अन्ना और आंदोलन

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भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ और जनलोकपाल के लिए अन्ना का आंदोलन सफल रहा या विफल इसकी असल विवेचना तो आने वाले दिनों में होगी लेकिन आंदोलन से कुछ बातें उभर कर ज़रुत सामने आईं. कुछ अच्छी कुछ बुरी, और कुछ अटपटीं.

आपातकाल के बाद पहली बार किसी मुद्दे पर इतनी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे हैं और एक मुद्दे पर एकजुट हुए हैं इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है.

लोगों की संख्या और भीड़ के प्रकार पर जो भी बहस हो लेकिन देश भर में भ्रष्टाचार को लेकर एक असंतोष था और वो बाहर निकला ज़रुर.

कमोबेश आंदोलन शांतिपूर्ण रहा इसमें भी कोई शक नहीं किया जा सकता और हां संभवत पहली बार जनता के दबाव में सरकार ने संसद में क़ानून न सही प्रस्ताव तो पारित किया ही है.

पत्थर तबीयत से उछाला गया है देखना है आसमान में छेद होता है या नहीं.

कहा जा रहा है कि देश इस आंदोलन में मीडिया के अलावा ट्विटर, फेसबुक और सोशल मीडिया का भी बड़ा हाथ रहा है.

मैंने भी सोशल मीडिया के ज़रिए आंदोलन को समझने की कोशिश की. बहस भी हुई जिसमें दो बातें साफ हुईं.

एक आप या तो आंदोलन के समर्थन में रह सकते हैं या आंदोलन के विरोध में..बीच में कुछ भी नहीं जबकि मेरा मानना है कि काले और सफेद यानि विरोध और समर्थन के बीच कहीं सच छुपा होता है जिसकी तलाश होती रहनी चाहिए.

अन्ना के समर्थकों को प्रधानमंत्री के घर पर धरना देते हुए एक और अद्बुत चीज़ दिखीं.

धरने के लिए जाते लोगों को पुलिस विनम्रता से कह रही थी..रास्ता बंद है आप थाने में चले जाइए.

चाणक्यपुरी थाने के पास पुलिसवाले हाथ जोड़कर खड़े थे और तिरंगा लिए समर्थकों को देखते ही रास्ता दिखाकर कहते आप यहां से अंदर थाने में जाएं....मैंने पहले कभी दिल्ली पुलिस को इतना संयमित नहीं देखा था.

कुछ बातें अटपटी भी लगीं मसलन नेताओं और फिर उसके बाद अन्ना के मंच से अटपटी बयानबाजियां.

नेताओं से और कोई उम्मीद थी भी नहीं. शरद यादव के शब्दों में उनका काम ही पगड़ी उछालना है लेकिन अन्ना या उनके मंच पर आने वालों से भड़काऊ भाषण या अनाप शनाप न बोले जाते तो आंदोलन की गरिमा और बेहतरीन होती.

चाहे ओम पुरी हों, किरन बेदी हों या केज़रीवाल हों..कहते हैं जीभ पर कंट्रोल आदमी को दूर तक ले जाता है..फिर अरिंदम चौधरी जैसे व्यक्ति को मंच पर बुलाना भी अटपटा ही था क्योंकि उन पर फ़र्ज़ीवाड़े के आरोप हैं.

जब ये बातें मैंने कहीं रखीं तो किसी ने जवाब दिया कि बड़े-बड़े आंदोलनों में ऐसी छोटी छोटी बातें हो जाती हैं...हां ये बात तो सही है लेकिन....ये बात भी ध्यान में रहे कि इन्हीं छोटी छोटी बातों से ही कोई आंदोलन बड़ा बनता है.

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