क्या सत्ता की सीढ़ी बनेगी यात्राएँ?

आडवाणी
Image caption भारतीय जनता पार्टी के नेता यात्रा पर निकले हैं

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपनी खोयी राजनीतिक ताक़त वापस लाने के लिए काशी और मथुरा से जन स्वाभिमान यात्राएं शुरू की हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह और चुनाव अभियान प्रभारी कलराज मिश्र मथुरा और काशी से क़रीब एक महीने के लिए ढाई हज़ार किलो मीटर की यात्राओं पर निकल पड़े हैं.

लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज ने इन यात्राओं की शुरुआत कराई. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी 17 नवंबर को अयोध्या में यात्रा का समापन करेंगे.

विश्व हिंदू परिषद ने हाल ही में अयोध्या में राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने का काम पांच साल बाद फिर शुरू करवा दिया है.

उधर शुक्रवार को गोरखपुर में आरएसएस कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है. इस तरह पूरा संघ परिवार यूपी के मैदान में कूद पड़ा है.

आंदोलन

उत्तर प्रदेश में भाजपा के वरिष्ठ नेता और विचारक ह्रदय नारायण दीक्षित कहते हैं कि भाजपा इस बार सरकार बनाने के लिए चुनाव लड़ेगी.

उन्होंने कहा, "भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के संकल्प के साथ चुनाव अभियान पर है. पार्टी ने लगातार केंद्र की कांग्रेस सरकार और उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी की भ्रष्ट और तानाशाह सरकार के ख़िलाफ़ लगातार संघर्ष और आंदोलन किया है."

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में भाजपा ने केवल एक बार 1991 में बहुमत हासिल किया और वह भी मंदिर आंदोलन के चलते.

इसके बाद 1996 में भाजपा ने मायावती और फिर अन्य फुटकर दल-बदलू गुटों के साथ गठबंधन सरकार चलाई. वर्ष 2002 में भाजपा ने फिर मायावती के साथ गठबंधन किया, लेकिन वह टिकाऊ नहीं रहा.

क़रीब आठ साल से भाजपा उत्तर प्रदेश में सत्ता से बाहर है. वर्ष 2007 के विधान सभा चुनाव में भाजपा को केवल 51 सीटें और लगभग 17 फ़ीसदी वोट मिले.

वर्ष 2007 में मुलायम सिंह को हराने के लिए सवर्ण जातियों ने मायावती से हाथ मिला लिया था.

निराशा

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Image caption भाजपा को यूपी विधानसभा चुनाव से काफ़ी उम्मीदें हैं

लेकिन मायावती ने पिछले पांच सालों में उन्हें निराश किया है. इसलिए भाजपा राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र को आगे करके उत्तर प्रदेश में सवर्ण ऊँची जातियों का समर्थन वापस पाने की कोशिश कर रही है.

साथ ही साथ भाजपा की कोशिश है कि वह बड़ी तादाद वाले पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय में यादव और हरिजन जातियों को किनारे करके अति दलित और अति पिछडा समुदाय को अपनी तरफ मिलाए.

भाजपा नेता ह्रदय नारायण दीक्षित पार्टी की रणनीति के बारे में बताते हैं, "भारतीय जनता पार्टी सुशासन और विकास का वादा लेकर चुनाव में उतरेगी. पार्टी की राजनाथ सिंह की सरकार ने दलित वर्ग में जो बहुत ग़रीब हैं, पिछड़े वर्गों में जो बहुत ग़रीब हैं, अति दलित और अति पिछड़े वर्गों के लिए वर्ष 2001 में अलग आरक्षण कोटे के लिए क़ानून बनाया था. उस क़ानून को बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने उलट दिया. पार्टी फिर से यह क़ानून बनाएगी, हम इस वादे के साथ भी चुनाव मैदान में जाएँगे."

बहरहाल याद दिला दें कि 2002 के विधान सभा चुनाव में राजनाथ सिंह का अति दलित और अति पिछडा ट्रंप कार्ड काम नही आया था.

सवर्ण और शहरी मध्यम वर्ग न तो मायावती को पसंद करता है और न मुलायम को. अन्ना और रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया है. ऐसे में भाजपा देश में भ्रष्टाचार विरोधी माहौल का पूरा राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है.

संजीवनी

लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर रमेश दीक्षित कहते हैं कि अन्ना के आंदोलन से भाजपा को संजीवनी मिल गई है.

वे कहते हैं, "अन्ना के आंदोलन के बाद, जो भारतीय जनता पार्टी अपने वजूद की तलाश में भटक रही थी उसे संजीवनी बूटी मिल गई है और शहरों में कम से कम भाजपा को काफ़ी लाभ हुआ है, यह दिखाई पड़ रहा है. दूसरी तरफ जो कांग्रेस पार्टी पिछले छह महीनों में एक बड़े दावेदार के रूप में उभर रही थी, वह कांग्रेस पार्टी पिछले दो महीनों में ख़ासकर अन्ना के आंदोलन के बाद से उसकी संभावनाएं क्षीण से क्षीणतर होती चली गई हैं. और यह फ़ायदा निश्चित तौर पर भाजपा को है."

लेकिन उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के सवाल पर भाजपा सरकारों का रिकॉर्ड भी बहुत अच्छा नही रहा. इसलिए सवाल यह भी है कि अन्ना के आंदोलन से भी भाजपा कितना लाभ उठा पाएगी.

ऊपर से एकजुट दिखने वाली भाजपा उत्तर प्रदेश में ज़बरदस्त गुटबाज़ी का शिकार है. उदाहरण के तौर पर राष्ट्रीय नेतृत्व ने उमा भारती को विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में तैनात किया था, लेकिन महीनों बाद भी उनकी भूमिका तय नही हो पाई.

वर्ष 2007 के चुनाव में भाजपा के क़रीब 50 नेता बसपा में शामिल होकर विधायक और मंत्री बन गए. जानकार लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास मज़बूत उम्मीदवार ही नही हैं.

वरिष्ठ पत्रकार शिवशंकर गोस्वामी का कहना है कि ऐसे में इन यात्राओं से भाजपा को कितना राजनीतिक लाभ मिलेगा, इसमें संदेह है.

उन्होंने कहा, "कांग्रेस, सपा और बसपा सबने अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए. इनके उम्मीदवार इसलिए नही घोषित हो पाए कि अंदरूनी इतना झगडा है. इनमें कलराज बनाम राजनाथ, राजनाथ बनाम सूर्य प्रताप शाही. राष्ट्रीय स्तर पर और यहाँ भी. ये आपसी झगडे छिपाने और और दबाने के लिए एक यात्रा निकाल रहे हैं. जनता का अपने समर्थकों का और मतदाताओं का ध्यान बंटाने के लिए और इस यात्रा का कोई मतलब नहीं है."

संभावना

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Image caption भाजपा में अंदरुनी खींचतान भी है

भाजपा के सहयोगी जनता दल (यू) के नेता और राजग के संयोजक शरद यादव उत्तर प्रदेश के हाल के दौरे में कह गए हैं कि उत्तर प्रदेश में खंडित जनादेश आएगा.

ऐसे में राजनीतिक पंडित अनुमान लगा रहे हैं कि सत्ता में आने के लिए एक बार फिर मायावती का दामन पकड़ सकती है.

प्रोफ़ेसर रमेश दीक्षित कहते हैं, "अंततः वही इतिहास दोहराया जाएगा, एक बार फिर यूपी में बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी, ये दो पार्टियां मिलकर सरकार बनाएंगी. आज की तारीख़ में कम से कम यही दिखाई पड़ रहा है. भविष्य में क्या होगा बाद की बात है."

बहरहाल बताते चलें कि भाजपा नेता इस बात का ज़ोरदार खंडन करते हैं कि चुनाव बाद मायावती से कोई तालमेल हो सकता है.

जो भी हो, इन यात्राओं में मिलने वाले जन समर्थन से भाजपा नेताओं को इस बात का अहसास तो हो ही जाएगा कि जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता किस हद तक बढ़ी या घटी है.

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