उत्तराखंड: निशंक का इस्तीफ़ा, खंडूरी नए मुख्यमंत्री

रमेश पोखरियाल निशंक
Image caption बीजेपी को लगता है कि निशंक की मौजूदगी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उसकी मुहिम में रूकावट पैदा करेगी.

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.

इसके साथ ही प्रदेश में मुख्यमंत्री पद को लेकर तीन दिनों से जारी गतिरोध खत्म हो गया. पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद खूंडूरी को दोबारा उत्तराखंड की बागडोर सौंपी है.

उन्होंने रविवार को देहरादून में शपथ ग्रहण किया.

हालांकि मैनेजमेंट में माहिर मानेजानेवाले निशंक आखिरी पल तक अपनी कुर्सी बचाने के लिये एड़ी-चोटी एक करते रहे लेकिन इस बार उनका कौशल काम नहीं आया.

यहां तक कि शनिवार दोपहर नाटकीय ढंग से खंडूरी के कथित भ्रष्टाचार के बारे में पार्टी के लोगों और मीडिया को एक सीडी भी बांटी गई. कहा जा रहा है कि ये निशंक गुट का काम था.

पार्टी का दबाव

निशंक ने समर्थक विधायकों और कार्यकर्ताओं के साथ हस्ताक्षर अभियान भी चलाया गया. मगर वो भी कारगर सिद्ध नहीं हुआ.

कहा जा रहा है कि इस्तीफ़े के लिए निशंक पर ख़ुद पार्टी हाईकमान की ओर से ही दबाव था. हालांकि भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा है कि निशंक को अहम जिम्मेदारी दी जाएगी.

प्रदेश में अगले वर्ष फरवरी के पहले चुनाव होने हैं और सत्ताधारी बीजेपी में ये बदलाव उसी को ध्यान में रखकर किया गया है. निशंक का दो साल का कार्यकाल घोटालों के लिये अधिक चर्चित रहा.

हाल ही में बीजेपी के दो आंतरिक सर्वेक्षणों में ये बात सामने आई थी कि निशंक के मुख्यमंत्री रहते बीजेपी 10 सीटें भी नहीं जीत पाएगी. जिसके बाद पार्टी में निशंक के खिलाफ पहले से सक्रिय खंडूरी और भगत सिंह कोश्यारी के बगावती तेवर काफी बुलंद हो गए और उन्होंने निशंक को हटाए जाने के लिये दिल्ली में डेरा डाल दिया.

लेकिन विधानसभा चुनाव से महज कुछ महीनों पहले हुए इस नेतृत्व परिवर्तन से चार बड़े सवाल भी उठ खड़े हुए हैं.

पहला, क्या बीजेपी हाईकमान ये मानता है कि दो साल पहले खंडूरी को हटाकर निशंक को मुख्यमंत्री बनाना एक गलत फैसला था और ये उस भूल का सुधार है?

दूसरा, क्या इस छोटे से राज्य में भी बीजेपी अभी तक 'ट्रायल एंड एरर' के फ़ार्मूले पर ही चल रही है और एक स्थिर सरकार देने में असफल साबित हुई है.

तीसरा चुनाव के चार-पांच महीने पहले मुख्यमंत्री बदलकर बीजेपी क्या हासिल करना चाहती है. क्योंकि ठीक यही दांव बीजेपी ने 2002 के विधानसभा चुनाव में भी खेला था जब चुनाव के तीन महीने पहले नित्यानंद स्वामी को हटाकर भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाया गया था लेकिन पार्टी चुनाव में हार से नहीं बच पाई थी.

चौथा और सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न जो पूछा जा रहा ह कि क्या मुख्यमंत्री बदलने से बीजेपी में जारी खींचतान और गुटबाजी पर विराम लग जाएगा या पार्टी में भितरघात और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की ये टकराहट और बढ़ेगी?

लेखा-जोखा

पूर्व मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी का कहना है कि इस समय नेतृत्व परिवर्तन करना उचित नहीं है.

जहां तक खंडूरी का सवाल है उनकी छवि ईमानदार और सख्त प्रशासक की जरूर रही है लेकिन अपनी सैन्य अफसरी शैली के लिये वो उतने ही बदनाम भी रहे हैं.

ज़ाहिर है अपनी दूसरी पारी में इस सियासी माहौल के बीच सरकार और संगठन में तालमेल बिठाना उनके लिये टेढ़ी खीर होगी.

एक सवाल ये भी है कि आगामी चुनावों में वो जनता के सामने किस सरकार के कामकाज का लेखा-जोखा लेकर जाएंगे? निशंक सरकार या खंडूरी सरकार?

साथ ही उन्हें निशंक सरकार के कथित घोटालों का जवाब भी देना होगा.

फिलहाल दिल्ली से निजाम बदले जाने की खबर आते ही राजधानी देहरादून में खंडूरी समर्थकों में जश्न का माहौल है और निशंक के करीबियों के बीच ख़ामोशी छाई है. उनमें से कई आलाकमान के इस क़दम के ख़िलाफ़ नारेबाजी भी कर रहे हैं.

उधर खंडूरी के आवास में जश्न का माहौल है और उनके स्वागत और शपथ की तैयारी ज़ोर-शोर से चल रही है.

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