बादाम कड़वे हैं...

Image caption खारी बावली में बेचे जाने वाले बादाम दिल्ली के करावल नगर में बाल मज़दूरों द्वारा तैयार किए जाते हैं.

दिवाली पर तोहफ़े के रूप में ड्राई फ्रूट काफ़ी पसंद किए जाते हैं और इन दिनों एशिया की सबसे बड़े ड्राई फ्रूट थोक बाज़ार ‘खारी बावली’ में रौनक अलग ही होती है.

खारी बावली के विक्रेताओं का कहना है कि अमरीका से आने वाले कैलिफ़ॉर्नियन बादाम ख़रीदारों में बेहद चर्चित हैं और बाकी दिनों के मुक़ाबले दिवाली से पहले इस बादाम की बिक्री में चार गुना बढ़त देखी जा रही है.

लेकिन इन विदेशी बादामों में गहन दिलचस्पी दिखा रहे भारतीय ख़रीददारों को ये नहीं मालूम कि ये बाज़ार बाल मज़दूर की पैदाइश हैं.

सच्चाई ये है कि आम लोगों को बेहद स्वादिष्ट लगने वाले ये बादाम हज़ारों बच्चों के बचपन को कड़ुवाहट से भर रहे हैं.

दरअसल अमरीका से आने वाले इन बादाम गिरियों को उसके छिलके से निकालने का काम पूर्वी दिल्ली के करावल नगर में किया जाता है और इस काम में हज़ारों बच्चों के बचपन को पिसते हुए देखा जा सकता है.

बचपन का बलिदान

12 साल की ख़ुश्बू रोज़ सुबह आंखे खोलती है, तो बादाम का ढेर उसकी आंखों के सामने का पहला नज़ारा होता है.

बोरी भर बादाम का एक टीला बना कर, वो अपने कोमल पांवों से पहले उसे कूटती है और फिर अपने नन्हें मुलायम हाथों से सख्त बादाम के छिलके निकालती है.

ख़ुश्बू को ये काम पसंद तो नहीं, लेकिन उसकी मां कहती है कि पेट पालने के लिए उन्हें ख़ुश्बू से काम करवाना पड़ता है.

हथेलियों में होने वाले दर्द को छिपाने के मक़सद से ख़ुश्बू किलकारियां लेती हुई कहती है, “एक कट्टा बादाम तोड़ने का मुझे 60 रुपए मिलते है. बादाम तोड़ते हुए हाथ में चोट तो लग जाती है, लेकिन वो अपने आप ही ठीक हो जाती है. मुझे ये काम ठीक ही लगता है.”

ख़ुश्बू के लिए ये बादाम दिवाली पर खाए जाने वाले खास मेवे नहीं, बल्कि कमाई का एक ज़रिया है.

Image caption छुआरे फोड़ते हुए पूजा कहती है कि दिवाली जैसे त्यौहार कब आते हैं और कब चले जाते हैं, उन्हें पता ही नहीं लगता.

दिन भर उसके हाथों में चुभने वाले इन बादामों में से ख़ुश्बू का हक मुट्ठी भर बादामों पर भी नहीं है.

क्या दिवाली और कौन सी ख़ुशियां?

खुश्बू जैसे हज़ारों बच्चों की दीवाली कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में मनती है.

पूर्वी दिल्ली बच्चों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता कमला यादव कहती हैं, “जिन बच्चों के माता-पिता ठीक-ठाक कमाते हैं, वो बच्चे दिवाली पर पटाखें, मिठाइयां और सजावट का मज़ा चखते हैं. उनके पास अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने का समय भी होता है, लेकिन इन बच्चों के पास ऐसी चीज़ों के लिए वक्त ही कहां है? दिवाली के दिन भी इन बच्चों के सर पर ढेर सारा काम होता है. माल की मांग पूरी करने की प्रक्रिया में इन्हें पता ही नहीं चलता कि इनकी दिवाली कहां खो जाती है.”

करावल नगर से एक किलोमीटर की दूरी पर 15 वर्षीय पूजा पिछले पांच सालों से छुआरे कूटने का काम करती आ रही है.

जब मैंने पूजा से पूछा कि वो दिवाली कैसे मनाएंगीं, तो एक बनावटी हंसी हंसते हुए उसने कहा, “ये तो दिवाली वाला दिन ही बताएगा कि मेरी दिवाली कैसी मनेगी. शरीर में दम रहा तो दिवाली मनाउंगी.”

पूजा के इस जवाब से हैरत में आकर जब मैंने उससे पूछा कि दिवाली के त्यौहार का शरीर में दम से क्या लेना-देना, तो उसने हथोड़े की तरफ़ देखते हुए कहा, “दिन में कम से कम 10 घंटे छुआरे फोड़ते-फोड़ते मेरी कमर में बहुत तेज़ दर्द होता है. लेकिन किसे बताऊं और किसे कहूं? बस दवाई लेकर कुछ घंटों की नींद नसीब हो जाती है. उसके बाद अगली सुबह फिर वही दिनचर्या शुरू हो जाती है.”

‘ज़िद नहीं, ज़िम्मेदारी निभाते हैं’

Image caption वैल्डिंग का काम करते-करते योगेश की आंखें सूज गई हैं.

भारत में 14 साल से कम उम्र के बच्चों से मज़दूरी करवाना एक दंडनीय अपराध है. बावजूद इसके करोड़ों बच्चे ग़रीबी के दबाव में आ कर पढ़ाई छोड़ बाल मजदूरी में लग जाते हैं.

पिछली जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 1 करोड़ 30 लाख बाल मज़दूर हैं, लेकिन बच्चों के लिए काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था युनिसेफ़ की मानें तो ये आंकड़ा दोगुने से भी ज़्यादा है.

11 साल का योगेश इन्हीं आंकड़ों का ही एक हिस्सा है. योगेश को हर दिन दिवाली सा लगता है, क्योंकि वो हर दिन करीब दस घंटे आग की चिंगारी से खेलता है.

मायूस शक्ल लिए योगेश कहता है, “मैं वैल्डिंग का काम करता हूं. ये काम करते हुए मेरी आंखें सूज जाती हैं, लेकिन मजबूरी में मुझे ये सब करना पड़ता है. मैं स्कूल तो नहीं जा पाता, लेकिन मुझे किताबें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है.”

योगेश की उम्र में समृद्ध बच्चे दिवाली पर अपने मां-बाप से मिठाइयों और खिलौनों की ज़िद करते हैं, लेकिन योगेश का स्वभाव अपनी उम्र से पहले ही परिपक्व हो चुका है.

जब योगेश से मैंने पूछा कि वो दिवाली कैसे मनाएंगें, तो उसने कहा, “दिवाली पर मेरी इच्छा है कि ज़्यादा से ज़्यादा कमा सकूं और अपने मां-बाप और बहन-भाइयों के लिए कुछ कपड़े ख़रीदूं.”

भारत में योगेश जैसे कितने ही बच्चों के लिए दिवाली पटाखों की आवाज़े या मिठाइयां नहीं, बल्कि बढ़ी हुई ज़िम्मेदारी ही लेकर आती है.

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