अपनों के लिए उठी 'गाँव की आवाज़'

गाँव की आवाज़
Image caption गाँव वालों को इस सेवा से आस-पास की ख़बरें आसानी से अपनी भाषा में मिल रही हैं

लखनऊ से लगभग अस्सी किलोमीटर दूर दिन के ग्यारह बजे- रामपुर मथुरा ब्लॉक के आस-पास के गाँव में ट्रिन.. ट्रिन.. मोबाईल की घंटी बजती है.

फोन उठाने पर आवाज़ आती है, "विकास खंड रामपुर मथुरा, बीती रात बनबसा बैराज से अचानक अठहत्तर हजार क्यूसेक पानी छोड़े जाए से एकायक रामपुर मथुरा क्षेत्र की घाघरा और चौका नदिया का जलस्तर बढ़ गवा है जीसे मनेरा,दुबेपुरवा,अंगरउरा बाढ़ की चपेट मा आय गए हैं."

शायद आपको भाषा समझ में न आए मगर आमतौर पर शहरी माध्यम माने जाने वाले मोबाइल पर ये अवधी भाषा में समाचार थे.

पर जिस डिजिटल डिवाडड को शहरों और गाँवों के बीच बढ़ती दूरी के लिए जिम्मेदार माना जाता है वही तकनीक रामपुर मथुरा ब्लॉक के बीस गाँवों को अपने आस-पास से जोड़ रही है.

Image caption सत्येंद्र प्रताप सिंह ख़ुद ख़बरें लेकर आते हैं

एक राष्ट्रीय समाचार पत्र के पूर्व पत्रकार और गाँव के लगभग दस साल प्रधान रहे सत्येन्द्र प्रताप सिंह और उनके पत्रकार मित्र सुनील सक्सेना के दिमाग में एक अनूठा विचार आज से डेढ़ साल पहले आया कि गाँव के लोग जिनमें ज़्यादातर अशिक्षित हैं उन्हें जागरूक करने के लिए मोबाइल फ़ोन एक अच्छा माध्यम हो सकता है.

यहीं से शुरू हुआ “गाँव की आवाज़” नामक अनूठी मोबाइल क्षेत्रीय सामुदायिक समाचार सेवा का सफ़र. सुनील बताते हैं गाँव की आवाज़ गाँव के लोगों के लिए उन्हीं की भाषा में है.

कैसे हो रही है सेवा

तीस-तीस सेकेण्ड के दो बुलेटिन सुबह ग्यारह बजे और शाम को पाँच बजे लोगों के फ़ोन पर प्रसारित किए जाते हैं.

शुरुआती दौर में ये सेवा निःशुल्क थी पर जुलाई 2010 से ये भुगतान आधारित हो गई और इसका मासिक शुल्क बीस रुपए है.

बीस लोगों से शुरू हुआ ये कारवाँ आज ढाई सौ का आँकड़ा पार कर चुका है. नोएडा में बसे सुनील सक्सेना तकनीकी पक्ष सँभालते हैं जबकि गाँव से ख़बरों का संकलन सत्येन्द्र खुद करते हैं. इसमें वह शिक्षक दिव्यंकर प्रताप और छात्रा प्रिया गुप्ता की मदद लेते हैं.

Image caption सुनील सक्सेना इस सेवा को तकनीकी सहायता उपलब्ध करा रहे हैं

रामपुर मथुरा ब्लॉक के आस-पास के बीस गाँवों से सामुदायिक महत्त्व की पहले ख़बरें जुटाई जाती हैं जिनमे सार्वजनिक वितरण प्रणाली, दुर्घटना, बिजली कैम्प और खेती जैसे विषय प्रमुख रहते हैं. इनको मोबाइल से रिकॉर्ड कर ऑडियो फाइल के रूप में एमएमएस से नोएडा सुनील सक्सेना को भेजा जाता है जहाँ से वे उसे सर्विस प्रोवाइडर कंपनी को भेज देते हैं.

इस सेवा से जुड़े सभी ग्राहकों के मोबाइल पर एक निश्चित समय पर एक फोन आता है और जब वो फोन उठाते हैं तो उन्हें वही रिकॉर्डेड समाचार सुनने को मिलता है.

सत्येन्द्र इसमें एक स्थानीय संपादक की भूमिका निभाते हैं. इस परियोजना के लिए अमेरिका के नाइट फाउन्डेशन से धन मिल रहा है पर उसकी मियाद अब ख़त्म होने को है इसके बाद गांव की आवाज़ का भविष्य अनिश्चित है.

ग्राहकों के अनुभव

गाँव के निवासी शकील बताते हैं कि जो ख़बर रेडियो, टीवी और समाचार पत्र नहीं बताते वो 'गाँव की आवाज़' से पता चलता है. अभी रमज़ान के महीने में इफ़्तार और सहरी का टाइम इससे पता चल जाता है.

किसान महेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं कि खेत में काम करते वक्त भी उन्हें सारी जानकारी मिल जाती है उस समय पेपर पढ़ने का समय नहीं रहता.

दलित शिक्षिका सिया मौर्या मानती हैं कि गाँव के अशिक्षित दलितों को इससे अपने अधिकारों का ज्ञान होता है.

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