सुरक्षा बलों को चिकित्सा सुविधा की कमी

छत्तीसगढ़ में गश्त लगाते सुरक्षा बल(फ़ाईल फ़ोटो)
Image caption छत्तीसगढ़ में तैनात सुरक्षा बलों की जान हमेशा ख़तरे में रहती है.

छत्तीसगढ़ में चल रहे नक्सल विरोधी अभियान में हज़ारों सुरक्षा बलों की तैनाती हुई है.

ये जवान सरगुजा और बस्तर संभाग के बीहड़ों में तैनात किए गए हैं. इसके अलावा छत्तीसगढ़ से लगे महाराष्ट्र के गड़चिरौली, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश से लगे इलाक़ों में भी इन्हें तैनात किया गए है.

जहाँ तक नक्सली हिंसा का सवाल है तो छत्तीसगढ़ या यूँ कहा जाए कि इस राज्य का दक्षिणी इलाक़ा पूरे भारत में सबसे संवेदनशील माना जाता है.

माओवादी छापामारों और सुरक्षा बलों के बीच सीधी लड़ाई चल रही है जिसमे माओवादी छापामार युद्ध का सहारा ले रहे हैं.

विपरीत परिस्थितियों में तैनात सुरक्षा बल के जवानों के लिए सबसे ज़्यादा परेशानी का कारण है विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा का ना होना.

मसलन जब कभी माओवादियों द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंग की चपेट में जवान आ जाते हैं तो इस इलाक़े में एक भी ऐसा विशेषज्ञ डाक्टर नहीं है जो धमाके के ज़ख्मों का उपचार कर सके या फिर गोली ही निकाल सके.

इसको लेकर केंद्रीय सुरक्षा बल के जवानों नें राज्य के अधिकारियों का ध्यान आकृष्ट किया है.

हाल ही में बस्तर संभाग के बीजापुर में हुए हमले में सुरक्षा बल के 12 जवान मारे गए थे.

कहा जा रहा है कि समय पर अगर चिकित्सा की सुविधा मुहैय्या हो जाती तो शायद उनमें से आधे जवानों को बचाया जा सकता था.

यह एक ऐसी सच्चाई है जिसका सामना नक्सल विरोधी अभियान में तैनात सुरक्षा बलों के जवानों को रोज़ करना पड़ता है.

बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान का नेतृत्व कर रहे केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानी के सीआरपीऍफ़ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह कहते हैं कि कई ऐसे मौक़े आए जब बारूदी सुरंग के विस्फोट में या माओवादियों की गोलीबारी में घायल जवानों को अस्पताल लाया तो गया मगर उन्हें विशेषज्ञों की सेवा नहीं मिल पाई.

'ख़ौफ़ का असर'

सुरजीत का कहना है, "बारूदी सुरंग के विस्फोट में हमारे बहुत सारे जवान ज़ख़्मी हो जाते हैं, और कभी कभार ज़ख्मों की वजह से उनकी मौत भी हो जाती है. जगदलपुर, बस्तर संभाग का मुख्यालय है. इस संभाग में पांच ज़िले हैं. यहाँ एक मेडिकल कॉलेज है तो ज़रूर मगर इन घायल जवानों का यहाँ इलाज नहीं हो पाता है क्योंकि यहाँ ब्लास्ट के ज़ख्मों के लिए कोई विशेषज्ञ डाक्टर नहीं है."

सिर्फ जगदलपुर ही नहीं पूरे बस्तर में ऐसे विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी है.

बस्तर के जंगलों से होता हुआ मैं दंतेवाड़ा के सरकारी अस्पताल पहुंचा जहाँ मेरी मुलाक़ात वहां के सिविल सर्जन आनंद राम गोटा से हुई जिनका कहना था कि ख़ौफ़ की वजह से डॉक्टर बस्तर आना नहीं चाहते.

Image caption माओवादियों के धमाके में घायल सुरक्षाकर्मियों को कई बार विशेषज्ञ डॉक्टरों के ना होने के कारण नहीं बचाया जा सका.

गोटा कहते हैं कि डॉक्टरों और ख़ास तौर पर विशेषज्ञों की कमी का आलम यह है कि दंतेवाड़ा ज़िला अस्पताल में 11 में से दस पद रिक्त पड़े हुए हैं.

नक्सल विरधी अभियान में मोर्चा संभाल रहे सुरक्षा बलों के अधिकारियों और जवानों का मानना है कि इस संभाग में रात में उड़ान भरने वाले हेलिकॉप्टर भी तैनात किए जाने चाहिए ताकि समय रहते घायल जवानों तक फ़ौरन राहत पहुंचाई जा सके.

सीआरपीएक से अतिरिक्त अधीक्षक सुरजीत सिंह का कहना है कि जो हेलिकॉप्टर मौजूद भी हैं वह सिर्फ़ दिन में उड़ान भर सकते हैं.

सुरजीत का कहना था, "ज़्यादातर वारदातें रात में होती हैं. यहं इलाक़े इतने दुर्गम हैं कि सड़क के मार्ग से जाना आत्मघाती साबित होता है. हमने कई बार सरकार से अनुरोध किया की रात में उड़ान भरने वाले हेलीकाप्टर यहाँ तैनात किये जाएँ ताकि घटना स्थल पर रात को ही पहुंचा जा सके."

राज्य और केंद्र सरकार नक्सल विरोधी अभियान के नाम पर अरबों रूपए ख़र्च कर रही है.

इसके बावजूद अभियान के लिए तैनात हज़ारों जवानों को बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है.

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