'कश्मीर साहित्य महोत्सव' रद्द

कश्मीर हिंसा
Image caption भारत प्रशासित कश्मीर में हिंसा का दौर वक्त वक्त पर ख़ुद को दोहराता रहा है.

भारत प्रशासित कश्मीर में सितंबर में होने वाला पहला साहित्य महोत्सव रद्द कर दिया गया है.

ये फ़ैसला तब लिया गया जब कई लेखकों ने हिंसा की आशंका जताते हुए कहा कि इस महोत्सव के श्रीनगर में आयोजित होने से दुनिया को ये ‘ग़लत’ संदेश जाएगा कि कश्मीर में हालात सामान्य हैं.

ये तीन दिवसीय महोत्सव आगामी 24 से 26 सितंबर को आयोजित किया जाना था, लेकिन आयोजकों का कहना है कि कुछ लेखकों और फ़िल्मकारों ने इसके विरोध में एक सार्वजनिक पत्र लिखा जिसके बाद कार्यक्रम रद्द करने का फ़ैसला लिया गया.

भारत प्रशासित कश्मीर में जाने माने लेखक बशारत पीर और मिर्ज़ा वहीद ने ख़त में लिखा कि ‘ऐसे महोत्सव के राज्य में आयोजित किए जाने से राज्य सरकार के उस एजेंडे को बढ़ावा मिलेगा जिसमें वो कहती है कि कश्मीर के हालात ठीक हैं.’

जम्मू कश्मीर में 1989 के बाद से कई बार हिंसा हुई है और ख़ासतौर पर घाटी ने कई हिंसक दृश्य देखे.

साहित्य महोत्सव को रद्द करने की घोषणा करते हुए आयेजकों ने कहा कि इसमें हिस्सा लेने वाले कुछ लोगों ने महोत्सव के दौरान हिंसा होने की आशंका जताई.

लेखकों का कहना है कि महोत्सव के दौरान होने वाली बहस और बातचीत के प्रारूप को देखते हुए वहां विरोध होने की संभावना हो सकती है.

अभिव्यक्ति की आज़ादी

लेखकों ने अपने पत्र में कहा, “न तो हम घाटी में और हिंसा भड़काना चाहते हैं, और न ही अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में हम हिंसा को जन्म देना चाहते हैं. इसलिए हमारे पास ये महोत्सव रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.”

भारत प्रशासित कश्मीर में मुसलमान समुदाय की संख्या बाकी समुदायों से ज़्यादा है और साहित्य लेखन की परंपरा चौदहवीं शताब्दी से चली आ रही है, लेकिन चूंकि ज़्यादातर कश्मीरी साहित्य का दूसरी भाषाओं में अनुवाद नहीं हुआ है, इसकी वजह से ज़्यादा लोगों को इसके बारे में जानकारी नहीं है.

लेकिन कश्मीरी क़िताबों में बढ़ती रुचि के चलते, अब बहुत सी किताबों का अंग्रेज़ी में अनुवाद होने लगा है.

आयोजकों ने अपने वक्तव्य में कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि घाटी में शांति का आग़ाज़ हो, ताकि हम जल्द से जल्द पूरे आत्मविश्वास के साथ लेखकों और मेहमानों को सुरक्षा प्रदान कर सकें और इस महोत्सव में एक नई जान फूंक सकें. जब तक ऐसा न हो तब तक हमारे लिए ये एक दुखद दिन होगा और आज़ादी की अभिव्यक्ति के ख़िलाफ़ बोलने वाले अल्पसंख्यकों की जीत होगी.”

साहित्य महोत्सव के आयोजकों ने कहा कि उनके आलोचक अगर वाकई अभिव्यक्ति की आज़ादी में विश्वास रखते हैं तो उन्हें कार्यक्रम में भाग लेकर अपने विचार व्यक्त करने चाहिए थे.

संबंधित समाचार