ताकि दुर्घटना न ले किसी की जान

  • 16 अगस्त 2013
Image caption भारत में सड़क हादसों में हर साल लगभग डेढ़ लाख लोगों की मौत हो जाती है.

सड़कों पर तेज़ रफ्तार चलती गाड़ियां और मंज़िल तक पहुंचने की जल्दी, लेकिन अक्सर ये सफर एक ऐसे मोड़ पर खत्म होता है जहां ज़िंदगी और मौत का फासला बेहद कम हो.

भारत सरकार के एक आंकड़े के मुताबिक हर चार मिनट में एक सड़क हादसा होता है. इनमें से कई जानें बचाई जा सकती हैं अगर समय रहते व्यक्ति को अस्पताल पहुंचा दिया जाए.

कुछ ऐसी ही कोशिश है रमेश कुशवाहा की जो बीबीसी की विशेष श्रृंखला 'सिटीज़न रिपोर्ट' का हिस्सा बने थे. पढ़िए रमेश कुशवाहा की कहानी उनका अपनी ज़बानी.

''मेरा नाम रमेश बाबू कुशवाहा है और मैं पेशे से वकील हूं. आम लोगों की तरह मेरे लिए भी ज़िंदगी आम रफ्तार से चल रही थी लेकिन अचानक हुए एक हादसे ने मुझे झकझोर कर रख दिया.

1999 के अगस्त महीने में स्कूल से पढ़ाकर लौटने के दौरान मेरी पत्नी एक एक्सीडेंट का शिकार हो गई. काफी समय तक सड़क पर पड़े रहने और इलाज के अभाव में उसने दम तोड़ दिया.

इमरजेंसी सेवा

मेरी पत्नी अक्सर मुझसे कहा करती थी कि दुर्घटना के शिकार लोगों की मदद करने वाला कोई नहीं और हमें ऐसे लोगों की मदद के लिए कुछ करना चाहिए.

अपनी पत्नी की मौत के बाद मुझे एहसास हुआ कि भारत में आपात सेवाओं की कितनी कमी है कि और व्यवस्था इतनी ढीली है कि दुर्घटना का शिकार व्यक्ति इस लावरवाही के चलते ही दम तोड़ देता है.

ऐसे में साल 1999 में मैंने सड़क दुर्घटनाओं का शिकार हुए लोगों के लिए एक एमरजेंसी सेवा की शुरुआत की.

अपने कुछ साथियों की मदद से मैंने ग्वालियर और उसके आसपास के इलाकों में मोबाइल के कुछ नंबर प्रचारित किए गए ताकि कहीं भी कभी भी कोई हादसा हो तो जल्द से जल्द मदद पहुंचे.

हमने दो गाड़ियों का इंतज़ाम कर एंबुलेंस बनाईं जिनमें प्रशिक्षित डॉक्टरों की मदद से प्राथमिक उपचार का इंतज़ाम किया गया.

हमारी कोशिश थी कि मरीज़ को अस्पताल तक पहुंचाने के क्रम में उसे प्राथमिक उपचार दे दिया जाए ताकि खून बहने उसका नुकसान न हो.

इसी दौरान उसके पास मौजूद चीज़ों से हम पीड़ित के घर का पता और बाकी जानकारियां हासिल करते हैं, ता

कि जल्द से जल्द घर वालों को सूचना दी जा सके.

अस्पताल पहुंचने के बाद पीड़ित के परिजनों के पहुंचने तक हम एक्स-रे, सीटी स्कैन, खून का इंतज़ाम जैसी सभी ज़रूरते पूरा करते हैं.

'गोल्डन आवर'

ग्वालियर की रहने वाली कीर्ति सिंह कहती हैं, ''कुछ महीने पहले सड़क पार करते हुए मेरी मां का एक्सीडेंट हो गया था. दुर्घटना होने के आधे घंटे के भीतर का समय गोल्डन आवर होता है. इस समय के दौरान अगर-अगर कम से खून बहे और मरीज़ को सही उचार मिल जाए तो उसकी जान बचाई जा सकती है. मैं जब तक अस्पताल पहुंची मैंने देखा कि मां की जांच और उनका इलाज शुरु हो चुका था.''

दुर्घटना का शिकार हुए लोगों को अस्पताल पहुंचाने के इस क्रम में मैंने मेरे साथियों ने ये भी देखा कि आपात स्थिति में अस्पताल पहुंचने के बावजूद अक्सर मरीज़ों का इलाज शुरु नहीं होता.

इस समस्या से निपटने के लिए हमने एक अनोखा उपाय खोजा.

हमने लापरवाह डॉक्टरों की वीडियो रिकार्डिंग शुरु की ताकि मेडिकल काऊंसिल को ये देखा सकें कि गंभीर से गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचने के बावजूद अक्सर डॉक्टर मरीज़ों को कई घंटे तक हाथ नहीं लगाते.

इसका बेहद सकारात्मक असर हुआ और डॉक्टर मुस्तैद हो गए.

समय रहते मदद

इस सेवा के ज़रिए उन लोगों को भी इलाज में मदद की जाती है जिनका कोई क़रीबी आसपास मौज़ूद नहीं. या फिर हादसे का शिकार हुए वो लोग जिनकी मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं.

पिछले 11 सालों में ग्वालियर ही नहीं बल्कि कई शहरों के ऐसे बहुत से लोग हैं जो समय रहते मिली इस मदद से एक बड़ी दुर्घना को झेल गए.

वकालत के अपने पेशे के अलावा इस सेवा को जारी रखना रमेश के लिए आसान नहीं. समय के अलावा पैसा भी एक बहुत बड़ी चुनौती है. लेकिन मैंने अपने आसपास एक ऐसी व्यवस्था तैयार की है कि उनके न होने पर भी सालों साल ये काम जारी रहे.

अपनी गाड़ियों को खाली समय में हम एंबुलेंस और टैक्सी की तरह इस्तेमाल करते हैं और मरीज़ों को घर पहुंचाने के लिए 300 रुपए का शुल्क लेते हैं. प्राथमिक चिकित्सा की दवाओं का इंतज़ाम ग्वालियर स्थित रेड-क्रॉस संस्था से होता है.

इसी तरह कई सालों से हमारी सेवा का खर्च चल रहा है. मैं चाहता हूं कि मेरे जाने के बाद भी ये सेवा इसी तरह सालों-साल चलती रहे.

रमेश कुशवाहा की ये कोशिश आपको कैसी लगी हमें ज़रूर बताएं. अगर आप भी अपने इलाके में ऐसी ही कोई पहल करना चाहते हैं तो सिटीज़न रिपोर्ट के ज़रिए आप उनसे संपर्क कर सकते हैं. हमें लिखें hindi.letters@bbc.co.uk

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