'कुछ चाय- पानी हो जाए'..

मुझे लगता है कि इस दुनिया में अगर कहीं सबसे ज़्यादा भ्रष्टाचार है तो वो जगह है एमसीडी. एक घटना आपको बताता हूँ.

2007 में मैने दिल्ली के द्वारका में डीडीए का एक फ़्लैट खरीदा. ये फ़्लैट भारतीय वायुसेना के एक उच्च अधिकारी का था.

ब्रोकर के ज़रिए जब इस मकान को ख़रीदने की बात चल रही थी, तो मैने उनसे पूछा कि इस मकान के सारे कागज़ तो पूरे हैं, कहीं किसी का कोई भुगतान तो बकाया नही है, जैसे डीडीए का, बिजली-पानी का बिल आदि.

जब ये तय हो गया कि कहीं कोई बकाया नही है तो मैने मकान की रजिस्ट्री करा ली. यहाँ थोड़ी रिश्वत की ज़रूरत पड़ी.

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चक्करों का चक्र

दिक्कत तो तब शुरू हुई जब दो साल बाद 2009 में मैने इस फ़्लैट को बेचना चाहा.

मैने एक प्रापर्टी डीलर से इसके बारे में बात की, तो उसने कहा कि आप अपने सारे दस्तावेज़ मुझे दे दीजिए और 60 दिनों का समय मुझे दीजिए ताकि मैं इन सब की पड़ताल करवा लूँ.

इसके अलावा उसने मुझे कुछ एडवांस रकम भी दे दी. 55 दिन के बाद वो प्रापर्टी डीलर ग्राहक के साथ मेरे पास आए और कहा कि आप पर 2004 तक का प्रापर्टी टैक्स करीब डेढ़ लाख रूपए बकाया है.

मैने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है ? मैने तो 2007 में इसे ख़रीदा था. मैने उन्हें 2004 से 2007 तक की सारी रसीदें उन्हें थमा दीं.

खै़र हम तीनों में समझौता ये हुआ कि मैं डेढ़ लाख का एक पोस्ट डेटेड चेक उन्हें दे दूँ .मैने ये उन्हे दे दिया.

कुछ दिन बाद मैं एमसीडी के ऑफ़िस गया और मैने इस बकाए के बारे में पड़ताल की. पता चला कि कोई बकाया नही है.

इस बीच फ़्लैट खरीदने वाले ने वो चेक बैक में लगा दिया और वो बाउंस हो गया. मेरे पास नोटिस आ गया. जब मैने ब्रोकर से सारी रसीदे वापस देने की माँग की तो उसने कहा कि वो खो गई हैं.

'भ्रष्टाचार से सामना' श्रृँखला की दूसरी कड़ी पढ़ें-'कमेटी आ गई, भागो'....

चाय- पानी का जुगाड़

बकाया कितना है जानने के लिए मैने फिर से एमसीडी के ऑफ़िस के चक्कर काटने शुरू कर दिए.

एक आदमी मुझे मिला उसने कहा कि कुछ चाय पानी का जुगाड़ कराओ तो अंदर से फाइलें निकलवाऊँ. मैने तीन हज़ार दिए और उसने फ़ाइल देख कर मुझसे कहा कि क़रीब 70 हज़ार लगेगा.

मैने कहा कि इसे लिख कर दे दो. उसने मना कर दिया. आख़िरकार आरटीआई के ज़रिए मुझे जवाब मिला कि डेढ़ लाख बकाया है

लेकिन मेरे पास तो रसीद थी, उसके गुम हो जाने की हालत में डुप्लीकेट का प्रावधान होना चाहिए लेकिन यहाँ ऐसा कुछ नहीं था.

मामला फॉस्ट ट्रैक अदालत में गया.जज ने कहा कि तीनों पक्ष आपस में मामले को सुलझा लें.

यहाँ पर पता चला कि मेरे फ़्लैट पर कुल बक़ाया राशि निकली बाईस हज़ार.

जब मैं इसका भुगतान करने गया तो ब्रोकर फिर बीच में आ गया उसने कहा कि बिना तीन हज़ार दिए मैं ये काम नहीं करवाऊँगा.

आख़िरकार मैंने उसे ये रिश्वत दी और उसके बाद इस बाईस हजा़र की रकम की रसीद ली. इसे ख़ाते में चढ़वाया और तब जाकर ये मामल ख़त्म हुआ.

भले ही कितना ही छोटा काम क्यूँ न हो, अगर आप ग़लती से भी एमसीडी के ऑफ़िस घुस गए तो आपको ऐसे तमाम दलाल मिल जाएंगे जो आपका काम कराने का दावा करेंगे और बदले में उन्हें अगर कुछ चाहिए तो वो है ,पैसा..

('भ्रष्टाचार से सामना' श्रृँखला की तीसरी कड़ी में अमित वर्मा की आपबीती बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा से की गई बातचीत पर आधारित है.)

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