क्या भारत ने सबक सीखा है?

 गुरुवार, 8 सितंबर, 2011 को 18:03 IST तक के समाचार

26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए हमलों ने पूरे भारत और विश्व को झंझोड़ कर रख दिया था. 10 बंदूकधारियों ने लगातार तीन दिनों तक दक्षिण मुंबई को मानो बंधक बना लिया था.

दामोदर टंडेल मछुआरों के राष्ट्रीय संगठन के अध्यक्ष हैं. वे मछुआरों के मोहल्ले बधवार पार्क के रहने वाले हैं. ये वो जगह है, जहाँ कराची से नाव पर सवार होकर 10 आतंकवादी उतरे थे.

वे कहते हैं कि साहिल के क़रीब रहने वाले लोग ख़ुद को अब भी सुरक्षित महसूस नहीं करते.

दामोदर कहते हैं, "मॉनसून के समय जब बाहर से बड़े-बड़े और प्राइवेट जहाज़ या छोटी-छोटी नौकाएँ किनारे पर आते हैं, तो तटरक्षकों और भारतीय नौसेना को भी मालूम नहीं होता और अगर कुछ ग़लत होता है तो एक-दूसरे पर छींटाकशी करते है."

मुंबई में लोग अपने आप को सुरक्षित महसूस करने ही लगे थे कि इस साल 13 जुलाई को हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने लोगों को यह सवाल करने पर मजबूर कर दिया है कि न्यूयॉर्क शहर में 10 साल पहले हुए हमलों के बाद कोई और बड़े हमले नहीं हुए.

सवाल

पूरे नहीं हुए वादे

दामोदर टंडेल

अभी तक सरकार की ओर से जो वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए. सुरक्षा के लिहाज से वादा मरीन पुलिस बनाने का था और अलग से समुद्र के आसपास के लोगों को सुरक्षा देनी थी. अब हम लोग अपने आप को मुंबई में सुरक्षित महसूस नहीं करते. जिसके लिए सरकार पूर्ण रूप से दोषी है......दामोदर टंडेल

मैड्रिड और लंदन के बड़े आतंकी हमलों के बाद कोई बड़े हमले नहीं हुए. लेकिन भारत में आए दिन हमले क्यों होते हैं. भारत आतंक का निशाना इतनी आसानी से क्यों बन रहा है?

सात सितंबर को दिल्ली में होने वाला बम धमाका इस बात का संकेत है कि देश में कभी भी आतंकी हमले हो सकते हैं.

दामोदर कहते हैं, "अभी तक सरकार की ओर से जो वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए. सुरक्षा के लिहाज से वादा मरीन पुलिस बनाने का था और अलग से समुद्र के आसपास के लोगों को सुरक्षा देनी थी. अब हम लोग अपने आप को मुंबई में सुरक्षित महसूस नहीं करते. जिसके लिए सरकार पूर्ण रूप से दोषी है."

13 जुलाई और 26 नवंबर के हमलों की योजना बनाने वालों ने मुंबई शहर में 12 मार्च 1993 को हुए सिलसिलेवार बम धमाकों का अध्यन ज़रूर किया होगा.

उन हमलों में भी हथियार और बारूद समुद्र के रास्ते मुंबई शहर लाए गए थे. लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार भारत सरकार ने इसके बावजूद समुद्र पर उचित सुरक्षा का इंतज़ाम नहीं किया, जिससे वर्ष 2008 के हमले सफल रहे.

अब भी आम लोगों की धारणा यही है कि अगर सरकार ठोस क़दम उठाए, तो भारत पूरी तरह से आतंक मुक्त हो सकता है.

दामोजर टंडेल कहते हैं, "हम लोगों को सरकार सुरक्षा नहीं देती है. हमें अपनी ख़ुद अपनी सुरक्षा के लिए सरकार की ओर से ट्रेनिंग देना चाहिए. हमारा विश्वास पाने के लिए सरकार को हमें साथ में लेकर चलना चाहिए."

टंडेल ने मुझे निमंत्रण दिया कि मैं मुंबई में नाव पर सवार हो कर तटीय इलाक़ों का दौरा करूँ. कोई पूछेगा भी नहीं, अगर बारिश के दिन नहीं होते तो मैं उनका निमंत्रण स्वीकार कर लेता. वे कहते हैं कि सरकार सुरक्षा के इंतजामों पर अमल नहीं के बराबर करती है.

कार्रवाई

निशाने पर है मुंबई

केपी रघुवंशी

मुंबई हिंदुस्तान का चेहरा है और चेहरे को बिगाड़ने की कोशिश आतंकवादी हमेशा से करते आए हैं, किया है और करते रहेंगे......केपी रघुवंशी

शायद यह पूरी तरह से सच नहीं. केंद्र सरकार ने मुंबई हमलों के बाद नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी यानी एनआईए का गठन किया, जो दिल्ली में हुए बम धमाके के आलावा कई हमलों की जांच कर रहा है.

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड यानी एनएसजी की एक शाखा मुंबई में स्थापित की. इसके इलावा महाराष्ट्र सरकार ने फ़ोर्स वन का गठन किया. पुलिस को नए हथियार दिए गए और रेलवे स्टेशनों और अहम सरकारी इमारतों में सीसीटीवी लगाए गए.

मुंबई हमलों से पहले महाराष्ट्र और दूसरे राज्यों ने आतंक विरोधी दस्तों का चयन किया. केपी रघुवंशी महाराष्ट्र में आतंकी विरोधी दस्ते की स्थापना करने वालों में से एक हैं.

वे इस दस्ते का नेतृत्व दो बार कर चुके हैं. वे कहते हैं कि भारत विश्व के सबसे सुरक्षित देशों में से एक है.

रघुवंशी कहते हैं, "मुंबई हिंदुस्तान का चेहरा है और चेहरे को बिगाड़ने की कोशिश आतंकवादी हमेशा से करते आए हैं, किया है और करते रहेंगे."

अगर भारत विश्व के सबसे सुरक्षित देशों में से एक है, तो क्या वजह है कि यहाँ आए दिन आतंकवाद हमले होते रहते हैं. न्यूयॉर्क में 9/11 के बाद हमले क्यों नहीं हुए?

मैड्रिड और लंदन में 2005 के बाद क्यों हमले नहीं हुए? इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिए मैंने वाशिंगटन में एक वरिष्ठ अमरीकी पत्रकार सेबेस्टियन रोटेला से यही सवाल किया.

बातचीत में उन्होंने कहा, "भारत के मुक़ाबले अमरीका और दूसरे पश्चिमी देश आतंकवादी संगठनो के ख़िलाफ़ अपनी पूरी ताक़त का इस्तेमाल करते हैं और शायद भारत के पास इतने साधन भी नहीं है कि वह पश्चिमी देशों के साथ मिलकर इन संगठनों की गतिविधियों पर नज़र रख सके और डट कर मुक़ाबला कर सके."

जवाब

तैयारी में कमी है

असग़र इंजीनियर

विफलता की वजह एक यह भी है कि अमरीका और दूसरे देश भारत के मुक़ाबले आतंकियों के निशाने से इतने दूर हैं कि वहां तक पहुँचने के लिए बहुत समय लगता है और ज़बरदस्त तैयारी की भी ज़रूरत होती है, जिसमें वर्षों लग जाते हैं और उन देशों की तकनीक भी बहुत उम्दा है....असग़र इंजीनियर

मुंबई में मुसलामानों की समस्याओं पर काम करने वाले एक विशेषज्ञ असग़र अली इंजीनियर भी इस सवाल का जवाब कुछ इस तरह से देते हैं.

वे कहते हैं, "विफलता की वजह एक यह भी है कि अमरीका और दूसरे देश भारत के मुक़ाबले आतंकियों के निशाने से इतने दूर हैं कि वहां तक पहुँचने के लिए बहुत समय लगता है और ज़बरदस्त तैयारी की भी ज़रूरत होती है, जिसमें वर्षों लग जाते हैं और उन देशों की तकनीक भी बहुत उम्दा है."

लेकिन भारत सरकार की आलोचना करने वालों का कहना है कि देश में आतंकी हमलों से निपटने के लिए कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है. जब हमले होते हैं, तो सरकार बड़े-बड़े वादे करती है, लेकिन इसके बाद ख़ामोश हो जाती है.

पंजाब और कश्मीर में आतंकवाद शुरू होने के बाद केंद्र सरकार ने टाडा और पोटा जैसे विशेष क़ानून बनाए थे, लेकिन इन क़ानूनों का दुरूपयोग होने के बाद इनको रद्द करना पड़ा.

आज भारत के पास आतंकवादियों और आतंकवाद से निपटने के लिए कोई विशेष क़ानून नहीं है, जिस तरह की अमरीका और ब्रिटेन में है.

रोटेला कहते हैं कि विशेष क़ानून महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन उनका ग़लत इस्तेमाल न हो इसका पूर्ण रूप से ख़्याल रखा जाना चाहिए. विशेष क़ानून बनाने में कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखानी चाहिए और आतंकवाद के ख़िलाफ़ असरदार रणनीति लानी चाहिए.

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