थैलेसीमिया के 20 मरीज़ों को एचआईवी

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Image caption थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के परिवारों का आरोप है कि अस्पताल की लापरवाही से उनके बच्चों को एचआईवी संक्रमित ख़ून चढ़ाया गया.

गुजरात के जूनागढ़ ज़िला अस्पताल में ख़ून की बीमारी थैलेसीमिया से पीड़ित 20 बच्चों को एचआईवी पॉजिटिव पाया गया है.

इन बच्चों के परिवारों का आरोप है कि इनके बच्चों को ये संक्रमण इसी अस्पताल में खून चढ़वाने से हुआ है.

लेकिन जूनागढ़ ज़िला अस्पताल ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि अस्पताल में ख़ून चढ़ाने का काम बेहद एहतियात के साथ किया जाता है.

गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री के मुताबिक भी अस्पताल में रक्तदान के सभी नियमों का पालन किया जाता है और थैलेसीमिया से पीड़ित मरीज़ों में इतना एचआईवी संक्रमण आम दर है.

थैलेसीमिया से पीड़ित मरीज़ों में ख़ून की कमी हो जाती है और उन्हें हर चार से छे हफ्तों में खून चढ़ाना पड़ता है.

अस्पताल में थैलेसीमिया बीमारी का इलाज करवा रहे कुल 103 मरीज़ों में से पिछले एक साल में 20 मरीज़ों को एचआईवी संक्रमित पाया गया है.

'अस्पताल में सुनवाई नहीं'

सलीम भाई जूनागढ़ में एक छोटा होटल चलाते हैं. उनकी चार साल की बेटी को जन्म से थैलेसीमिया है.

उनका कहना है कि वो हमेशा से जूनागढ़ ज़िला अस्पताल में ही अपनी बच्ची को ख़ून चढ़वाने के लिए ले जाते रहे हैं.

लेकिन जब ख़ून चढ़वाने के बाद उनकी बेटी बीमार हो गई तो उन्होंने उसके ख़ून की जांच करवाई और तब पता चला की वो एचआईवी पॉजिटिव है.

सलीम ने बीबीसी को बताया, "मैं अस्पताल गया तो मेरी कोई सुनवाई नहीं हुई, वो अपनी गल्ती मानते ही नहीं, मेरी बच्ची तो पहले से ही जानलेवा बीमारी से जूझ रही थी, अब मैं क्या करूं."

सलीम का आरोप है कि जब से उनकी बेटी को ख़ून चढ़ाया जा रहा है, कभी भी उसकी एचआईवी के लिए जांच नहीं की गई.

'थैलेसीमिया के मरीज़ों में एचआईवी आम'

सलीम की बेटी का मामला सामने आने पर पता चला कि जूनागढ़ अस्पताल में पिछले एक साल में थैलेसीमिया से पीड़ित 20 बच्चों को एचआईवी वायरस संक्रमित हो चुका है.

लेकिन गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री जय नारायण व्यास का कहना है कि इस मुद्दे को बेवजह उठाया जा रहा है और ये दरअसल दो रक्तदान केन्द्रों की आपसी लड़ाई की वजह से अस्पताल को बदनाम करने की साज़िश है.

व्यास ने बीबीसी को बताया, "अगर थैलेसीमिया के कुल मरीज़ों में से क़रीब 25 फीसदी को पिछले एक साल में एचआईवी से संक्रमित पाया गया है तो ये औसत से ज़्यादा नहीं है, दिल्ली के किसी अस्पताल में भी जांच करवाई जाए तो कुछ ऐसे ही आंकड़े मिलेंगे."

अस्पताल के मेडिकल सुप्रिटेन्डेन्ट जी टी दयालू का कहना है कि अस्पताल रक्तदान करनेवाले लोगों की एचआईवी जांच करता है लेकिन अक्सर जांच के समय स्वस्थ मरीज़ों को बाद में एचआईवी पॉजिटिव पाया जाता है, तो इसमें अस्पताल की कोई गलती नहीं है.

दयालू के मुताबिक, "अगर कोई व्यक्ति एचआईवी वायरस से संक्रमित होने के क़रीब एक महीने के अंदर अपना टेस्ट करवाता है तो जांच में संक्रमण सामने नहीं आता, तो इस दौरान अगर रक्त लिया गया हो तो अस्पताल को भी पता नहीं होगा कि वो संक्रमित है."

भारत के कई अस्पतालों में ख़ून में एचआईवी की जांच के लिए आधुनिक तकनीक न्यूक्लिक ऐसिड टेस्ट का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन ज़्यादातर ज़िला अस्पतालों में ये उपल्ब्ध नहीं है.

इस टेस्ट के ज़रिए संक्रमण होने के फौरन बाद ही ख़ून की जांच में उसका पता लगाया जा सकता है. जूनागढ़ अस्पताल में ये महंगी तकनीक इस्तेमाल नहीं की जाती.

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