अब हिंदी मेड ईज़ी

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Image caption सरकारी दफ्तरों में इस्तेमाल होने वाली राजभाषा हिंदी ज़्यादातर आम लोगों के लिए अबूझ होती है

सरकारी कामकाज से संस्कृतनिष्ठ हिंदी को हटाने और रोज़मर्रा की आसान ज़बान के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए भारत सरकार ने बाकायदा एक आदेश जारी किया है.

हिंदी भारत की राजभाषा है और भारत सरकार से जुड़े हर दफ़्तर में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अधिकारीयों को नामित किया जाता है.

केंद्रीय गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग की सचिव वीणा उपाध्याय ने पिछले 26 सितंबर को लिखे पांच पन्नों के एक ख़त में सरकारी दफ्तरों से आग्रह किया है कि अपनी सरकारी लिखा पढ़ी में 'कामकाज की भाषा' का इस्तेमाल करें न कि 'साहित्यिक भाषा' का.

वीणा उपाध्याय अपने इस ख़त में साफ़ साफ़ कहा है, "राजभाषा में कठिन और कम सुने जाने वाले शब्दों का इस्तेमाल राजभाषा को अपनाने में हिचकिचाहट को बढ़ाती है."

अन्य भाषाओं के शब्द

भारत सरकार के सभी मंत्रालय और विभागों को भेजे गए इस लंबे चौड़े ख़त में दो टूक कहा गया है कि कि सरकारी काम काज में ख़ास तौर पर अंग्रेजी से अनुवाद करते वक़्त "उर्दू, अंग्रेजी और अन्य प्रांतीय भाषाओं के लोकप्रिय शब्द भी खुल कर प्रयोग में लाएँ."

इस ख़त में श्रीवास्तव ने यह आग्रह किया है कि कठिन बोझिल और गढ़ कर शब्द लिखने की जगह अन्या भाषओं के प्रचलित शब्द लिखना बेहतर होगा.

उदहारण देते हुए वीणा श्रीवास्तव ने कहा है कि प्रत्याभूति की जगह गारंटी लिखना, अनुच्छेद की जगह की जगह अंग्रेजी के शब्द पैरा का इस्तेमाल बेहतर होगा.

इसी तरह से मध्यान भोजन की जगह केवल लंच, व्यंजन सूची की जगह मेन्यू और अभिलेख की जगह रिकॉर्ड कहा जा सकता है.

पिछली मिसालें

इस ख़त में कठिन उलझी हुई भाषा के प्रति झल्लाहट साफ़ दिखाई देती है.

वीणा श्रीवास्तव ने एक पिछले मेमो का हवाला देते हुए कहा है, " इस कार्यालय के ज्ञापन में स्पष्ट लिखा गया था की सरकारी हिंदी कोई अलग किस्म की हिंदी नहीं है. यह काफ़ी नहीं है कि लिखने वाला खुद अपनी बात समझ सके कि उसमे क्या लिखा है. ज़रूरी तो यह है कि पढ़ने वाले को समझ में आ जाए कि लिखने वाला क्या कहना चाहता है."

वीणा श्रीवास्तव ने इस ख़त में ऐसे कई उदहारण आदेश संख्या सहित दिए हैं जिनमे प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक ने बार-बार यह ज़ोर दे कर कहा है कि सरकारी कामकाज में आसन शब्दों का इस्तेमाल करें.