मौसम की तरह बदलती ज़िंदग़ी

सिंगुर के युवा

सिंगुर याद है आपको? पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले में हाइवे के किनारे बसा यह कस्बा टाटा मोटर्स की लखटकिया कार संयंत्र के लिए सुर्खियों में आया था.

लेकिन अब सिंगुर के लोगों का जीवन पहाड़ियों में पल-पल बदलने वाले मौसम के मिज़ाज की तरह हो गया है.

टाटा मोटर्स की ओर से अधिग्रहीत ज़मीन पर उद्योग लगने या ज़मीन वापस पाने की आस लगाए बैठे किसान 'कभी ख़ुशी कभी ग़म' की तर्ज पर कभी सरकार और अदालती फ़ैसले से ख़ुश हो जाते हैं तो कभी ग़म में डूब जाते हैं.

ममता बनर्जी ने जब बीती मई में सत्ता संभालने के बाद अनिच्छुक किसानों की ज़मीन लौटाने के लिए एक नया क़ानून बनाया तो लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई थी.

लेकिन उसके बाद टाटा ने उस क़ानून को अदालत में चुनौती दी तो लोग असमंजस में पड़ गए. हाई कोर्ट ने जब सरकार के पक्ष में फ़ैसला दिया तो लोगों में उम्मीद की नई किरण पैदा हुई. लेकिन टाटा ने एक बार फिर उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है.

'ख़ुद कब्ज़ा'

सिंगुर में कृषि ज़मीन रक्षा समिति के एक नेता जीवन दास कहते हैं, ''हम जानते हैं कि क़ानूनी लड़ाई के चलते हमें अपनी ज़मीन वापस मिलने में दिक्कत हो सकती है. लेकिन अब जब सरकार हमारे साथ है तो कोई दिक्कत नहीं है. अब टाटा हमें अपनी ज़मीन वापस लेने से नहीं रोक सकता.''

वे कहते हैं कि ज़रूरी हुआ तो किसान अपनी ज़मीन पर ख़ुद क़ब्ज़ा कर लेंगे. कलकत्ता हाई कोर्ट ने हालांकि इस मामले पर फ़ैसला होने तक यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है. लेकिन स्थानीय किसान अपनी ज़मीन के लिए बेताब हैं.

जीवन कहते हैं, ''हमने अपनी ज़मीन के लिए बरसों इंतज़ार किया है. कई किसान इसी ग़म में आत्महत्या कर चुके हैं. कुछ लोग ग़रीबी और अवसाद के चलते मर गए. लेकिन अब हम अनिश्चित समय तक इसका इंतज़ार नहीं कर सकते.''

सिंगुर संयंत्र के आस-पास खामोशी छाई है. हाइवे से गुज़रने वाले ट्रकों और दूसरे वाहनों से ही यह खामोशी टूटती है.

तरुण दास के पिता ने भी इस परियोजना के लिए अपनी ज़मीन दी थी. बदले में तरुण को इस संयंत्र में नौकरी मिली थी. उसने प्रशिक्षण भी लिया था. लेकिन अब वह बेरोज़गार हैं.

सिंगुर के 53 वर्षीय किसान देवेन मंडल ने इस परियोजना के लिए अपनी पाँच बीघा ज़मीन दी थी. उनको सीधे नौकरी का भरोसा मिला था. लेकिन नौकरी नहीं मिली. देवेन अब लंबे समय से बीमार चल रहे हैं.

औद्योगीकरण

Image caption जीवन दास बताते हैं कि कई किसान ज़मीन जाने के ग़म में आत्महत्या कर चुके हैं

दरअसल, सूचना तकनीक के मामले में किसी ज़माने में जो लहर बंगलौर में चली थी, औद्योगीकरण के मामले में वही लहर वाममोर्चा के शासन वाले पश्चिम बंगाल में चली.

मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने वर्ष 2006 में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद राज्य में औद्योगीकरण की प्रक्रिया तेज़ कर दी थी.

विभिन्न उद्योगों के साथ राज्य में विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईज़ेड) यानी सेज़ की स्थापना का काम भी तेज़ी से शुरू हुआ. पहले यहां एक ही सेज़ था, बाद में कई और नए प्रस्तावों को हरी झंडी दिखा दी गई.

लेकिन इनके लिए खेती की ज़मीन के अधिग्रहण से लोगों में भारी नारज़गी उभरी.

विपक्षी राजनीतिक दलों ने तो आंदोलन छेड़ा ही, खुद वाममोर्चा के घटक दल भी सेज़ के लिए खेती की ज़मीन के अधिग्रहण का सार्वजनिक तौर पर विरोध करने लगे.

ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर आंदोलन करने वाली ममता बनर्जी का कहना था कि तृणमूल कांग्रेस औद्योगीकरण के ख़िलाफ़ नहीं हैं. लेकिन इसके लिए खेती की ज़मीन का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.

दूसरी ओर, तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की दलील थी कि नैनो परियोजना से सिर्फ़ सिंगुर या हुगली ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य का चेहरा बदल जाता.

सहायता की अपील

हालांकि सिंगुर व नंदीग्राम की घटनाओं के बाद वाममोर्चा के घटक दलों व विपक्ष के दबाव में ही राज्य सरकार को कहना पड़ा कि वह आगे से ऐसी परियोजनाओं के लिए खेती के ज़मीन के अधिग्रहण से बचने का प्रयास करेगी.

वाममोर्चा की ग़लतियों से सबक लेते हुए ही ममता बनर्जी सरकार ने उद्योगों के लिए ज़मीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया से ख़ुद को अलग कर लिया है.

अपनी नई ज़मीन नीति के प्रारूप में सरकार ने साफ कर दिया है कि उद्योग लगाने के लिए निजी कंपनियों को ज़मीन का अधिग्रहण खुद करना होगा.

पहले सिंगुर समेत तमाम मामलों में पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम नामक सरकारी एजेंसी ज़मीन का अधिग्रहण कर उसे संबंधित कंपनी को सौंपती थी.

लेकिन सरकार की इस नीति पर उद्योग संगठनों ने चिंता जताई है. एसोसिएटेड चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) की पूर्वी शाखा के अध्यक्ष सुनील कानोरिया कहते हैं, ''सरकार को इस मामले में संतुलित भूमिका निभानी होगी. वह हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी रह सकती.''

ज़मीन अधिग्रहण में होने वाली दिक्कतों के चलते ही वीडियोकॉन समूह ने बंगाल से अपनी इस्पात और बिजली परियोजना को कहीं और ले जाने की इच्छा जताई है.

उसने अक्तूबर, 2007 में ही राज्य सरकार के साथ इसके लिए सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन इसके लिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है.

कंपनी ने राज्य सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप और सहायता की अपील की है. एक कार्यक्रम के सिलसिले में कोलकाता आए वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के निदेशक अनिरुद्ध धूत कहते हैं, ''अधिग्रहण के मामले में सरकार को मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए ताकि दोनों-उद्योगों और किसानों-को फायदा हो. अधिग्रहण में दिक्कतों के चलते ही परियोजना का काम आगे नहीं बढ़ रहा है.''

यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि कर्ज़ के भारी बोझ और माओवादी समस्या से जूझ रही ममता बनर्जी सरकार अब उद्योगपतियों को राज्य में निवेश के लिए आकर्षित करने का प्रयास ज़रूर कर रही है लेकिन ज़मीन अधिग्रहण के मामले में सरकार के हाथ खड़े कर लेने की वजह से निवेशक भारी असमंजस में हैं. ऐसे में सिंगुर की खाली पड़ी ज़मीन और वहां के लोगों का भविष्य क्या होगा, इस बात का अनुमान लगाना फ़िलहाल मुश्किल है.

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