क्यों लोग ख़ून से ख़त लिखने को हुए मजबूर?

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उत्तर प्रदेश विधान सभा के अगले चुनाव को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक महारथी अपने अपने रथों पर सवार होकर निकलने लगे हैं.

पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्र के ड्राफ्ट तैयार हो रहे हैं. वहीं दूसरी ओर पूर्वांचल में पब्लिक भी अपने नेताओं से एन्सेफ़लाइटिस की महामारी पर हिसाब-ताब और सवाल पूछने की तैयारी कर रही है.

हाल ही में गोरखपुर और उसके आसपास के सात ज़िलों के करीब पांच सौ लोगों ने स्याही के बजाय खून से खत लिखकर गुहार लगाई थी कि जानलेवा एन्सेफ़लाइटिस यानि दिमागी बुखार की बीमारी को खत्म करने के लिए कारगर कदम उठाए जाएँ.

लेकिन कारगर कदम की कौन कहे , लखनऊ में किसी ने उस पर ध्यान देना भी मुनासिब नही समझा.

एन्सेफ़लाइटिस उन्मूलन अभियान के मुख्य संयोजक डाक्टर राम नंदन सिंह उपेक्षा से आहत होकर कहते हैं, “ राजशाही में भी आम आदमी की आवाज़ सुनने के लिए जहांगीरी घंटा लगता था. यह कैसी लोकशाही है कि जनता को अपने शासकों को खून से खत लिखना पड़ रहा है , फिर भी कोई सुनवाई नही.”

दिमागी बुखार की बीमारी पूर्वी प्रदेश में तैंतीस साल पहले आई. हर साल औसतन हज़ार-डेढ़ हज़ार बच्चे अस्पतालों में मरते हैं और हज़ारों विकलांग हो जाते हैं.

एक अनुमान के मुताबिक़ अब तक करीब पचास हज़ार बच्चे एन्सेफ़लाइटिस से मरे और लाखों विकलांग होकर जीवन भर कष्ट भोगने को अभिशप्त हैं.

सन २००५ में जब मीडिया में बहुत हल्ला मचा तो भारत सरकार ने चीन से जापानी इंसेफ्लाइटिस का टीका मंगाकर भेजा.

टीकाकरण से मच्छरों के ज़रिए होने वाली जेई यानि जापानी एन्सेफ़लाइटिस की बीमारी में तो काफी कमी आई है. लेकिन दूषित जल से होने वाली इन्टेरोवायरस एन्सेफ़लाइटिस का कहर अभी जारी है.इस साल भी अब तक करीब तीन सौ बच्चों की मौत हो चुकी है.

लोगों का दर्द

भारत सरकार ने नेशनल रूरल हेल्थ मिशन कार्यक्राम के तहत पिछले पांच सालों में करीब तीन हज़ार करोड़ रूपए

उत्तर प्रदेश सरकार को दिए . लेकिन उनसे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएँ सुधरने के बजाय जो धन की बर्बादी और लूट खसोट हुई वह सबको मालूम है.

इसलिए एन्सेफ़लाइटिस उन्मूलन अभियान ने तय किया है कि दिमागी बुखार को २०१२ के विधान सभा चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया जाए.

अभियान के कार्यकर्ता विधान सभा का चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों से पूछेंगे कि क्या आपने एन्सेफ़लाइटिस के खात्मे के लिए कभी कोई संघर्ष किया ?

क्या एन्सेफ़लाइटिस उन्मूलन का कार्यक्रम आपके दल के एजेंडे में है. और क्या आप जीतने के बाद भी बीमारी के खात्मे के लिए काम करेंगे?

दरअसल भारत में दो तरह का हिन्दुस्तान है. एक है बड़े और शहरी लोगों का स्वाइन फ्लू वाला इंडिया , जिसमे सरकार युद्धस्तर पर सक्रिय हो जाती है. और दूसरा ग़रीबों और ग्रामीणों का दिमागी बुखार वाला इंडिया , जो सरकार के एजेंडे में ही नही आ पाता.

एन्सेफ़लाइटिस से बड़ी मल्टीनेशनल दवा कंपनियों का भी कोई फायदा नहीं है और न ही इस बीमारी के भारतीयों के साथ अमरीका या यूरोप पहुँचने का खतरा है. इसलिए डब्लूएचओ भी सक्रिय नहीं होता.

अब मतदाता खुद सक्रिय होगा और दिमागी बुखार राजनीतिक मुदा बनेगा तो तो शायद यह आने वाली सरकार का भी एजेंडा बने.

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