'कोई चिकन मोमोज़, तो कोई चाउमिन पुकारता है'

  • 1 फरवरी 2014

कॉलेज हो या फिर कोई बाज़ार, अक्सर लोगों की नज़र ऐसे चेहरों पर जाकर टिक सी जाती है जो कुछ अलग से नज़र आते हैं, बस यहीं पर कई तरह की नस्लभेदी टिप्पणियां सुनाई देती है.

कई ऐसे शब्द है जिन्हें राजधानी दिल्ली में उन लोगों के लिए अक्सर संबोधन के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं, जो पूर्वोत्तर भारत यानी नॉर्थ ईस्ट के हैं.

पूर्वोत्तर भारत यानी असम, मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम, अरूणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, नागालैंड और सिक्किम.

घटिया मज़ाक

देखा गया है कि ये लोग अक्सर होटलों ढाबों, चाइनीज़ भोजन परोसने वाली वैन में काम करते हैं.

इसके अलावा काफ़ी संस्थाओं में छात्र-छात्राएं पढ़ाई करते हैं. पर यहाँ इन्हें अक्सर भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल काले़ज के छात्र ध्रुव कहते हैं," कई शब्द तो ऐसे है जिनसे दिन में कम से कम एक बार तो पाला पड़ता ही है, इसके अलावा कुछ और शब्द भी हैं जैसे-चिकन मोमोज़ या फिर कोई-कोई चाउमिन कह कर मज़ाक उड़ाते है."

एक छात्रा कहती हैं, लोग ये टिप्पणियाँ इसलिए कहते हैं क्योंकि उनकी आँखें छोटी और चेहरा-मोहरा आम उत्तर भारतीयों की तरह नहीं होता.

नस्लवादी रवैया

यूं तो दिल्ली में सारे भारत के लोग रहते हैं, दक्षिण भारतीयों को मद्रासी कहा जाता है, पर इसे तो क्षेत्रीय संबोधन कह दिया जाता है,

नॉर्थ ईस्ट सपोर्ट सेंटर के प्रवक्ता मधु चंद्रा कहते हैं कि ये शब्द नस्लवादी हैं, क्योंकि ये व्यक्ति के स्वरुप और चेहरे को लेकर कहे जाते हैं. दिल्ली में लगभग दो लाख नॉर्थ ईस्ट के लोग रहते हैं.

इनके साथ शारीरिक, मानसिक, रोज़गार के स्तर पर भेदभाव किया जाता है.

पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव की ये कहानी सिर्फ़ ज़ुबानी ही नही है. बल्कि जब ये किराए का मकान लेने जाते हैं तो इनसे अन्य किराएदारों की तुलना में ज़्यादा किराए की माँग की जाती है. कुछ तो इन्हें विदेशी यानी चीनी, नेपाली समझते हैं.

यही हाल उनके पहनावे, कपड़ों और भाषा को लेकर है. हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोगों का पहनावा उनसे मेल नही खाता, साथ ही भाषा के स्तर पर ये हिंदी नही बोलते इसलिए मुख्यधारा से अलग-थलग ही रहने को मजबूर होते हैं.

आसान निशाना

पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ नस्ल के आधार पर भेदभाव तो होता ही है, इनके साथ शारीरिक छेड़छाड़ की घटनाऐं भी ज़्यादा होती हैं क्योंकि लोग इन्हें आसान निशाना समझते हैं.

मणिपुर से आई छात्रा चिनेवाहो कहती हैं कि उन्होंने बहुत से जोड़ों को पार्क में या फिर अन्य जगहों पर खुले आम चुंबन करते देखा है, उनके बारे में कोई कुछ क्यों नही कहता.

मधु चंद्रा कहते हैं कि यहाँ की लड़कियों को ग़लत निगाह से देखना पूर्वोत्तर भारत के लोगों पर एक थप्पड़ है और ये सिर्फ़ दूषित मानसिकता की वजह से है.

पूर्वोत्तर भारत के लोगों को भेदभाव, नस्लवाद, हिंसक बर्ताव से बचाने के लिए मधु चंद्रा नार्थ ईस्ट सपोर्ट सेंटर नाम की एक संस्था चलाते हैं. ये संस्था तमाम शिकायतों पर पुलिसिया कार्रवाई से लेकर अन्य साधनों से पीड़ितों को मदद पहुंचाने का काम करती है.

जानकारों का कहना है कि सबसे ज़रूरी है जन चेतना और मानसिकता में बदलाव का आना, जब तक ऐसा नही होगा पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ सामाजिक समागम भी नही होगा.

(ये विशेष रिपोर्ट बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर नवंबर 2011 को प्रकाशित की जा चुकी है)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार