साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का निधन

 शुक्रवार, 28 अक्तूबर, 2011 को 20:05 IST तक के समाचार
साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल

श्रीलाल शुक्ल ने हिंदी साहित्य को राग दरबारी जैसी कालजयी रचना दी.

हिंदी साहित्य को राग दरबारी जैसा कालजयी उपन्यास देने वाले मशहूर साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का आज लंबी बीमारी के बाद लखनऊ के एक अस्पताल में निधन हो गया. वह 86 वर्ष के थे.

उन्हें हाल ही में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

श्रीलाल शुक्ल पिछले डेढ़-दो साल से लगातार अस्वस्थ चल रहे थे. उन्हें फेफड़ों में संक्रमण हो गया था और सांस लेने में तकलीफ़ हो रही. थी. डॉक्टरों के अनुसार उन्होंने करीब पौने बारह बजे अंतिम सांस ली.

उनकी मृत्यु का समाचार सुनते ही उनके करीबी और लखनऊ के साहित्यकार उनके घर इंदिरानगर पहुंचे.

वहीं एक बातचीत में उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के अध्यक्ष और श्रीलाल शुक्ल के बचपन के दोस्त गोपाल चतुर्वेदी ने कहा कि यह केवल उनकी व्यक्तिगत क्षति नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की बहुत बड़ी क्षति है.

गोपाल चतुर्वेदी ने कहा, "श्रीलालजी एक ऐसे साहित्यकार थे जो बहुत ही अध्ययनशील और मननशील रहे और जिहोंने अपने उपन्यासों में समाज के हर वर्ग का, हर परिवर्तन का और हर स्तर का वर्णन किया. यह एक दीगर विषय है कि राग दरबारी कालजयी बन गया और लोगों ने अपने को उस तक सीमित कर लिया. अन्यथा श्रीलाल जी ने विश्रामपुर का संत से लेकर मकान और राग विराग तक ऐसी रचनाएं की हैं जो सभी हिन्दी साहित्य की बहुमूल्य निधि हैं. लखनऊ का, भारत का हिंदी साहित्य हमेशा उनके नाम से जुडा रहेगा."

तीसरे पहर शाम करीब चार बजे गोमती के किनारे भैंसा कुन्ड अथवा बैकुंठ धाम श्मशान घाट पर श्रीलाल शुक्ल का अंतिम संस्कार हुआ जहां बेटे आशुतोष ने मुखाग्नि दी. साहित्यकार, प्रोफ़ेसर, अफ़सर और पत्रकार, जिसे भी श्रीलालजी के निधन का समाचार मिला, उन्हें श्रद्धांजलि देने दौड़ा- दौड़ा भैंसाकुंड पहुंचा.

श्रीलाल जी के छोटे भाई और स्वयं भी एक अफ़सर और साहित्यकार भवानी शंकर शुक्ल ने अपने बड़े भाई के बिछुड़ने पर उन्हें श्रद्धा के साथ याद किया.

भवानीशंकर ने कहा, " मैंने बहुत मनमानी की, राजनीति में रहा. विद्यार्थी आन्दोलन में जेल गया. ये सब किया. लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी तरफ़ से कोई ग़ुस्सा या उसकी भर्त्सना या उसके विरुद्ध कोई बात नहीं कही."

जीवन

श्रीलाल शुक्ल के कुछ उपन्यास

सूनी घाटी का सूरज

राग दरबारी

मकान

पहला पड़ाव

अज्ञातवास

विश्रामपुर का संत

श्रीलाल जी का जन्म 31 दिसंबर, 1925 को लखनऊ के ही मोहनलाल गंज के पास अतरौली गाँव में हुआ था.

परिवार में लिखने पढ़ने की पुरानी परम्परा थी और श्रीलाल जी 13-14 साल की उम्र में ही संस्कृत और हिंदी में कविता- कहानी लिखने लगे थे.

पढ़-लिखकर वो प्रांतीय सिविल सेवा, पीसीएस में अफ़सर बने और बाद में पदोन्नति पाकर आईएएस बने.

श्रीलाल जी ने सरकारी सेवा में रहते हुए भी एक लेखक का धर्म बख़ूबी निभाया.

उनका पहला उपन्यास सूनी घाटी का सूरज 1957 में प्रकाशित हुआ. उनका सबसे लोकप्रिय उपन्यास राग दरबारी 1968 में छपा. राग दरबारी का पन्द्रह भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ.

1969 में उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला. लेकिन इसके बाद ज्ञानपीठ के लिए 42 साल तक इंतज़ार करना पड़ा.

इस बीच उन्हें बिरला फ़ाउन्डेशन का व्यास सम्मान, यश भारती और पद्म भूषण पुरस्कार भी मिले.

राग विराग श्रीलाल शुक्ल का आखिरी उपन्यास था. उन्होंने हिंदी साहित्य को कुल मिलाकर 25 रचनाएं दीं. इनमें मकान, पहला पड़ाव, अज्ञातवास और विश्रामपुर का संत प्रमुख हैं.

श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व बड़ा सहज था. वह हमेशा मुस्कराकर सबका स्वागत करते थे. लेकिन अपनी बात बिना लाग-लपेट कहते थे.

व्यक्तित्व की इसी ख़ूबी के चलते उन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए भी व्यवस्था पर करारी चोट करने वाली राग दरबारी जैसी रचना हिंदी साहित्य को दी.

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