एन्सेफ़लाइटिस से 82 बच्चों की मौत

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Image caption इस बीमारी के दौरान तेज़ बुखार, शरीर में ऐंठन और कंपन के साथ बेहोशी के दौरे पड़ते हैं.

बिहार में ग़रीब तबक़े के बच्चों पर मस्तिष्क ज्वर यानी एन्सेफ़लाइटिस का बढ़ता हुआ प्रकोप महामारी की शक्ल में उभरता दिख रहा है.

राज्य के विभिन्न ज़िलों में इस रोग से बीते चार महीनों के दौरान आधिकारिक सूचनानुसार कम से कम 82 बच्चों की मौत हो चुकी है.

डॉक्टर इसे 'जापानी एन्सेफ़लाइटिस' नाम की बीमारी बता रहे हैं और इस समय इसका सबसे अधिक प्रकोप बिहार के गया ज़िले में है.

मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 23 अगस्त से 14 सितंबर के बीच यानी तीन हफ़्तों में 27 बच्चे मारे जा चुके हैं.

राज्य के मुज़फ़्फरपुर स्थित अस्पतालों में भी इसी साल मई और जून महीनों में इस रोग से 55 बच्चों की जानें जा चुकी हैं.

बीमारी को लेकर बहस

तेज़ बुखार, शरीर में ऐंठन और कंपन के साथ बेहोशी के दौरे पड़ना, ये सब इस बीमारी के लक्षण हैं.

इस बीमारी का फैलाव राज्य के कई अन्य ज़िलों में भी हो गया है.

इसकी लपेट में आए हुए सौ से भी अधिक बच्चे गया और पटना के अस्पतालों में भर्ती हैं.

जब मुज़फ़्फरपुर में इस रोग से दो-तीन महीना पहले हाहाकार मचा था, तो उस समय चिकित्सा विशेषज्ञों के बीच बहस चल पड़ी थी कि यह 'एन्सेफ़लाइटिस' है या नहीं.

अब हालांकि अधिकांश चिकित्सक इसे 'जापानी एन्सेफ़लाइटिस' बता रहे हैं लेकिन संबंधित प्रयोगशालाओं में इस सिलसिले में चल रही जांच का अंतिम निष्कर्ष अभी भी नहीं मिल पाया है.

वैसे, वायरल यानी विषाणु जनित रोग मानकर इसके इलाज़ की ख़ास दवाओं से संबंधित 'किट्स' राज्य के सभी बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में उपलब्ध करा देने का दावा राज्य सरकार कर रही है.

शिकायतें

लेकिन मरीज़ों के परिजन यहाँ अस्पतालों में बेड की कमी और समय पर ऐसे रोगियों की देखभाल ठीक से नहीं होने की शिकायतों के साथ ख़ासे नाराज़ भी हैं.

गया मेडिकल कॉलेज अस्पताल के अधीक्षक डॉ सीताराम ने बीबीसी को बताया, ''हालत गंभीर हो जाने के बाद इस रोग के मरीज़ बच्चों को अस्पताल लाया जाता है, इसलिए मृतकों की तादाद इतनी बढ़ रही है. ज़रूरी दवाओं की भी कमी नहीं है और समय पर अस्पताल पहुंचे कई बच्चों को बचा लिया गया है. फिर भी इस रोग के छह-सात मरीज़ प्रायः हर रोज़ अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं. ''

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी इस बीमारी का इलाज़ करा रहे बच्चों की संख्या बढ़कर 40 तक जा पहुँची है.

कुछ डॉक्टरों का कहना है कि एक ख़ास तरह के मच्छरों के काटने से यह रोग फ़ैल रहा है और सूअर, गाय-भैंस जैसे पालतू मवेशियों के इर्द-गिर्द जमा गंदगी में ऐसे मच्छर पलते-बढ़ते हैं.

इसलिए मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित होने वालों में उन मलिन बस्तियों के ग़रीब दलित परिवार से जुड़े बच्चे ज़्यादा हैं, जहाँ ऐसी गंदगी अधिक है.

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