'सर के ऊपर से पानी गुज़र चुका है'

तिहाड प्रदर्शन
Image caption तिहाड़ के बाहर लोगों ने बार-बार कहा है कि ये जोश मात्र दो या तीन दिन के लिए नहीं है.

तिहाड़ जेल के बाहर का हुजूम देखने लायक है. लोगों के हाथों में तिरंगे, साथ में है नारों की गूँज. वंदे-मातरम्. भ्रष्टाचार ख़त्म करो. हाथों में बैनर. एक में लिखा था - जो अन्ना नहीं वो गन्ना है.

छोटे-बड़े, बूढे-जवान, छात्र-छात्राएँ, सभी जोश में भरे हुए. कोई ये नहीं देख रहा कि दूसरा क्या कर रहा है. चार-पाँच लोगों के झुंड में लगे, अपनी ही धुन में नारेबाज़ी कर रहे थे. जेल के बाहर रात के रुके कुछ लोग ज़मीन पर भी लेटे हुए थे. पास एक जगह था पिघली हुई मोमबत्ती का ढेर.

जैसे उत्सव का सा माहौल था. लोकतंत्र का उत्सव.

सबसे बड़ी बात, कि लोगों ने बार-बार कहा है कि ये जोश मात्र दो या तीन दिन के लिए नहीं है, बल्कि जब तक अन्ना अपने मक़सद में कामयाब नहीं हो जाते तब तक उनका ये आंदोलन चलेगा.

कोई दफ़्तर से काम छोड़कर आया था, तो कोई छुट्टी लेकर. किसी ने आठ दिनों तक काम-धंधा बंद कर दिया था.

एक महिला से मुलाकात हुई जो घर से खाना और पानी लाकर लोगों को दे रही थीं. वो भी भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं.

“जब हम मकान ठीक करते हैं, तो ऐसा लगता है कि घर गिर जाएगा. बिल्डर के दफ़्तर में कई दिनों तक खड़े रहते हैं. कोई फ़ायदा नहीं होता.”

दूसरे एक व्यक्ति ने कहा, लोगों को खाना दिया जा रहा है लेकिन लोग खा नहीं रहे हैं क्योंकि अंदर अन्ना भूखे हैं.

किनारे पर पाँच-छह छात्राएँ पूरी जान से नारे लगा रही थीं: एक दो तीन चार, बंद करो ये भ्रष्टाचार.

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Image caption बलदेव देख नहीं सकते, लेकिन तिहाड़ ज़ेल के बाहर खड़े हज़ारों लोगों की तरह उनके जोश में कोई कमी नहीं थी.

बलदेव चंद्र गुलाटी गैर-सरकारी संगठन नवप्रेरणा में कार्यरत हैं. वो देख नहीं सकते, लेकिन तिहाड़ ज़ेल के बाहर खड़े हज़ारों लोगों की तरह उनके जोश में कोई कमी नहीं थी.

“जो लोग देख नहीं सकते, उन्हें भी भ्रष्टाचार डंक की तरह काटता है. ऐसा लगने लगा है कि भ्रष्टाचार हमारी अनुवांशिक गड़बड़ी बन गई है, लेकिन जब अन्ना ने आंदोलन को खड़ा किया तो लगा कि भ्रष्टाचार को मिटाने की एक और कोशिश की जा सकती है.”

लेकिन सभी की तरह बलदेव से भी मैने वही सवाल पूछा. क्या उनके आंदोलन में भाग लेने से समाज में कुछ फ़र्क पड़ेगा?

“मेरे यहाँ आने पर बहुत फ़र्क पड़ेगा. इतना फ़र्क पड़ेगा कि अगले छह महीने में आपको भ्रष्टाचार में काफ़ी कमी दिखाई देगी. अगर मैं यहाँ नहीं आता तो भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आंदोलन इतना मज़बूत नहीं होता. मेरे यहाँ आने से आंदोलन को ताकत मिली है.”

गुलाटी कहते हैं प्रधानमंत्री पद को भी विधेयक के दायरे में आना चाहिए क्योंकि जब पहले नरसिम्हा राव की सरकार थी, तो आरोप लगे थे कि सांसदो को कथित तौर पर खरीदा गया.

महात्मा

तिहाड़ के बाहर खड़े महात्मा गाँधी की वेशभूषा में खड़े 21-साल के संजय शर्मा फ़ोटोग्राफ़र और कंप्यूटर ऑपरेटर हैं. उन पर आसानी से सभी की निगाहें चली जाती हैं. जब उन्होंने परिवार से तिहाड़ जाने की इच्छा व्यक्त की, तो परिवारवालों ने उन्हें पागल कहा. लेकिन उन्होंने किसी की परवाह नहीं की.

संजय झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं. वो कहते हैं कि उनके जैसे लोगों के लिए देश में कुछ भी नहीं होता.

“एमएलए आते हैं, हमेशा वोट मांगकर जाते हैं. पिछले साल मेरा वोटर-आई डी कार्ड बनने में 500 रुपए मांगे गए थे.

गुस्सा

Image caption संजय कहते हैं कि पिछले साल उनका वोटर-आई डी कार्ड बनाने के लिए उनसे 500 रुपए मांगे गए थे.

तिहाड़ के बाहर इकट्ठी भीड़ में कई लोगों में सरकार, खासकर कपिल सिब्बल से, खासी नाराज़गी थी और सबसे ज़्यादा नारे उन्हीं के ख़िलाफ़ लग रहे थे. कुछ जगहों से सोनिया गाँधी के ख़िलाफ़ भी नारे सुनाई दे रहे थे.

हालांकि एक व्यक्ति ने कहा कि उन्हें ना कांग्रेस और भाजपा नहीं, सिस्टम यानि तंत्र से नाराज़गी है जो सड़ा-गला हो गया है.

एक दूसरे व्यक्ति ने कहा, “ये जो लोग आए हैं, अपना घर-बार छोड़कर आए हैं क्योंकि वो पक चुके हैं. सर के ऊपर से पानी गुज़र चुका है. कहीं कोई सुरक्षा नहीं है. हर डिपार्टमेंट में लोग बिके हुए हैं. बिना पैसा दिए कोई काम नहीं होता. चपरासी से लेकर अफ़सर तक पैसे खाते हैं. इतना परेशान कर रखा है लोगों ने. अब हमारी बरदाश्त की सीमा ख़त्म हो चुकी है.”

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