बस्तर में एस्सार के महाप्रबंधक गिरफ़्तार

एस्सार कंपनी का स्टील प्लांट इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption एस्सार कंपनी बस्तर से लौह अयस्क पाइप लाइन के ज़रिए विशाखापट्टनम भेजती है

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में पुलिस ने माओवादियों को कथित रूप से पैसे पहुंचाने के आरोप में एस्सार कंपनी के एक महाप्रबंधक को गिरफ्तार कर लिया है.

यह गिरफ्तारी कंपनी के दंतेवाड़ा स्थित किरन्दूल कार्यालय से की गई है.

पहले इस बात का खुलासा विकिलीक्स की रिपोर्ट में किया गया था और हाल ही में कंपनी के एक ठेकेदार और उसके सहयोगी को दंतेवाड़ा में गिरफ़्तार किया गया जो कथित रूप से माओवादियों तक पैसे पहुंचाने जा रहे थे.

पुलिस ने गिरफ्तार लोगों के ख़िलाफ़ छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा अधिनियम और राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया है.

आरोपों में घिरी एस्सार कंपनी

पुलिस का कहना है कि गिरफ़्तार किए गए महाप्रबंधक का नाम डीएस वर्मा है.

एक पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया,"उनसे पहले भी उनसे पूछताछ की जा चुकी है. हम अब भी उनसे कई सवालों का जवाब मांग रहे हैं." दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक अंकित गर्ग का कहना है कि वर्मा से पूछताछ जारी है और उन्हें जल्द ही न्यायालय में पेश किया जाएगा. माओवादियों को पैसे पहुंचाने के आरोप को लेकर एस्सार विवादों घिरती जा रही है.

पहले इस बात की जानकारी विकिलीक्स के लीक किए गए केबल से मिली थी.

हाल ही में कंपनी के एक ठेकेदार और उसके सहयोगी को दंतेवाड़ा में गिरफ़्तार किया गया जो कथित रूप से माओवादियों तक पैसे पहुंचाने जा रहे थे.

विशाखापट्नम में एस्सार स्टील की एक 80 लाख टन की इस्पात उत्पादन की इकाई है.

इस इकाई तक पहले लौह अयस्क ट्रकों के ज़रिए दंतेवाड़ा के इलाक़े से पहुंचाया जाता था.

इस दौरान माओवादियों ने कई बार ट्रकों को आग के हवाले कर दिया. फिर कंपनी ने विशाखापट्नम तक लगभग 270 किलोमीटर लम्बी एक पाइप लाइन बिछाई है जिसके ज़रिये लौह अयस्क भेजा जाता है.

यह पाइप लाइन घोर नक्सल प्रभावित इलाकों से होकर गुज़रती है.

लेवी की रक़म?

हाल ही में विकिलीक्स द्वारा जारी किए गए अमरीकी केबल्स में कहा गया था कि छत्तीसगढ़ में बिछाई गई अपनी पाइप लाइन को सही तरह से संचालित करने के लिए एस्सार कंपनी माओवादियों को समय समय पर मोटी रकम बतौर लेवी देती है.

विकिलीक्स ने ये दस्तावेज़ अगस्त महीने के अंत में जारी किया था. इसमें कहा गया था कि नक्सल प्रभावित इलाकों में काम कर रही कंपनियाँ माओवादियों को लेवी के तौर पर मोटी रक़म देती आ रहीं हैं.

विकिलीक्स की रिपोर्ट में कहा गया था कि मुंबई स्थित अमरीकी उच्चायोग ने अपने देश के साथ हुए कूटनीतिक पत्राचार में कहा है कि एस्सार कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया है कि वह छत्तीसगढ़ में खनन और इस्पात संबंधी अपने प्रोजेक्ट के लिए 'माओवादियों को एक अच्छी खासी रक़म देते हैं ताकि नक्सली उनके काम में दखल न दें और उनका उत्पादन निर्बाध रूप से चलता रहे.'

पिछले साल माओवादियों ने विस्फोट कर पाइप लाइन को क्षतिग्रस्त कर दिया था. इसके अलावा लौह अयस्क विशाखापट्टनम पहुँचाने का काम बिना किसी बाधा के चलता रहता है.

राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा के दंतेवाड़ा विधायक भीमा मंडावी ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि वह सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट करते आ रहे हैं.

मंडावी का आरोप है,"सड़क के बजाए पाइप लाइन के ज़रिए लौह अयस्क भेजने से एस्सार को रोज़ाना करोड़ों रुपए का फ़ायदा होता है, इसलिए कंपनी पाइप लाइन से लौह अयस्क भेजने को तरज़ीह देती है. इसमें बचने वाले बड़े मुनाफ़े में नक्सलियों को भी हिस्सेदारी है."

गिरफ़्तारियाँ और विरोध

Image caption माओवादी स्वीकार करते हैं कि वे कई कंपनियों से लेवी वसूलते हैं क्योंकि उन्हें अपना संगठन चलाना होता है

पुलिस ने इससे पहले बीके लाला नाम के ठेकेदार के पास से 15 लाख रूपए बरामद किए हैं.

पुलिस कहती है अभी स्पष्ट नहीं है कि यह रकम एस्सार कंपनी की तरफ से थी या लाला खुद इसे माओवादियों को देने के लिए जा रहे थे.

दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक अंकित गर्ग का कहना है कि पूछताछ के दौरान लाला ने पुलिस को बताया कि यह रक़म माओवादियों को दी जानी थी जो एस्सार कंपनी की थी.

लाला को पालनार इलाक़े के एक साप्ताहिक हाट से 10 सितम्बर को गिरफ़्तार किया गया था.

लाला के साथ ही पुलिस ने लिंगाराम कोडोपी नाम के एक आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता को भी गिरफ्तार किया है.

कोडोपी पालनार के ही रहने वाले हैं. उनके परिजनों का आरोप है कि उन्हें घर से गिरफ़्तार किया गया है.

पुलिस ने गिरफ़्तार लोगों के ख़िलाफ़ छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा अधिनियम और राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया है.

लिंगाराम कोडोपी की गिरफ़्तारी को लेकर सामाजिक और मानवाधिकार संगठनों में आक्रोश है.

पिछले साल जुलाई माह में भी पुलिस ने एक बयान जारी कर लिंगाराम कोडोपी पर माओवादी होने का आरोप लगाया था.

इस मामले ने काफ़ी तूल पकड़ा था जब कोडोपी ने दिल्ली में संवाददाता सम्मलेन कर कहा था कि पुलिस ने उन्हें 40 दिनों तक ग़ैर क़ानूनी तरीके से अपनी हिरासत में रखा था और उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया था.

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