बढ़ रही है बलात्कार की घटनाएँ

इमेज कॉपीरइट Jupiter Images
Image caption परिवार और समाज के दबाव की वजह से कई लड़कियां बलात्कार के मामले पुलिस में दर्ज नहीं करवा पातीं.

भारत में पिछले 40 वर्षों में बलात्कार की घटनाओं में क़रीब 800 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है.

राष्ट्रीय आपराधिक रिकॉर्ड ब्यूरो की ओर से जारी किए आंकड़ों के मुताबिक़ अन्य सभी अपराधों, जैसे हत्या, डकैती, अपहरण और दंगों के मुक़ाबले बलात्कार की घटनाओं में सबसे ज़्यादा बढ़ोत्तरी हुई है.

देश की राजधानी दिल्ली में रहने वाली हर लड़की के पास शायद छेड़छाड़ और बदतमीज़ी की एक कहानी है.

21 वर्षीय आकांक्षा बताती है, “एक लड़का बस में मुझे घूरता रहा और फिर जब मैं उतरी, तो मेरे साथ रिक्शा में बैठ गया, बोला मैं आपका दोस्त बनना चाहता हूं, मुझे कुछ समझ नहीं आया, मैंने मना किया और फिर अपने घर से दूर उतरी ताकि वो मेरा पीछा ना कर सके.”

ऐसा नहीं कि आकांक्षा अब हर वक़्त पलट कर पीछे देखती रहती हो, लेकिन सतर्क हो गई है. अब कॉलेज जाती हैं, तो मेट्रो में महिलाओं के डब्बे में सफ़र करना पसंद करती है.

अपने फोन में महिलाओं के लिए एक हेल्पलाइन का नंबर सहेज कर रखा है. समझदार हो गई है. ऐसी छोटी-छोटी कहानियां कैसे लड़कियों के जीने का ढंग ही बदल देती हैं. और कब मामूली सी लगने वाली छेड़छाड़ घिनौना रूप ले लेती है, पता नहीं चलता.

दिल्ली में काम रहे एक महिला संगठन जागोरी के सर्वेक्षण में पाया गया कि यौन शोषण समय या सुनसान रास्तों का मोहताज नहीं, दिन के किसी भी वक़्त और भीड़भाड़ वाले इलाक़ों में भी किया जाता है.

राष्ट्रीय आपराधिक रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक वर्ष 2010 में दिल्ली में बलात्कार के 414 मामले दर्ज किए गए. यानी इस शहर में रोज़ाना कम से कम एक लड़की का बलात्कार हुआ.

समाज का आईना

राष्ट्रीय आपराधिक रिकॉर्ड ब्यूरो ने बलात्कार के मामलों की जानकारी वर्ष 1971 में एकत्रित करनी शुरू की. तब ढाई हज़ार से भी कम मामले दर्ज हुए थे.

वर्ष 2010 में ये आंकड़ा बढ़कर 22,000 से भी ज़्यादा हो गया है.

महिला आंदोलनकारी कहती हैं कि बलात्कार शारीरिक हिंसा तो है ही पर साथ ही सरकारों, समुदायों और संप्रदायों की ओर से प्रभुत्व बनाने के लिए इसका इस्तेमाल बढ़ने लगा है.

लंबे समय से महिला अधिकारों के लिए काम करती आईं कल्याणी मेनन सेन का कहना है कि ये समझना ज़रूरी है कि ये चलन बदलते समाज का आईना ही है.

सेन कहती हैं कि, “कहीं ना कहीं इस बात तो और मज़बूती से जताया जा रहा है कि औरतों को उनकी जगह समझनी चाहिए और इसके लिए थोड़ी बहुत हिंसा जायज़ है और यही करन के लिए खाप पंचायत जैसी संस्थाओं को राजनीतिक पार्टियों का समर्थन भी मिला है.”

कल्याणी कहती हैं कि धार्मिक सोच का राजनीति में आना और उसे सामाजिक स्वीकृति मिलना महिलाओं के ख़िलाफ हिंसा को बढ़ावा देता है.

साथ ही वो कहती हैं कि सरकार की आर्थिक नीतियां जो छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड जैसे इलाकों में आदिवासियों के हित में नहीं हैं, प्राकृतिक संसाधनों की इस लड़ाई में सुरक्षा बल, इन समुदायों को महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन हिंसा से दबाते हैं.

इज़्ज़त का प्रतीक

कल्याणी जैसे कई आंदोलनकारियों की ऐसी सोच है और इसी वजह से कई महिलावादी संगठन और व्यक्ति साथ आए और यौन हिंसा और सत्ता के दमन ख़िलाफ एक मौर्चा तैयार किया – वुमेन अगेन्स्ट सेक्सुअल वायलेंस ऐन्ड स्टेट रिप्रेशन. इसी की सदस्य हैं वकील कमायनी बालि महाबल.

महाबल कहती हैं, “ताक़त सरकार, संप्रदाय और समुदाय ही नहीं दिखाते, महिलाओं को ख़ुद उनके परिवार ही काबू में करने की कोशिश करते हैं, औरत को इंसान नहीं बल्कि इज़्ज़त का प्रतीक समझा जाता है.”

लेकिन पुलिस अधिकारियों के मुताबिक़ बलात्कार के आंकड़ों के ऐसे किसी भी आकलन में ये ध्यान में रखना ज़रूरी है कि समय के साथ महिलाएं जागरूक हुई हैं और महिला संगठनों की मदद से बलात्कार के ज़्यादा मामले अब दर्ज किए जा रहे हैं.

लेकिन ये भी सच है कि 40 वर्षों की इस समयावधि में देश में किसी अन्य अपराध में ऐसी बढ़त नहीं देखी गई.

कमायनी के मुताबिक़ ये समस्या इससे भी भयावह है. वो कहती हैं कि इज़्ज़त से जुड़े होने की वजह से बलात्कार ऐसा अपराध है जिसे दर्ज करवाने में अक्सर महिलाएं झिझकती हैं, परिवार सहयोग नहीं देते और हिंसा करने वाले का दबाव रहता है.

ऐसे में स्थिति तभी बदलेगी जब समाज की नज़र में आदमी और औरत का समान दर्ज़ा होगा क्योंकि यौन हिंसा दरअसल ताक़त दिखाने का एक ज़रिया है.

संबंधित समाचार