क्या मामला है जयललिता के ख़िलाफ़

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Image caption सत्ता में आने के बाद उन्हें लगातार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ा.

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयंती जयललिता पर आरोप है कि उन्होंने 90 के दशक में अपने कार्यकाल में आय से अधिक संपत्ति जमा कर रखी थी.

जयललिता साल 1991 से 1996 तक तमिलनाड़ु की मुख्यमंत्री थीं और इसी साल मई में करुणानिधि की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानि डीएमके पार्टी को मात दे कर राज्य की सत्ता हासिल की थी.

ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी एआईएडीएमके पार्टी की अध्यक्ष जयललिता के ख़िलाफ़ ये केस 1996 में दायर किया गया था जब डीएमके सरकार ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उनके ख़िलाफ़ केस दर्ज किया था.

ये मामला डीएमके सदस्य के अनबज़घन और जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी की शिकायत के आधार पर दायर किया गया था.

जयललिता के ख़िलाफ़ दायर चार्जशीट में आरोप है कि उन्होंने अपने तीन सहयोगियों के साथ मिल कर 66 करोड़ की संपत्ति जमा की थी.

जयललिता इस पूरे मामले को झूठा करार देती आई हैं.

बंगलौर कोर्ट में स्थानान्तरण

शुरुआती दौर में ये मामला चेन्नई में दायर किया गया था, लेकिन 2003 में फ़ैसला किया गया कि इसे बंगलौर की अदालत में भेजा जाए क्योंकि डीएमके के सदस्यों ने आरोप लगाया कि गवाह अपने बयान से पलट रहे हैं.

इस मामले को बंगलौर कोर्ट में इसलिए भेजा गया था ताकि निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित की जा सके.

सुप्रीम कोर्ट ने 2004 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की उस याचिका को ख़ारिज कर दिया जिसमें उन्होंने बेनामी संपत्ति से जुड़े मामलों को बंगलौर से पांडिचेरी, आंध्र प्रदेश या केरल स्थानांतरित करने की अपील की थी.

Image caption साल 1982 में एम जी रामचंद्रन जयललिता को राजनीति की दुनिया में लेकर आए.

जयललिता बंगलौर में पेशी देने की बात को टालती रहीं, लेकिन हाल ही में कोर्ट ने उन्हें आदेश जारी कर कहा कि वे बृहस्पतिवार को कोर्ट में पेशी दें.

एआईडीएमके प्रमुख ने कर्नाटक में अपर्याप्त सुरक्षा की बात कही थी, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने जयललिता की इस दलील को ख़ारिज कर दिया.

अदालत ने जयललिता के इस अनुरोध को भी नकार दिया कि अदालत के स्थान को हवाई अड्डे के नज़दीक स्थानांतरित कर दिया जाए.

अदालत ने कहा कि हेलीपैड को तैयार कर दिया गया है और जैसे ही अदालती कार्रवाई खत्म हो, जयललिता घर वापस जा सकती हैं.

जयललिता का राजनीतिक सफ़र

साल 1982 में एमजी रामचंद्रन जयललिता को राजनीति की दुनिया में लेकर आए.

उन्होंने जयललिता को राज्यसभा का सदस्य बनाने के साथ ही पार्टी का प्रचार सचिव भी नियुक्त किया, जिसमें जयललिता का पलड़ा भारी रहा और 1991 में वे पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री चुनी गईं.

लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्हें लगातार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ा और 1996 में वो चुनाव हार गईं.

2001 में वो एक बार फिर उभरीं और दोबारा तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं.

इस बार उन्हें सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगा और कुछ समय के लिए उन्हें मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा.

साल 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें लगातार पराजय का सामना करना पड़ा, लेकिन 2011 में सत्ता उनके हाथ आ ही गई.

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