों को दबाने की कोशिश नहीं कर रहा है. लेकिन इसका एक तरीका होता है. अगर पुलिस को लगता है कि किसी क़दम से क़ानून व्यवस्था की दिक्कत हो सकती है तो पुलिस कुछ शर्तें लगा सकती है.”

मंगलवार को तो संसद की कार्यवाही स्थिगत हो गई है लेकिन अन्ना हज़ारे का मामले जल्द रफ़ा दफ़ा होने वाला नहीं है और मॉनसून सत्र में इसकी फिर गूँज सुनाई देगी.

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