एक साल बाद भी नहीं बढ़ा अयोध्या मामला

 शुक्रवार, 30 सितंबर, 2011 को 15:44 IST तक के समाचार
बाबरी विध्वंस से पहले अयोध्या

अयोध्या पर फ़ैसला आए एक साल बीत चुका है और सभी पक्ष सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की तैयारी कर रहे हैं

अयोध्या के राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद धार्मिक स्थल के मालिकाना विवाद पर हाईकोर्ट के फैसले को एक साल बीत गए हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में अपील की सुनवाई के लिए ज़रूरी क़ानूनी औपचारिकताएं अभी नहीं हो पाई हैं.

अनुमान है कि अब अगले साल ही सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो पाएगी. जहां मुस्लिम पक्ष इस विवाद को केवल अदालत के दायरे में रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर विश्व हिंदू परिषद ने हाईकोर्ट फैसले की वर्षगाँठ पर 30 सितम्बर को देश भर में धार्मिक अनुष्ठान और हुनमान चालीसा का पाठ कर जन भावनाओं को गरम रखने का काम किया है. विश्व हिंदू परिषद शनिवार से अयोध्या में पत्थर तराशने का कम फिर शुरू करने जा रही है.

विवाद के तीसरे पक्ष निर्मोही अखाड़ा ने विश्व हिंदू परिषद के इस प्रयास को भाजपा को मदद पहुंचाने वाला एक राजनीतिक क़दम करार दिया है.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विवादित लगभग डेढ़ हजार वर्ग मीटर ज़मीन का तीन हिस्सों में बँटवारा किया था.

हाईकोर्ट ने मस्जिद के मुख्य गुम्बद के नीचे की ज़मीन को रामजन्म भूमि मानते हुए उसे भगवान राम की संपत्ति माना. भगवान राम के मित्र के तौर पर यह मुकदमा विश्व हिंदू परिषद के नेता जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल ने दायर किया था.

अदालत ने मस्जिद के बाहरी अहाते में स्थित राम चबूतरे, सीता रसोई और चरण पादुका के स्थान को सनातन हिंदुओं की संस्था निर्मोही अखाड़ा को दिया. इसके बाद मुस्लिम समुदाय को एक तिहाई हिस्सा लंबे अरसे से संयुक्त रूप से क़ाबिज़ होने के नाते दिया.

हाईकोर्ट के इस फैसले को बीच का रास्ता मानते हुए देश भर के लोगों ने आम तौर पर स्वागत किया, लेकिन मुक़दमे के सभी पक्षकारों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

मुक़दमे के मुख्य पैरोकारों में से एक मोहम्मद हाशिम अंसारी ने हनुमान गढी के महंत ज्ञान दास के साथ मिलकर कहा था कि वह अदालत से बाहर समझौते से इस विवाद को सुलझा लेंगे, लेकिन उनकी इस कोशिश को मीडिया के अलावा और किसी ने गंभीरता से नही लिया. बाद में हाशिम अंसारी ने स्वयं भी सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है.

चार मुक़दमे

चार मुक़दमे

पहला- गोपाल सिंह विशारद का (उनकी मृत्यु हो चुकी है. अब उनके बेटे राजेन्द्र सिंह वादी हैं.)

दूसरा- सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड का

तीसरा- निर्मोही अखाड़े का

चौथा- राम लला विराजमान का. जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल की मृत्यु के बाद विश्व हिंदू परिषद के त्रिलोकी नाथ पाण्डेय राम लला के मित्र के तौर पर पैरोकार हैं.

इस विवाद में कुल चार दीवानी मामले हैं. पहला गोपाल सिंह विशारद का जिनकी मृत्यु हो चुकी है. अब उनके बेटे राजेन्द्र सिंह वादी हैं. दूसरा सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड का, तीसरा निर्मोही अखाड़े का और चौथा राम लला विराजमान का. जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल की मृत्यु के बाद विश्व हिंदू परिषद के त्रिलोकी नाथ पाण्डेय राम लला के मित्र के तौर पर पैरोकार हैं.

इन चार मुकदमों में वादी प्रतिवादी मिलाकर अनेक पक्षकार हैं. इनमें हिंदुओं की ओर जिन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है उनमे हिंदू महासभा, श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति और रामजन्म भूमि सेवा समिति प्रमुख हैं. मुसलमानों की ओर से सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के अलावा जमीयते उलेमा ए हिंद, हाशिम अंसारी, मोहम्मद फारुख़, मोहम्मद महफ़ूज़ुर रहमान और मिस्बा उद्दीन प्रमुख हैं.

हाईकोर्ट के तीनों जजों का फ़ैसला लगभग दस हज़ार पेज का था. वादियों को प्रमाणित प्रतिलिपि मिलने में ही कई महीने लग गए, इसलिए जुलाई तक अपीलें दाख़िल हुईं.

सुप्रीम कोर्ट ने ज़मीन के तीन हिस्से में बंटवारे का फ़ैसला स्थगित कर दिया है. इसलिए फाइनल डिक्री बनाने की कार्रवाई भी स्थगित हो गई.

सुप्रीम कोर्ट ने लगभग सभी अपीलों पर पक्षकारों को नोटिसें जारी कर दी हैं. लेकिन कई पक्षकारों की या तो मृत्यु हो चुकी है या पते बदल गए हैं. नियमानुसार सुनवाई से पहले सभी पक्षकारों को नोटिस जारी होना जरूरी है.

वकीलों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने से पहले हाईकोर्ट से मुक़दमे का सारा रिकार्ड पहुँचना ज़रुरी है. यह लगभग पचास हज़ार पेज होगा. इनमें से जो रिकॉर्ड हिंदी में हैं उनका अंग्रेज़ी में अनुवाद भी होना है.

मुसलमानों का पक्ष

सिर्फ़ आस्था पर नहीं

"हमारा केस सबूतों से पूरी तरह साबित था. कोर्ट ने आस्था की बुनियाद पर उसको ग़ैर साबित कर दिया और जो चीज़ साबित नहीं थी"

ज़फ़रयाब जिलानी

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी कहते हैं कि मुक़दमे की सुनावाई अगले साल ही शुरू हो पाएगी, "मेरे ख़्याल से इस साल नवंबर- दिसंबर तक तो ये सब तैयारियाँ होंगी.. रिकॉर्ड का अनुवाद वगैरह होगा. टेक्नीकल जो चीजें हैं वह होंगी. ग़ालिबन जनवरी 2012 से ही असल मुक़दमे की सुनवाई हो पाएगी."

जिलानी का अनुमान है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी होने में एक साल का समय लग जाएगा.

जिलानी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में अपील में मुस्लिम समुदाय की ओर से मुख्य बिंदु यह उठाया गया है कि हाईकोर्ट ने सबूतों के बजाय आस्था की बुनियाद पर विवादित स्थल को रामजन्म भूमि माना है. जिलानी कहते हैं, "हमारा केस सबूतों से पूरी तरह साबित था. कोर्ट ने आस्था की बुनियाद पर उसको ग़ैर साबित कर दिया और जो चीज़ साबित नहीं थी, भगवान राम का जन्म स्थान, जबकि ख़ुद जजों ने कहा था कि यह सबूतों से साबित नही हो सकती थी, उसको उन्होंने आस्था की बुनियाद पर मान लिया."

मुस्लिम समुदाय ने अपील में यह मुद्दा भी उठाया है कि पुरातत्त्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष नहीं निकाला गया था कि वहाँ पहले कोई मंदिर था जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी.

मुस्लिम पक्ष ख़ामोशी से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की तैयारी कर रहा है. जिलानी का कहना है कि मुस्लिम समुदाय इस मसले पर कोई सार्वजनिक आंदोलन या प्रदर्शन नहीं करना चाहता.

विहिप की अपील

अयोध्या में पत्थर तराशने का काम

विहिप ने अयोध्या में मंदिर के लिए पत्थर तराशने का काम फिर से शुरू कर दिया है

लेकिन विश्व हिंदू परिषद ने 'राम मंदिर के निर्माण में न्यायिक बाधाएँ दूर करने के लिए' शुक्रवार को देश भर में धार्मिक अनुष्ठान और हनुमान चालीसा का पाठ किया.

अयोध्या में इस कार्यक्रम में राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास और विश्व हिंदू परिषद नेता चम्पत राय उपस्थित थे. इस अवसर पर हुई सभा में वक्ताओं ने यह माँग भी दोहराई कि संसद में क़ानून बनाकर विवादित भूमि राम मंदिर निर्माण के लिए दे दी जाए.

विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता शरद शर्मा ने अयोध्या से फ़ोन पर बातचीत में कहा कि, "उच्च न्यायालय ने जो फ़ैसला दिया उसमें ज़मीन का बँटवारा कर दिया, जबकि मुक़दमा लड़ने वाले लोगों ने यह माँग नहीं की थी कि बँटवारा किया जाए. वहाँ तो यह मामला था कि संपत्ति किसकी है- हिंदू की या मुसलमान की. ऐसे में जो बँटवारा हुआ उसे लोग दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं. इसलिए न्यायिक बाधाएँ दूर करने के लिए हिंदू समाज विभिन्न कार्यक्रमों और अनुष्ठानों का आयोजन करता रहा है."

शर्मा का कहना है, "एक साल पूरा होने पर हनुमान चालीसा का पाठ इसीलिए किया गया ताकि बाधाएं दूर हों और मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो."

विश्व हिंदू परिषद शनिवार पहली अक्टूबर से अयोध्या में राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने का कम फिर शुरू करवा रही है.

निर्मोही अखाड़ा

राजनीतिक स्टंट

"इन लोगों का तो राजनीतिक स्टंट है. कोई ज़रुरी है कि उसी दिन किया जाए. धार्मिक अनुष्ठान पूजा आरती तो हमेशा हो सकते हैं"

स्वामी राम दास

उधर निर्मोही अखाड़े के प्रवक्ता स्वामी राम दास विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम को अनावश्यक बताते हुए कहते हैं कि यह सब भारतीय जनता पार्टी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए है. स्वामी राम दास ने कहा कि अखाड़े की बरसों की पैरवी से ही कोर्ट ने उसे रामजन्म भूमि माना और आज हिंदू वहाँ काबिज हैं. स्वामी राम दास कहते हैं, "हाईकोर्ट का फ़ैसला प्रभु इच्छा तो है ही. ज़रूरी नहीं कि कोई प्रदर्शन करें. इन लोगों का तो राजनीतिक स्टंट है. कोई ज़रुरी है कि उसी दिन किया जाए. धार्मिक अनुष्ठान पूजा आरती तो हमेशा हो सकते हैं."

स्वामी राम दास का कहना है कि यह दुर्गा पूजा, दशहरा और दीवाली त्यौहार का सीजन है. इस समय ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए, जो दूसरे समुदाय की भावनाओं को आहत करे.

निर्मोही अखाड़े का कहना है कि वह सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए अपनी पूरी तैयारी कर रहा है.

वकीलों का अनुमान है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई में एक साल का समय लग सकता है. अयोध्या मुद्दा इतना संवेदनशील हो चुका है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू कराना भी एक चुनौती भरा काम हो सकता है.

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