हाथ में कटोरा लिए निकल पड़े प्रोफेसर देसाई

Image caption प्रोफेसर संदीप देसाई ने मुंबई की लोकल ट्रेनों में जाकर पैसे इक्ठ्ठा करने का काम शुरु किया.

मुंबई के रहने वाले प्रोफेसर संदीप देसाई की आवाज़ हफ्ते के कई दिन मुंबई की लोकल ट्रेनों में सुनाई पड़ती है. देश के नामी-गिरामी मैनेजमेंट संस्थानों में पढ़ाने वाले प्रोफेसर संदीप देसाई का सपना है मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में हर ग़रीब बच्चे को शिक्षित करना.

इस सपने को पूरा करने के लिए प्रोफेसर देसाई ने एक बेमिसाल पहल की है. पेश है सिटीज़न रिपोर्टर संदीप देसाई की ज़बानी उनकी अपनी कहानी.

'' मेरा नाम प्रोफेसर संदीप देसाई है और मैं मुंबई में रहता हूं, मैं पेशे से एक मैराइन इंजीनियर था लेकिन अपने बीमार पिता की सेवा के लिए कुछ साल मैंने नौकरी छोड़ी और मुंबई आकर मैनेजमेंट संस्थानों में पढ़ाना शुरु किया.

दिल्ली मुंबई सहित देश के कई मैनेजमेंट संस्थानों में बच्चों को पढ़ाने के दौरान मुझे एहसास हुआ कि भारत में आज भी संपन्न और सशक्त वर्ग ही शिक्षा का लाभ उठाने में सक्षम है.

भारत में पहले गुरुकुल की परंपरा थी और अमीर हो या ग़रीब सभी के बच्चे गुरुकुल में निशुल्क पढ़ते थे. मैं जानता हूं कि ये परंपरा चलाना अब संभव नहीं लेकिन ग़रीब पूरी तरह शिक्षा से वंचित रहें यह ठीक नहीं.

शिक्षा का दान

मेरी मां खुद एक टीचर थीं और उन्होंने भी मुझे इस काम के लिए प्रोत्साहित किया. ऐसे में मैंने ग़रीब बच्चों को पढ़ाने के लिए एक छोटा सा स्कूल शुरु किया.

पहले स्कूल की नींव पड़ने के साथ ही मैंने अपनी कमाई से श्लोका मिशनरीज़ नाम की एक संस्था बनाई. माता-पिता के गुज़रने के बाद हर महीने अपनी कमाई का ज़्यादातर हिस्सा मैं इन बच्चों की शिक्षा के लिए देने लगा.

लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों तक पहुंचने के लिए जब ये रकम कम साबित होने लगी तो मैंने आम लोगों के बीच जाने का फैसला किया.

पहले-पहल मैंने कई बड़े स्कूलों और कंपनियों के मालिकों को चंदे के लिए अर्ज़ी दी लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं आने के बाद मैंने मुंबई की लोकल ट्रेनों में जाकर लोगों को इस मुहिम के बारे में बताया और उनसे पैसे इक्ठ्ठा करने का काम शुरु किया.

मैं ट्रेन में बैठे लोगों को हिंदी, अंग्रेज़ी और मराठी में अपनी बात कहता हूं और उन्हें अपने मिशन के बारे में सभी जानकारियां देता हूं.

कई लोगों ने इसके लिए मेरा मज़ाक उड़ाया और मुझे भिखारी भी कहा लेकिन समय के साथ लोग मेरे काम को और मेरी कोशिशों को पहचानने लगे.

यहां तक कि अब मैं अक्सर एक दिन में 2,500 रुपए तक जमा कर लेता हूं. कुछ लोग अपने घरों और दफ़्तरों से भी मुझे पैसे लाकर देते हैं.

ट्रेनों में किया सफ़र

इस पैसे के ज़रिए मैंने झुग्गी-बस्ती इलाकों में दो और स्कूल खोले. आस-पास के इलाकों के बच्चे जल्द ही इन स्कूलों में भर्ती होने लगे.

मेरी कोशिश है कि इन बच्चों को न सिर्फ शिक्षा मिले बल्कि दुनिया को समझने का एक मौका भी.

मेरा मानना है कि छोटे-छोटे प्रयासों और लगातार कोशिशों से बड़े से बड़ा बदलाव भी मुमकिन है. एक मधुमक्खी जिस तरह कई दिनों तक लगातार फूलों पर मंडराकर बूंद-बूंद शहद इक्ठ्ठा करती है उसी तरह कोई भी नेक काम करने के लिए मेहनत बेहद ज़रूरी है. यही मेरे जीवन का मूल मंत्र है.''

प्रोफेसर संदीप देसाई की इस कहानी पर अपनी राय ज़ाहिर करने या सिटीज़न रिपोर्टर बनने के लिए हमें लिखें hindi.letters@bbc.co.uk पर.

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