तालिबान से नहीं पाक से बात करेंगे: करज़ई

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Image caption करज़ई ने कहा कि शांति वार्ता में अब देशों के साथ बातचीत पर ध्यान दिया जाएगा, ना कि किसी संस्था या किसी व्यक्ति से जिसे ढूँढना मुश्किल हो.

अफ़गानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने कहा है कि जहाँ पाकिस्तान उसका जुड़वां भाई है, भारत उनके देश का एक शानदार दोस्त है. भारत की यात्रा कर रहे करज़ई ने कहा कि आतंकवादी उनके देश में पुनर्निमाण का काम मुश्किल बना रहे हैं.

करज़ई के मुताबिक अफगानिस्तान से ज़्यादा पाकिस्तान चरमपंथ से परेशान है. अफ़गान राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 2002 से 2005 तक उन्होंने सीमापार के हिंसक चरमपंथ की निंदा की थी, लेकिन अब उन्होंने अपनी बातों में बदलाव किया है और उनकी सरकार तालिबान के साथ शांति वार्ता कर रही है.

उन्होंने ये भी कहा कि उनकी सरकार पाकिस्तान के साथ मिलकर काम कर रही है, हालाँकि नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे हैं.

माना जा रहा है कि करज़ई की कोशिश थी कि अफ़गानिस्तान और भारत के बीच घनिष्ठ संबंधों को लेकर पाकिस्तान में उपजी चिंताओं पर लगाम लगाई जाए. दोनों भारत और पाकिस्तान अफ़गानिस्तान में अपने प्रभाव को लेकर स्पर्धा कर रहे हैं.

राष्ट्रपति करज़ई ने कहा कि दोनो देशों के बीच के कूटनीतिक संबंध किसी दूसरे देश की ओर केंद्रित नहीं हैं और इनका मक़सद अफ़गानिस्तान का सहयोग करना है.

महत्वपूर्ण बैठक

रविवार को राष्ट्रपति करज़ई और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच हुई बैठक में तय हुआ था कि भारत अफ़गानिस्तान के सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण, उपकरण और क्षमता बढ़ाने में मदद करेगा. दोनो देश राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में सामरिक वार्तालाप स्थापित करने के लिए सहमत हुए थे.

भारत और अफ़गानिस्तान के बीच समझौता ऐसे वक्त हुआ है जब अमरीका औऱ पाकिस्तान के बीच संबंध बिगड़ रहे हैं और अफ़गानिस्तान की ओर से पाकिस्तान पर कई तरह के आरोप लगाए गए हैं.

उन्होंने भारतीय मीडिया से कहा कि वो भारत पर बहुत ज़्यादा केंद्रित हैं और इससे बाहर अफ़गानिस्तान की ओर भी देखना चाहिए.

करज़ई ने कहा कि उन्होंने फ़ैसला किया है कि तालिबान से बातचीत नहीं की जाएगी क्योंकि उन्हें तालिबान का पता ही नहीं है.

उनका कहना था, "इसलिए हमने फ़ैसला किया है कि हम अपने भाई, अपने पड़ोसी पाकिस्तान से बात करेंगे. सालों पहले शुरू की गई इस बातचीत में हमें मनचाहे नतीजे नहीं मिले हैं."

करज़ई ने कहा कि शांति वार्ता में अब देशों के साथ बातचीत पर ध्यान दिया जाएगा, ना कि किसी संस्था या किसी व्यक्ति से जिसे ढूँढना मुश्किल हो.

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