क्या है मायावती का मक़सद?

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उत्तर प्रदेश में चुनाव की डुग्गी बजने से पहले मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर मुसलमानों, सवर्ण जातियों के ग़रीबों और जाट समुदाय को नौकरियों में आरक्षण देने की मांग दोहराई है.

मायावती ने सोमवार को प्रधानमंत्री को भेजे गए स्मरण पत्र में कहा है, “ देश के व्यापक हित में इन सभी मामलों की गंभीरता के मद्देनज़र तत्काल इन मुद्दों पर समुचित कार्रवाई करना आवश्यक है.”

मायावती ने ये पत्र अपने कार्यकाल के लगभग अंत में तब लिखे हैं जब विधान सभा चुनाव चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है.

समझा जाता है कि मायावती ने ये पत्र भावनात्मक मुद्दे उभारकर एक बार फिर जिताऊ सामाजिक समीकरण बनाए के मकसद से लिखे हैं.

मायावती ने पत्र में अल्पसंखयकों को आरक्षण के लिए भारत सरकार द्वारा गठित सच्चर समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया है.

अल्पसंख्यकों पर नज़र?

मायावती ने प्रधानमंत्री को लिखा है कि अगर केन्द्र सरकार मुसलमानों को आरक्षण के लिए संविधान संशोधन का प्रस्ताव लाती है तो बहुजन समाज पार्टी उसका समर्थन करेगी.

मायावती ने लिखा है, “अल्पसंख्यकों , विशेषकर मुस्लिम समुदाय की स्थिति में अगर परिवर्तन लाना है तो उन्हें शिक्षा , सेवायोजन तथा जीवन के सभी अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए अवसरों में वृद्धि सुलभ कराए जाने की नितांत आवश्यकता है.”

साथ ही मायावती ने अनुसूचित जाति के उन लोगों को भी आरक्षण की हिमायत की है जो धर्म परिवर्तन कर मुसलमान अथवा ईसाई बन गए हैं.

इसके अलावा मायावती ने दूसरे पत्र में हिंदुओं की सवर्ण या ऊँची जातियों के ग़रीब लोगों को भी आरक्षण देने की मांग की है.

तीसरे पत्र में मायावती ने लिखा है कि जाट समुदाय को केन्द्र सरकार की पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल किया जाए. मायावती बुधवार को जात बहुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश से अपना दौरा शुरू कर रही हैं.

संकेत हैं कि वे जाटों को केंद्र सरकार में आरक्षण का समर्थन करने के अलावा कुछ नए ज़िले बनाने की घोषणा भी कर सकती हैं.

संविधान में आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए है न कि धर्म के आधार पर. वर्तमान में पिछड़े वर्गों की 79 जातियों में सूची में मुस्लिम समुदाय की 34 जातियां भी शामिल हैं.

क्या है मुसलमानों की राय?

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मुस्लिम रिज़र्वेशन मूवमेंट के संयोजक ज़फ़रयाब जिलानी का कहना है कि मायावती के इस पत्र से उनके आंदोलन को बल मिला है.

जिलानी कहते हैं, “इससे पहले समाजवादी पार्टी ने भी मुसलमानों को आरक्षण के लिए आगरा अधिवेशन में प्रस्ताव पारित किया था. अब जबकि बहुजन समाज और समाजवादी पार्टी ने मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग का समर्थन कर दिया है तो कांग्रेस पर भी दबाव बढ़ेगा.”

पर साथ ही उनका ये भी कहना है, " अगर मायावती मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग पर सचमुच गंभीर होती तो उत्तर प्रदेश में कोटा के अंदर कोटा की मुसलमानों की मांग को मान लेतीं और पिछड़ी जातियों के लिए 27 फीसदी आरक्षण के अंदर ही मुसलमानों को नौ फीसदी आरक्षण की मांग को लागू कर देतीं. लेकिन उन्होंने अपने यहाँ तो ऐसा नही किया , केन्द्र से मांग कर रही हैं."

उर्दू साप्तागित जदीद मरकज के संपादक हिसाम सिद्दीकी का कहना है कि अगर नौकरियों में भर्ती के दौरान ईमानदारी बरती जाए तो मुसलमान अपनी योग्यता के बल पर ही नौकरी पा जाएँगे और अलग से आरक्षण की ज़रुरत नहीं पड़ेगी. लेकिन मायावती ने भी भर्ती में ईमानदारी नहीं बरती.

यह चर्चा आम है कि पिछले चार साल में सरकारी नौकरियों में जो भर्तियाँ हीन उनके लिए मुख्यमंत्री निवास से पर्चियां जाती थीं.

भ्रष्टाचार के आरोप

विपक्ष का आरोप है कि मायावती ने पिछले साढ़े चार साल में जमकर भ्रष्टाचार किया और अब वह चुनाव जीतने के लिए फिर से जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगने की कोशिश कर रही हैं.

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी कहते हैं, “मायावती का न मुसलमानों के आरक्षण से कोई संबंध है, न सवर्ण ग़रीबों से है, न जात कम्युनिटी से है. प्रधानमंत्री को उनकी चिट्ठी का कोई अर्थ नहीं है. वे चाहती हैं कि एक भ्रम की स्थिति बन जाए और हो सकता है कि उसी में कुछ चुनाव का लाभ मिल जाए.”

समाजवादी पार्टी का कहना है कि उनकी पार्टी पहले से सवर्णों,मुसलमानों और जाटों के आरक्षण की पक्षधर रही है.आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश में 18 फीसदी मुस्लिम और 20 फीसदी ऊँची जातियों के मतदाता हैं.

राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार मायावती एक बार फिर से अपने दलित समुदाय के अलावा ऊँची जातियों और मुसलमानों का जिताऊ सामाजिक गठजोड़ बनाना चाहती हैं.

इसी उद्देश्य से उन्होंने यह पत्र लिखे हैं ताकि चुनावी भाषण में वह केन्द्र की कांग्रेस सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा सकें.

दरअसल मायावती का यह कार्यकाल मुख्य रूप से लखनऊ और नोएडा में बड़े बड़े स्मारक और अपनी मूर्तियां लगाने के लिए जाना जाता है.

पांच साल में न तो कोई नए उद्योग लगे और न ही खेती अथवा कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कोई उल्लेखनीय काम हुआ.

अपराधों पर काबू पाने और माफ़िया की नकेल कसने का वादा भी पूरा नही हुआ,उलटे तमाम माफिया बीएसपी में शामिल होकर सत्ता के हिस्सेदार बन गए.

पिछले चुनाव में मायावती ने ब्राह्मण एवं एनी सवर्ण जातियों को सत्ता में हिस्सेदारी का भरोसा दिलाकर समर्थन हासिल किया था. लेकिन सरकार बनने पर ये वर्ग भी अपने को ठगा मान रहे हैं.

ऐसे में प्रेक्षकों का कहना है कि मायावती के पास अब फिर से जाति और धर्म के मुद्दे उभारने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार राज बहादुर सिंह का कहना है कि बसपा को आरक्षण के लिए प्रधानमंत्री को लिखे गए इन पत्रों का चुनावी लाभ मिलने में संदेह है.

राज बहादुर कहते हैं,“ चुनाव में इसका लाभ मिलेगा इसमें संदेह है, क्योंकि अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में उन्होंने यह चिट्ठी लिखी है. अगर इनमें थोड़ी सी गंभीरता होती तो जैसे आंध्र में उन्होंने मुसलामानों को आरक्षण दे दिया, ये भी दे सकती थीं. जहां तक अपर कास्ट की बात है सबको मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार पचास फीसदी से ज़्यादा आरक्षण नहीं हो सकता. ऐसे में इस तरह की चिट्ठियाँ लिखना महज़ एक चुनावी हथकंडा है.”

मायावती को अच्छी तरह मालूम है कि संविधान में धर्म और ग़रीबी या आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं है.

प्रेक्षकों का कहना यह जानते हुए भी उन्होंने ये पत्र लिखे हैं ताकि मतदाता उनकी सरकार के पांच साल के काम पर ध्यान देने के बजाय भावनात्मक मुद्दों में उलझ जाएँ.

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