‘32 रुपए में ख़र्च चला कर दिखाएं मोंटेक’

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Image caption आंकड़ों के मुताबिक भारत की आबादी का 37 फीसदी हिस्सा ग़रीबी रेखा से नीचे है.

भारत में खाद्य सुरक्षा अधिकारों को लेकर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने योजना आयोग के प्रमुख मोंटेक सिंह अहलूवालिया को चुनौती दी है कि वो अपने बयान पर अमल करते हुए ख़ुद 32 रुपए में एक दिन का ख़र्च चला कर दिखाएं.

पिछले हफ़्ते योजना आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल कर कहा गया था कि शहरी इलाकों में 965 रुपए प्रति माह और ग्रामीण क्षेत्रों में 781 रुपए प्रति माह कमाने वाले व्यक्ति को ग़रीब नहीं कहा जा सकता.

ग़रीबी रेखा की सीमा को संशोधित कर योजना आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि शहर में 32 रुपए प्रति दिन और गाँवों में 25 रुपए प्रति दिन कमाने वाले व्यक्ति को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के योग्य नहीं माना जा सकता.

योजना आयोग के इस हलफ़नामे पर खाद्य सुरक्षा अधिकारों के लिए काम करने वाले और यूपीए सरकार की सलाहकार परिषद के सदस्य अरुणा रॉय और हर्ष मंदर ने कड़ी आपत्ति दर्ज की है.

अरुणा रॉय और हर्ष मंदर ने एक पत्र लिखकर मोंटेक सिंह अहलूवालिया से कहा है कि योजना आयोग और उसके सदस्य या तो अपने इन आँकड़ों को वापस लें या फिर इस्तीफ़ा दें.

37 फ़ीसदी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ भारत की 1.21 अरब आबादी का 37 फ़ीसदी हिस्सा ग़रीबी रेखा से नीचे है.

हालांकि भारत में ग़रीबों के सही आंकड़े को लेकर मतभेद हैं और माना जाता है कि ये संख्या आबादी का 77 फ़ीसदी तक हो सकती है.

ऐसे में लगातार बढ़ती महंगाई के बीच योजना आयोग की ओर से शहरों के लिए 32 रुपए प्रति दिन और गाँवों में 25 रुपए प्रति दिन को काफ़ी बताए जाने पर ख़ासा बवाल हुआ है.

आलोचकों का मानना है कि इस सीमा को तय कर देने से लाखों लोग समाज कल्याण की नीतियों और सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाएंगे.

हाल ही में आई विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार की ओर से ग़रीबी कम करने के लिए की जा रही कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं और सरकारी योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं.

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