आपसी तो नहीं पर मोदी पर मतभेद

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Image caption सईद ख़ान कहते हैं कि वे मोदी को कभी माफ़ नहीं कर पाएँगे

पचपन साल के सईद ख़ान अपनी उम्र से काफ़ी बड़े नज़र आते हैं. आँखें मुरझाई हुई, सामने के दाँत टूटे हुए और चेहरे पर शिकन इस बात का सुबूत हैं कि उन्होंने काफी दर्द सहे हैं.

लगभग दस साल पहले 28 फ़रवरी की सुबह उनका जीवन सामान्य रूप से चल रहा था. लेकिन शाम के पाँच बजे तक उनका सब कुछ लुट चुका था.

उनके परिवार के दस लोग दंगों में मारे जा चुके थे जिनमें उनकी पत्नी, उनकी माँ और उनके भाई शामिल थे. उनकी दुनिया उजड़ चुकी थी.

अहमदाबाद के गुलबर्ग इलाके के रहने वाले सईद ख़ान अब अपने घर से दस किलोमीटर दूर रहते हैं.

उस त्रासदी के बाद वह अब गुलबर्ग में अपने घर शायद ही कभी जाते हैं.

तीन मंज़िल वाली इमारत सुनसान पड़ी है, यहाँ अब कोई नहीं रहता. खिड़कियाँ टूटी हैं, दरवाज़े ग़ायब हैं.

गुलबर्ग की त्रासदी

ऐसा ही कुछ हाल गुलबर्ग की दूसरी इमारतों का भी है. इन घरों को दस साल पहले आग लगाई गई थी लेकिन जलने के निशान आज भी देखे जा सकते हैं.

घरों के बाहर लंबी घास और झाड़ियाँ उगी हैं. सामने गंदा पानी भी है जहाँ मच्छर और मक्खियों ने अपना घर बनाया हुआ है.

लेकिन इमारतों की मज़बूत दीवारों और घरों की बनावट से यह अब भी साफ़ पता चलता है की यहाँ कभी ख़ुशहाल लोग रहा करते थे.

सईद ख़ान कहते हैं, "यह हाउसिंग सोसाइटी पढ़े लिखे लोगों की सोसाइटी थी. बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ते थे. इज्ज़तदार लोग यहाँ रहते थे".

लेकिन 28 फ़रवरी 2002 के दिन उनका सब कुछ लुट गया.

सईद ने कहा, "हमने अपने परिवार के दस सदस्यों को खो दिया. हमें रोना आता है किस तरह से हम इसको भूल सकते हैं. " सत्रह वर्षीय साहिल शेख़ उस समय केवल आठ वर्ष के थे. वह भी आज हमारे साथ अपने पुराने घर आए थे और हमें बताया कि उस दिन क्या हुआ था.

साहिल बताते हैं, "हज़ारों बलवाई गुलबर्ग में घुस आए थे. हम सब लोग एहसान जाफ़री (भूतपूर्व कांग्रेस संसद सदस्य. वह भी मारे गए थे) के घर में छुप गए. वे लोग अन्दर आए. पहले मेरी माँ को बाल से घसीटकर बाहर ले गए और फिर मेरी दोनों बहनों को हमारे सामने ज़िंदा जला दिया."

गुलबर्ग में मरने वालों की संख्या 68 थी.

मोदी की सदभावना

मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दो सप्ताह पहले राज्य में सदभावना बढ़ाने के लिए तीन दिनों का उपवास किया था.

इसमें कुछ मुसलमान भी शामिल हुए थे.

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मोदी मुसलमान विरोधी छवि मिटाना चाहते हैं क्योंकि वह भविष्य में प्रधानमंत्री के दावेदार होना चाहते हैं.

लेकिन सईद ख़ान कहते हैं मोदी सच्चे दिल से मुसलमानों से दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ा रहे हैं, "यह केवल एक ढोंग है. सियासी ढोंग. उनकी बातों में हम आने वाले नहीं. उन्होंने तो माफ़ी भी नहीं माँगी."

क्या वोह मोदी को माफ़ करेंगे? जवाब साफ़ था, "कभी नहीं." यही भावना मुसलमान समुदाय में आम तौर से महसूस की जा सकती है.

साहिल के पिता अनवर शेख़ की बलवे में कई दुकानें जला दी गईं. वह भी कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी को कभी माफ़ नहीं करेंगे.

साहिल ने कहा, "मेरी पत्नी और दो बेटियाँ ज़िंदा जला दी गईं और मेरी संपत्ति को आग लगा दी गई. अब तक दंगाइयों को सज़ा भी नहीं दी गई. मैं मोदी से डरता नहीं. उन्होंने हमारे साथ बहुत बुरा सुलूक किया है. हम उनसे हाथ कभी नहीं मिलाएंगे." अहमदाबाद की जामा मस्जिद के अन्दर हमने कई नमाज़ियों से बात की और यह सुन कर आश्चर्य नहीं हुआ की वे सभी मोदी की सदभावना पर विश्वास नहीं रखते. लगभग सभी ने मोदी के उपवास को एक ढोंग का नाम दिया.

इस ऐतिहासिक मस्जिद के पेश इमाम शब्बीर अहमद सिद्दीकी कहते हैं की मोदी के मुख्यमंत्री होने का मतलब यह है की उन्हें मुसलमानों की हत्या की ज़िम्मेदारी कुबूल करनी चाहिए, "ऐसे में अगर हम उन्हें बुरा भला कहते हैं तो कोई ग़लत बात नहीं है यह"

हिंदुओं में लोकप्रिय

लेकिन गुलबर्ग और जामा मस्जिद और मुसलमान मोहल्लों के बाहर हिन्दू समुदाय में नरेन्द्र मोदी सबसे लोकप्रिय नेता हैं.

जौहरी संजीव मेहता कहते हैं, "नरेन्द्र मोदी मुसलमानों की हत्या के ज़िम्मेदार नहीं हैं. गोधरा काण्ड के बाद हिन्दू नाराज़ थे और मुसलमानों की हत्या इसी क्रोध का नतीजा है."

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Image caption नरेंद्र मोदी की राजनीति को लेकर राज्य में काफ़ी लोग बँटे हुए हैं

अनमोल देसाई जामा मस्जिद के निकट एक दुकान के मालिक हैं. आजान की आवाज़ उनके कानों में रोज़ गूंजती है.

वह कहते हैं, "मोदी सभी समुदाय को साथ लेकर चल रहे हैं. कई मुसलमान उनके साथ हैं. कई हिन्दू उनसे नाराज़ हैं. सियासत में यह आम बात है. लेकिन सच यह है की मोदी ने पिछले दस सालों में गुजरात में बहुत प्रगति लाई है. इसका फ़ायदा मुसलमानों को भी हुआ है." मुसलमान और हिन्दू समाज के लोगों से बात करने के बाद समझ आया की दोनों समुदायों में उतना मदभेद नहीं है जितना गुजरात से बाहर लोगों को समझ में आता है.

मैं एक आधुनिक शॉपिंग माल में गया जहाँ नौजवान लड़के और लड़कियां कॉफी और चाय का आनंद ले रहे थे और उनसे उम्र में बड़े लोग दुकानों में ख़रीदारी कर रहे थे.

मैं एक टेबल पर गया जहाँ चार युवा बैठे कोल्ड कॉफी पी रहे थे. मैंने जब उनसे यह पूछा की आप के मुस्लिम दोस्त हैं? क्या मुस्लिम और हिन्दू के बीच रिश्ते सुधरे हैं?

तो उनमें से एक ने अपने बग़ल वाले युवा की तरफ इशारा करते हुए कहा यह मुसलमान है और हमारा सब से क़रीबी दोस्त.

मोदी इन चार लोगों में से दो के हीरो हैं. एक मोदी की प्रधानमंत्री बनने की कोशिश को पसंद नहीं करता और चौथा यानी मुस्लिम युवा कहता है मोदी को सदभावना के दौरान मुस्लिम टोपी भी पहननी चाहिए थी.

लेकिन वह अतीत को भूलने के लिए तैयार है. "अब क्या फायदा. मामला अदालत में है. हमें अब आगे बढ़ने की ज़रुरत है"

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