किस बात की माफ़ी माँगें: उमर

उमर अब्दुल्ला
Image caption इससे पहले ऐसी ख़बरें आई थीं कि उमर ने ट्विटर पर माफ़ी मांग ली थी

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अफ़ज़ल गुरु और तमिलनाडु विधानसभा पर किए अपने ट्वीट पर माफ़ी मांगने से इनकार कर दिया है.

उमर ने ट्विटर पर लिखा था, "अगर तमिलनाडु विधानसभा की ही तरह जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने अफ़ज़ल गुरु के लिए कोई प्रस्ताव पारित किया होता तो भी क्या लोगों की प्रतिक्रिया इतनी ही शांत होती? मेरे ख़्याल से नहीं."

बीबीसी से बात करते हुए उमर ने कहा कि उन्होंने ये नहीं कहा कि अफ़ज़ल गुरू दोषी नहीं हैं, या फिर उन्हें फ़ांसी पर नहीं चढ़ाया जाना चाहिए, या फिर क़ानून का पालन नहीं किया जाना चाहिए. उनका कहना है कि उन्होंने तो मात्र एक सवाल पूछा था और आलोचनाओं के बीच उस सवाल का जवाब आना चाहिए.

उमर अब्दुल्ला ने कहा, "मैने राष्ट्रपति के होने वाले किसी फ़ैसले पर कोई ग़लत टिप्पणी नहीं की. मैने सिर्फ़ यही कहा कि अगर जम्मू-कश्मीर विधानसभा में ऐसा प्रस्ताव पारित हुआ होता, तो क्या भाजपा चुप रहती? आप ख़ुद से ये सवाल पूछिए कि अगर राम जेठमलानी ने राजीव गाँधी के हत्यारों की बजाय अफ़जल गुरु की वकालत की होती तो भाजपा ने क्या कहा होता? अगर आप चाहते हैं कि देश के सामने ऐसे सवाल उठाने पर मैं माफ़ी मांगूँ, तो मैं ये नहीं करूँगा."

माफ़ी की ग़लत ख़बर

इससे पहले ऐसी ख़बरें आई थीं कि उमर ने ट्विटर पर माफ़ी मांग ली थी. तमिलनाडु विधानसभा पर अपने ट्वीट के बाद उमर ने ट्वीट किया था कि चैनल किसी भी बारे में कहानी बना देते हैं और उससे उन्हें सीख मिलनी चाहिए कि वो चुप रहें.

उमर ने कहा कि इस ट्वीट का तमिलनाडु विधानसभा के उनके ट्वीट से कोई लेना-देना नहीं था और दरअसल उन्होंने एक और ट्वीट में केंद्रीय मंत्रियों के बारे में टिप्पणी की थी जिससे ये मायने निकाले गए थे कि उन्होंने अपने पिता पर सीधी टिप्पणी की है. उमर के मुताबिक ये टीवी चैनलों की अपनी सोच थी.

उमर ने कहा कि उनके उठाए गए मूल सवाल को अनदेखा कर दिया गया और मामले को बिना कारण तूल दिया गया.

उमर ने कहा, "मैं इस बात की ओर इशारा कर रहा था कि आप मुसलमानों औऱ जम्मू कश्मीर को बाक़ी देश से अलग करके देखते हैं. मैं उम्मीद करुँगा कि जो लोग सही सोच रखते हैं, वो मेरी बात से सहमत होंगे. ख़ुद से ये सवाल पूछने के बजाय आप ये कह रहे हैं कि आप माफ़ी मांगे. माफ़ी किस बात की?"

प्रस्ताव

दरअसल मंगलवार को तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति से अपील की थी कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के आरोप में दोषी ठहराए गए तीनों अभियुक्तों को क्षमादान दिया जाए.

इसी के बाद उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर ये बयान दिया जिसे भाजपा ने 'हुर्रियत नेताओं की भाषा' बताया है.

अफ़ज़ल गुरु को संसद पर हमले के मामले में सज़ा-ए-मौत मिली है और गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से गुरु की ओर से दायर दया याचिका ख़ारिज करने की सिफ़ारिश की है.

भाजपा ने मुख्यमंत्री अब्दुल्ला के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उनके जैसे ज़िम्मेदार नेता को ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था.

मीडिया में कई जगह भी उमर के इस बयान की कड़ी आलोचना की गई थी, हालांकि कुछ टीकाकारों ने उमर के सवालों को सही भी बताया था.

वरिष्ठ पत्रकार हरिंदर बवेजा ने अपने ट्वीट में उमर की आलोचना को दोगलापन बताया.

उन्होंने लिखा, "तमिलनाडु विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया गया, लेकिन उमर अब्दुल्ला के सवाल ने असहिष्णुता को उजागर किया. दूसरे राज्य के लिए ये दोगलापन क्यों जबकि दोनो राज्य भारतीय हैं?"

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