अब मोटा होना नहीं रहा सेहतमंद होना

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Image caption एक अनुसंधान के मुताबिक क्षेत्र में बढ़ती आय और बढ़ती कमर के बीच संबंध देखा जा सकता है.

भारत में एक समय ऐसा था जब कुपोषण और भुखमरी के दौर में बढ़ी हुई तोंद को सेहतमंद होने का प्रतीक माना जाता था. आज बढ़ती आमदनी और बदलते खानपान के साथ-साथ न केवल मोटापा बढ़ रहा है बल्कि कई लोग इसको एक बिमारी मानकर इसका इलाज भी करवा रहे हैं.

मोटापे का इलाज़ करवाने के इच्छुक लोगों में राजनीतिक नेता भी शामिल हैं और मुंबई जैसे महानगरों में तो पुलिसकर्मियों को नियमित वर्ज़िश करने की हिदायत दी गई है.

मुंबई के एक अस्पताल में पहुँचे महाराष्ट्र के मंत्री नितिन राउत ने बीबीसी को बताया, "मैने 30 किलोग्राम वज़न कम किया है. छह बार मुझे कपड़े बदलने पड़े हैं."

ऐसा मंजर कम ही नज़र आता है जब कोई नेता अपना वज़न देख रहा हो. लेकिन महाराष्ट्र के मंत्री नितिन राउत यह बताने में कोई शर्म महसूस नहीं करते कि वज़न कम करने के लिए उन्होंने सर्जरी कराई.

उन्होंने कहा, ''इससे पहले जब मैं कैमरे के सामने आता था तो मैं इतना भारी दिखता था. अब कुछ लोग मुश्किल से ही मुझे पहचान पाते हैं."

नितिन राउत ने गैस्ट्रिक बैंड नाम की सर्जरी कराई जो प्रभावी ढंग से पेट के कम कर देती है जिससे भूख कम लगती है.

राउत का ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर मुफ़्फ़ज़ल लकड़ावाला कहते हैं कि पिछले दो साल में वह 20 से अधिक भारतीय नेताओं पर गैस्ट्रिक बैंड लगा चुके हैं.

क्यों है मोटापा

डॉक्टर लकड़ावाल का कहना है कि यह ऑपरेशन कराने वाले ज़्यादातर लोगों की समस्या नियमित समय पर भोजन का सेवन न करना, लंबे समय तक काम करना और व्यायाम की कमी हैं.

ऑपरेशन पर लगभग छह लाख रुपए का ख़र्च आता है और ये क़रीब चार घंटे लगते हैं. जब डॉक्टर लकड़ावाला ने साल 2005 में यह उपचार शुरु किया तब उन्होंने दो ऑपरेशन किए थे. अब वह एक वर्ष में 300 से अधिक ऑपरेशन करते हैं.

मरीजों की बढ़ती संख्या पर डॉक्टर लकड़ावाला ने कहा, "मुझे लगता है कि भारत कहीं न कहीं अपनी बढ़ती समृद्धि की कीमत चुका रहा है. जहां पश्चिमी देशों में 'जंक फूड' सस्ता है, उसकी तुलना में भारत में समस्या ये है कि तथाकथित ऊपरी तबके के लोग कम व्यायाम करते हैं और उनमें अधिक 'जंक फूड' खाने की प्रवृत्ति है. इसलिए उनका वज़न बढ़ रहा है और वे मोटापे से ग्रस्त हो रहे हैं."

उभरती अर्थव्यवस्थाओं में स्वास्थ्य के स्वरूप पर अनुसंधान करने वाली ओईसीडी की एक रिसर्च में क्षेत्र में बढ़ती आय और बढ़ती कमर के बीच संबंध को देखा जा सकता है.

ब्रिक देशों - ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन - में भारत में अब भी मोटापा कम है. इन देशों में लगभग पांच में से एक व्यक्ति का वज़न अधिक है.

तोंद और सेहत

हृदय रोग विशेषज्ञ और जीर्ण रोग नियंत्रण केंद्र के निदेशक डॉक्टर प्रभाकरण बताते हैं कि भारत में बढ़ते वज़न की वजह से सबसे बड़ी चिंता पेट के आसपास चरबी का जमा होना है.

लेकिन बढ़ी हुई तोंद को भारत में हमेशा से एक बड़ी समस्या के रूप में नहीं देखा गया है.

वे कहते हैं, "यहां एक सांस्कृतिक धारणा है कि वज़न अधिक होने का मतलब स्वस्थ होना है या यह समृद्धि की निशानी है. उदाहरण के लिए पंजाब में मोटे लोगों को स्वस्थ माना जाता है... ऐसी धारणा इसलिए है क्योंकि ऐतिहासिक तौर पर भारत में बड़े पैमाने पर लोगों का वज़न कम था और उन्हें वज़न बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था."

लेकिन बढ़ती कमर से निपटने के लिए सरकारी कर्मचारियों को कार्रवाई करने के लिए कहा जा रहा है.

बढ़ती 24 घंटे मीडिया संस्कृति, हृदय रोग और मधुमेह के प्रति जागरूकता लोगों की इस धारणा को बदल रही है कि ज़रूरत से ज़्यादा भारी होना स्वस्थ होना है. हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में एसी धारणा अभी भी आमतौर पर नज़र आती है.

'मोटापे से भी लड़ें पुलिसवाले'

मुंबई में अपराध से लड़ने के साथ-साथ पुलिसकर्मियों को मोटापे से लड़ने के लिए भी मजबूर किया जा रहा हैं.

शहर के बहुत से पुलिस अधिकारियों को बढ़ी हुई तोंद के साथ देखा जाता है. इसलिए कुछ साल पहले शहर में हर पुलिस स्टेशन में जिम स्थापित किया गया और पुलिस की कैंटीनों में स्वस्थ भोजन परोसा जाने लगा है.

वर्सोवा पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ इंस्पैक्टर शरद बूरसे कहते हैं, "सभी पुलिस अधिकारियों को अपने स्वास्थ्य पर काम करना होगा. अपने स्वास्थ्य और जीवन के लिए उन्हें व्यायाम के लिए समय निकालने की जरूरत है."

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के एक सर्वेक्षण के मुताबिक दक्षिणी राज्य केरल में लगभग आधे अधिकारी मोटापे से ग्रस्त थे. जबकि उत्तरी शहर चंडीगढ़ से यह खबरें थी कि वहां करीब आधे पुलिसकर्मी बहुत मोटे थे.

भारत ने लंबे समय से भूख और कुपोषण का सामना किया है और यहां मोटापे पर शोध अभी काफ़ी सीमित है.

लेकिन कई चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लिए समस्या के प्रति जागरूक होना ही इसके साथ निपटने का सही तरीका है.