शहरों में अब ज़्यादा महिलाएं रहती हैं

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Image caption 1960 में हुई जनगणना के बाद से भारत के शहरों में महिलाओं का लिंगानुपात बेहतर होना शुरू हो गया था.

जनगणना के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ भारत के शहरी इलाक़ों में महिलाओं का लिंगानुपात अब तक का सबसे ज़्यादा हो गया है.

जनगणना 2011 के मुताबिक़ अब भारत के शहरी इलाक़ों में हर 1,000 पुरुषों के मुक़ाबले 926 महिलाएं रहती हैं.

दस वर्ष पहले, पिछली जनगणना में ये अनुपात 1,000 के मुकाबले 900 का था. इस बढ़त के लिए जानकार, शहरों में उप्लब्ध शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के बेहतर अवसर बताते हैं.

वैसे भारत के शहरी इलाक़ों के मुक़ाबले ग्रामीण इलाक़ों में लिंगानुपात बेहतर है. ग्रामीण इलाक़ों में 1,000 पुरुषों के मुक़ाबले 947 महिलाएं रहती हैं, लेकिन ये वर्ष 2001 (1000:946) से ज़्यादा बढ़ा नहीं है.

यानि पिछले 10 वर्षों में गांवों के मुक़ाबले शहरी इलाक़ों में पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं की संख्या ज़्यादा तेज़ी से बढ़ी है.

शहरों में औरतों की औसत उम्र ज़्यादा

भारत के बहुचर्चित जनसांख्यिकी विशेषज्ञ आशीष बोस के मुताबिक़ गांवों के मुक़ाबले शहरों में लड़कियों और महिलाओं की औसत उम्र मर्दों से ज़्यादा होती है.

बोस कहते हैं कि, “शहरों में लड़कियों और महिलाओं को स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं मिलती हैं और वो मर्दों से लंबी उम्र जी जाती हैं".

लेकिन जनगणना के आंकड़े ये भी बताते हैं कि गांवों के मुक़ाबले शहरी इलाक़ों में छह वर्ष तक के बच्चों का लिंगानुपात कम है.

शहरी इलाक़ों में हर 1,000 लड़कों के लिए 902 लड़कियां हैं, जबकि गांवों में ये अनुपात 1000 के मुक़ाबले 919 का है.

ऐसे में शहरों में छह वर्ष तक की बच्चियां कम लेकिन लड़कियां और महिलाएं ज़्यादा कैसे?

दरअसल आंकड़ों में देखने वाली बात ये भी है कि गांवों और शहरों दोनों में ही छोटे बच्चों का लिंगानुपात घटा है, फ़र्क इतना कि ये ग्रामीण इलाक़ों में ज़्यादा तेज़ी से घटा है.

बेहतर अवसरों के लिए पलायन

भारतीय लोक प्रशासन संस्थान में प्रोफेसर गिरीश कुमार पलायन पर विस्तृत शोध

कर चुके हैं. उनके मुताबिक़ पिछले कुछ समय में पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी रोज़गार की तलाश में या शिक्षा के बेहतर अवसर के लिए शहरी इलाक़ों का रुख़ कर रही हैं.

कुमार कहते हैं, “जो पुरुष भी शहरी इलाक़ों का रुख़ करते हैं वो अपने साथ अपने परिवारों को बसाना चाहते हैं, तो धीरे-धीरे महिला सदस्य भी शहर में ही बस जाते हैं.”

‘द हिन्दु’ अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ के मुताबिक़ ग्रामीण और शहरी इलाक़ों की कुल जनसंख्या देखी जाए तो ये साफ़ हो जाता है कि पिछले दस वर्षों में शहरों में आबादी ग्रामीण इलाक़ों के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ी से बढ़ी है और ये पलायन का सूचक है.

हालांकि गिरीश कुमार कहते हैं कि 100 दिन के रोज़गार की गारंटी वाली योजना नरेगा की वजह से पलायन में कुछ कमी आने की संभावना जताई जा रही है. पर वो ये भी मानते हैं कि इस चलन की पुष्टि के लिए अभी कोई आंकड़े मौजूद नहीं हैं.

वहीं आशीष बोस बताते हैं कि बड़े शहरों में रहने का ख़र्च बढ़ने और रोज़मर्रा का सामान महंगा होने की वजह से पलायन अब ग्रामीण इलाक़ों से छोटे शहरों की ओर भी हो रहा है.

बल्कि जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि शहरी इलाक़ों में भी सबसे कम आबादी वाले इलाक़ों में(5,000 से 1,00,000 तक आबादी), मर्दों के मुक़ाबले महिलाओं का अनुपात बेहतर है.

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