रेल सुरक्षा में भारी कमियाँ: कैग

भारतीय रेल
Image caption ऑडिट के मुताबिक रेलवे सुरक्षा बल और राज्य सरकार के बीच तालमेल की कमी है जिसकी वजह से रेल तंत्र की सुरक्षा में कमियाँ हैं.

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी कैग की भारतीय रेल पर ताज़ा ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि उसने वर्ष 2009-10 में हर यात्री की सुरक्षा पर मात्र 2.86 रुपए ख़र्च किए, हालाँकि पिछले पाँच वर्षों में तोड़-फोड़ की घटनाओं में वृद्धि हुई है.

रिपोर्ट के मुताबिक़ प्रदर्शनों के वजह से आवागमन में हुई परेशानियों की वजह से लोगों का विश्वास रेल में कम हुआ है.

भारतीय रेल की सुरक्षा प्रबंधन नाम से जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2005-06 में जहाँ छह तोड़-फोड़ की घटनाएँ हुईं, वर्ष 2009-10 में इनकी संख्या 14 हो गईं.

कैग ने अपनी रिपोर्ट में वर्ष 2008 में मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन और ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पर हमले का ज़िक्र है.

ऑडिट के मुताबिक़ रेलवे सुरक्षा बल और राज्य सरकार के बीच तालमेल की कमी है जिसकी वजह से रेल तंत्र की सुरक्षा में कमियाँ हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है- रेल स्टेशनों पर पहुँचने वाले लोगों को नियंत्रित करने के प्रयास नहीं किए गए हैं. ऐसे रेल स्टेशन जिन्हें जोखिम भरा माना गया है, उन्हें ख़ाली करने के तरीक़ों को ढूँढने के प्रयास नहीं किए गए हैं.

सुरक्षा तंत्र में कमी

एक टेस्ट ऑडिट में पाया गया कि 74 रेल स्टेशनों के क़रीब 30 प्रतिशत प्रवेश द्वारों की सुरक्षा के लिए कोई भी सुरक्षाबल तैनात नहीं था.

रिपोर्ट के मुताबिक़ जुलाई 2008 में सुझाए गए एकीकृत सुरक्षा तंत्र को मार्च 2011 तक किसी भी रेल ज़ोन में कार्यान्वित नहीं किया गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है-इलेक्ट्रॉनिक निरीक्षण तंत्र जैसे बैगेज स्कैनर्स और मेटल डिटेक्टर को कार्यान्वित करने की प्रक्रिया धीमी है और अंतरराष्ट्रीय स्तर की नहीं है. ज़्यादातर ट्रेन बिना किसी पहरेदार के चलती हैं और कई मामलों में इन पहरेदारों के पास कोई हथियार नहीं होते हैं. पिछले पाँच वर्षों में यात्रियों के ख़िलाफ़ आपराधिक घटनाओं में 15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.”

ऑडिट ने भारतीय रेल की आलोचना करते हुए कहा है कि उसने राज्य सरकार से विचार-विमर्श करके अपनी संपत्ति की सुरक्षा करने के लिए कोई योजना तैयार नहीं की.

ऑडिट में पाया गया कि प्रतिदिन मात्र 32 प्रतिशत ट्रेनों में सुरक्षा के लिए पहरेदार होते हैं. एक टेस्ट ऑडिट में पता चला कि कई प्रतिष्ठित गाड़ियों जैसे मुंबई राजधानी में, और दूसरी कुछ गाड़ियों में, जो नक्सल प्रभावित या डकैतों के प्रभाव वाले क्षेत्रों से गुज़रती हैं, उनमें सुरक्षाबल नहीं होते हैं.

इस बारे में कोई मानक भी तय नहीं किए गए हैं कि किसी ट्रेन में सुरक्षाबलों की कितनी उपस्थिति हो, उन्हें हथियार दिए जाएँ कि नहीं, या फिर किन ट्रेन को सुरक्षा दी जाए.

एक और समस्या जिससे भारतीय रेल जूझ रही है वो है कर्मचारी की कमी. कैग ऑडिट के मुताबिक़ रेल सुरक्षा बल में कर्मचारी की कमी 11 प्रतिशत से बढ़कर 19 प्रतिशत हो गई है.

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