सरकार की समझ पर सवाल

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दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अख़बारों ने अन्ना हज़ारे और उनके समर्थकों पर दिल्ली पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई की निंदा की है और इसके लिए सरकार की समझ पर सवाल उठाए हैं.

अधिकांश अख़बारों ने अपनी संपादकीय टिप्पणियों में कहा है कि सरकार चाहती तो इससे बचा जा सकता था.

अख़बारों ने सवाल उठाए हैं कि क्या ये संभव है कि अन्ना हज़ारे की बात मानकर संसदीय प्रणाली को दरकिनार कर उनकी मर्ज़ी का लोकपाल विधेयक पारित करवाया जा सके.

कुछ ने विपक्षी दलों को भी आड़े हाथों लिया है और इस पूरे मामले में उनकी भूमिका पर सवाल उठाए हैं.

'राजनीतिक मूर्खता'

'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने अपनी संपादकीय टिप्पणी में लिखा है कि एक गांधीवादी नेता को गिरफ़्तार करके सरकार न केवल नागरिक समाज के हाथों खेल गई बल्कि उसने आमलोगों को भड़का दिया जो सरकार में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार से नाराज़ हैं.

अख़बार ने लिखा है, "सरकार ने एक दंतविहीन लोकपाल विधेयक लाकर अपना कोई भला नहीं किया है. यदि सरकार अन्ना हज़ारे की टीम के साथ अपनी बातचीत के आधार पर एक कड़ा विधेयक लाती तो वो इस आंदोलन की हवा निकाल सकती थी."

'हिंदू' ने आंदोलन से निपटने के लिए सरकार के रवैए के ख़िलाफ़ सबसे कड़ी टिप्पणियाँ की हैं.

अख़बार लिखता है, "नैतिक अधिकार से रहित एक भ्रष्ट सरकार के पास एक वैधानिक जनआक्रोश से तर्कसंगत ढंग से निपटने की तैयारी ही नहीं है."

'हिंदू' ने लिखा है कि समय समय पर होता है कि ऐसी परिस्थितियों में सरकार में अफ़रातफ़री मच जाती है और वे ऐसे निर्णय लेती है जिसके बारे में सरकार से बाहर हर व्यक्ति को समझ में आ रहा होता है कि ये 'राजनीतिक मूर्खता'है.

अख़बार ने लिखा है, "अगर सरकार भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लोगों की नाराज़गी को नहीं समझती है, वह लोकतंत्र के मूल्यों और आदर्शों का सम्मान करते हुए एक ऐसा लोकपाल विधेयक नहीं लाती है जो लोगों में दोबारा विश्वास पैदा कर सके तो सरकार को अगले चुनाव में इसका राजनीतिक मूल्य चुकाना पड़ेगा."

'हिंदुस्तान टाइम्स'ने इस घटनाक्रम की तुलना विश्व कप से की है और कहा है कि जिस तरह दोनों टीमों के कप्तान अपनी रणनीति बनाते हैं, यहाँ भी बनाई गई थी लेकिन ये समझना कठिन नहीं है कि कौन ज़्यादा दूरदर्शी नीतियाँ बना रहा है.

अख़बार ने कहा है कि जिस काम को सरकार कुशलता के साथ कर सकती थी उसे उसने ख़ुद बिगाड़ लिया है.

उसकी सलाह है कि खेल से बाहर होने से पहले सरकार को किसी अच्छी टीम की तरह 'प्लान-बी' के साथ सामने आना चाहिए.

समझौते की सलाह

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Image caption अख़बारों ने कहा है कि सरकार को भ्रष्टाचार के निपटने में सख़्ती दिखानी होगी

अंग्रेज़ी के अख़बारों की तरह हिंदी के अख़बारों ने भी सरकार को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जनभावना को समझने की सलाह दी है.

'दैनिक हिंदुस्तान' ने कहा है कि सरकार की संवादहीनता की वजह से जनता को ये समझाना कठिन हो गया कि अन्ना की टीम ज़िद पर अड़ी हुई है. अख़बार का कहना है, "लचीलेपन से संवाद का रास्ता बनाए रखा जा सकता था और फिर से देश में जयप्रकाश नारायण या वीपी सिंह के आंदोलन जैसा माहौल बनाने से बचा जा सकता था. अगर सरकार लचीलापन दिखाती तो इस बात का भी यक़ीनन असर होता कि आंदोलनकारी हठधर्मिता दिखा रहे हैं."

अख़बार का कहना है कि बुनियादी मुद्दा लोकपाल या जनलोकपाल नहीं है. बुनियादी मुद्दा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जनता की नाराज़गी है.

अपनी संपादकीय टिप्पणी में हिंदुस्तान ने सलाह दी है, "देर अब भी नहीं हुई है. अगर फिर से बातचीत की पहल की जाए और तकनीकी नुक़्तों पर जूझने की बजाय भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जनभावना को समझौते हुए किसी समझौते पर पहुँचा जाए. समाज और व्यवस्था के बीच टकराव नहीं सहयोग का माहौल देश की तरक्की के लिए ज़रुरी है."

'जनसत्ता' ने लिखा है कि यह साफ़ दिख रहा है कि निषेधाज्ञा और गिरफ़्तारियों के साथ बल पर इन जन आंदोलन से सरकार नहीं निपट सकती.

'दैनिक जागरण' ने संपादकीय में लिखा है, "केंद्रीय सत्ता न केवल अहंकार से ग्रस्त है बल्कि उसे उस जनता की भावनाओं की भी परवाह नहीं है जिसके कारण शासन की बागडोर उसके हाथों में है."

अख़बार ने हिंदू की ही तरह से सरकार को सलाह दी है, "सच्चाई यह है कि सरकार ने पिछले सात साल में कोरे आश्वासन देने के अवावा कुछ नहीं किया है. इसके लिए उसे न केवल अपनी भूल सुधारनी होगी बल्कि ऐसे क़दम उठाने होंगे जिससे देश का विश्वास फिर क़ायम हो सके."

'नवभारत टाइम्स' अपनी टिप्पणी में सवाल उठाया है, "क्या प्रशासन का दमनकारी रवैया ज़रुरी है? सरकार अगर अन्ना को अनशन कर लेने देती तो शायद तनाव इतना न बढ़ता. लेकिन अब इस क़दम से आंदोलन को और बल मिलेगा और उनको जनसमर्थन बढ़ेगा यह सरकार के बौद्धिक दिवालिएपन का सूचक है."

उसने विपक्षी दलों के रवैए पर भी निशाना साधा है और कहा है कि 'विपक्ष चाहता है कि जब चाहे अन्ना पर बोले और जब चाहे चुप रहे.'

'नवभारत टाइम्स'की संपादकीय में लिखा गया है, "ठंडे दिमाग से सोचा जाए तो क्या ये संभव है कि संसदीय व्यवस्था को दरकिनार कर अन्ना की मर्ज़ी का लोकपाल विधेयक पास करा लिया जाए? रास्ता तो इसी प्रजातांत्रिक ढाँचे से निकालना होगा."

'दैनिक भास्कर' ने पहले पन्ने पर विशेष टिप्पणी की है जिसमें कहा गया है कि सरकार को जनता के सामने झुकने की आदत डाल लेनी चाहिए.

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