नोएडा ज़मीन अधिग्रहण मामले में लोगों की चिंताए बरक़रार

नोएडा जम़ीन (फ़ाईल फ़ोटो)
Image caption ग्रेटर नोएडा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद भी लोगों की चिंताए ख़त्म नहीं हुई हैं.

ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के ग्रेटर नोएडा इलाक़े में निजी बिल्डर्स से ज़मीन और फ्लैट लेने वाले हज़ारों लोगों की ख़ुशियाँ स्थायी नही हैं.

शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद फ़ौरी तौर पर यह निष्कर्ष निकाला गया था कि केवल उन तीन गाँवों का अधिग्रहण रद्द हुआ है जहाँ कोई परियोजना नही थी और शेष 64 गाँवों में किसानों को बढ़ा हुआ मुआवज़ा देकर निर्माणाधीन रिहायशी कालोनियों का काम जारी रह सकता है.

लेकिन फ़ैसले को विस्तार से पढ़ने के बाद राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि हाईकोर्ट के फ़ैसले की दो महत्वपूर्ण शर्तों के चलते अब ऐसा संभव नही दिखता.

पहली बात यह कि अधिग्रहण वैध होने के बावजूद उस ज़मीन पर कोई भी परियोजना राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) बोर्ड की स्वीकृति के बिना नही चल सकती.

इसका मतलब यह भी है कि यह परियोजना एनसीआर बोर्ड के ज़रिए स्वीकृत मास्टर प्लान 2021 के अनुरूप होनी चाहिए तभी बोर्ड अनुमति देगा.

अव्वल तो उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी तक अधिकाँश मामलों में एनसीआर बोर्ड की अनुमति के लिए आवेदन नही किया है.

दूसरे यह भी कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अधिग्रहीत ज़मीनों पर निजी कंपनियों के ज़रिए बहुमंज़िली रिहायशी इमारतें , मकान , या फ़ार्म हाउस बनाने का जो निर्णय किया है वह एनसीआर द्वारा इस इलाक़े के लिए स्वीकृत मास्टर प्लान के अनुरूप नही है.

इसलिए अगर यूपी सरकार या नोएडा अथारिटी अगर आगे एनसीआर बोर्ड को आवेदन करती हैं , तो भी स्वीकृति आसान नही होगी.

दिक़्क़तें

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इन ज़मीनों का अधिग्रहण इलाक़े के औद्योगिक विकास के लिए किया था.

अधिग्रहण से प्रभावित किसानों का आरोप है कि सरकार ने निजी बिल्डर्स से सांठगांठ कर यह ज़मीने ऊँची दामों पर उन्हें दे दीं और फिर बिल्डर कई गुना मुनाफ़ा लेकर उन्हें लोगों को बेंच रहे हैं.

फ़ैसले की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने अधिग्रहीत ज़मीनों के भू-उपयोग परिवर्तन और उसे इस तरह बिल्डर्स को देने के मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं.

जब तक यह जांच पूरी नही होती एनसीआर बोर्ड को परियोजनाएं भेजी भी नही जा सकती.

आईएएस अफ़सर नीरा यादव को जेल का मामला अभी भूले नही हैं , इसलिए ऐसा नही लगता कि अब उत्तर प्रदेश का कोई अफ़सर जांच में ग्रेटर नोएडा ऑथोरिटी और उत्तर प्रदेश सरकार के सचिवालय में बैठे अधिकारियों के कारनामों को जायज़ ठहरा देगा.

आख़िरी बात यह है कि अधिग्रहण से प्रभावित अधिकाँश किसान सुप्रीम कोर्ट में अपील की तैयारी कर रहे हैं.

किसानों के एक वकील पंकज दुबे का कहना है कि गाँव वालों की ओर से अपीलें तैयार हो रही हैं.

दुबे के अनुसार हाईकोर्ट ने एक ही मामले में दो तरह का फ़ैसला दिया है. एक ओर तीन गाँवों का अधिग्रहण रद्द किया दूसरी ओर 64 गाँवों के किसानों को ज़्यादा मुआवज़ा देने की बात कहकर अधिग्रहण वैध ठहरा दिया.

दुबे के अनुसार किसानों ने कोर्ट से मुआवज़ा बढ़ाने की प्रार्थना की ही नही थी, तो फिर ऐसा आदेश देने का क्या औचित्य है. इससे पहले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी ऐसे समान मामलों में अधिग्रहण रद्द कर चुका है.

ऎसी परिस्थिति में अनुमान लगाया जा रहा कि किसानों की अपील पर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट का जजमेंट स्थगित कर देगा. और फिर सभी को सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश का इंतज़ार करना होगा.

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