'आदमखोर' नहीं था मैं :मनातु महूवार

झारखण्ड के पलामू का इलाक़ा बंधुआ मज़दूरी का गढ़ माना जाता था जहाँ बड़े बड़े ज़मींदारों के ज़ुल्म की दास्तानें आम रहीं.

यह वह इलाका था जहाँ ज़मींदारों की निजी सेनाएं हुआ करतीं थीं जो लोगों को ज़बरदस्ती बंधुआ मजदूर के रूप में काम कराती थीं

पलामू के ही मनातु के इलाके में एक ऐसे ही ज़मींदार के किस्से आम रहे हैं जिन पर कुछ साहित्यकारों नें भी रचनाएं लिखीं हैं.

इन्हें 'मनातु महूवार' यानि मनातु के मालिक और 'मनातु के आदमखोर' के नाम से जाना जाता है.

मनातु महूवार की शानोशौकत आज नहीं है और ना ही उनकी ज़मींदारी.

अब वह 82 साल के हो चुके हैं. बंधुआ मज़दूरी और ज़ुल्म की बातों को आज वो सिरे से ख़ारिज करते हैं.

मनातु का आदमखोर

लम्बा चौड़ा क़द. गठा हुआ शरीर और तेज़ निगाहें. मनातु महूवार अपने क़िले के आँगन में बैठ उन पलों को याद करते हुए बिताते हैं जो उनके जीवन का स्वर्णिम काल रहा है.

आज उनकी ज़मींदारी तो नहीं है फिर भी उनका मालिकाना हक़ 500 एकड़ से ज्यादा की ज़मीन पर है.

कभी इनका नाम पलामू के बड़े ज़मींदारों में हुआ करता था. उनके कथित ज़ुल्म की दस्तानों नें कई उपन्यासों में अपनी जगह बनाई है.

सत्तर के दशक में पलामू के इलाके में बंधुआ मुक्ति आन्दोलन शुरू किया गया था जिसके केंद्र में मनातु महूवार भी थे. बहुत कम लोगों को उनका असली नाम पता है.

बड़े गर्व के साथ वह बताते हैं "मेरा नाम महूवार जगदीश्वर जीत सिंह है. महूवार का मतलब है मालिक. यानी के मनातु का मालिक."

मगर महूवार जगदीश्वर जीत सिंह को मनातु के आदमखोर के नाम से भी जाना जाता रहा है. उन पर आरोप था कि वह बाघ पलते थे और विरोध करने वालों को बाघ के पिंजरे में डाल दिया करते थे.

मगर जगदीश्वर जीत सिंह इन आरोपों का खंडन करते हैं वह कहते हैं कि अपने ज़माने के दूसरे ज़मींदारों की तरह ही वह भी शिकार का शौक़ रखते थे. उन्हें जानवर पालने का शौक़ था. मसलन चीता, हिरन आदि.

"कुछ सरकारी अफसरों और अखबार वालों नें चीता को बाघ बना दिया. और बाघ पालने वाले को आदमखोर बना दिया. एक इंसान को उन्होंने जानवर बना दिया. यह तो बनाने वाले से पूछिए कि उन्होंने मुझे आदमखोर क्यों बनाया."

बंधुआ मजदूरों की फ़ौज

यह भी कहा जाता रहा है कि मनातु महूवार के पास बंधुआ मजदूरों की बड़ी फ़ौज थी. और बंधुआ मुक्ति आन्दोलन के बाद यह सब कुछ ख़त्म हुआ. मगर जगदीश्वर जीत सिंह ऐसा नहीं मानते. उनका कहना है कि इसका कोई प्रमाण नहीं है और यह सिर्फ़ बदनाम करने वाली बात है.

मगर यह सच है कि उनके ख़िलाफ़ आन्दोलन चला हालाँकि जगदीश्वर जीत सिंह कहते हैं कि लोगों नें बिना असलियत जाने ही उनके खिलाफ मोर्चाबंदी की.

मनातु के ही जगदीश पासवान के पुत्र का कहना था कि उनके परिवार नें मनातु माहवार के ज़ुल्म के खिलाफ लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी है.

उन्होने बताया कि मनातु महूवार के पास लठैतों की फ़ौज हुआ करती थी जिस से वह मजदूरों को घरों से डरा धमका कर खेतों में काम करने के लिए ले जाया करते थे.

मनातु महूवार ज़ुल्म के आरोपों का भी खंडन करते हैं. उनका कहना है कि अगर वह ज़ुल्म करते तो फिर उस इलाके में नहीं टिक पाते

पासवान परिवार का कहना है कि कई बार गाँव वालों नें मनातु में स्कूल खोलने की कोशिश की मगर उनका आरोप है कि हर बार महूवार के पहलवान हाथी से ज़रिये स्कूल के भवन को ध्वस्त कर दिया करते थे.

बद अच्छा बदनाम बुरा

ऐसा नहीं है कि मनातु के रहने वाले सभी लोग मनातु महूवार के ख़िलाफ़ हैं. एक बड़ा तबका ऐसा भी है जिसका मानना है कि मनातु महूवार एक अच्छे आदमी हैं जो कई सामाजिक कार्य किया करते थे.

जगदीश्वर जीत सिंह का भी मानना है कि वह बद तो नहीं थे मगर बदनाम ज्यादा हो गए.

कभी चिरागों से रौशन मनातु महूवार का क़िला आज खंडहर में तब्दील होता जा रहा है.

कहने को को उनके पास 500 एकड़ ज़मीन हैं. मगर नक्सल प्रभावित मनातु के इलाके में इनकी बहुत सारी ज़मीन पर माओवादियों नें अपना झंडा गाड दिया है. अब मनातु महूवार के पास किले की मरम्मत कराने लायक पैसे भी नहीं हैं.

आज न उनके पास चीता है और ना ही वो पुरानी शान. 82 साल के मनातु महूवार आज सिर्फ पुरानी यादों के सहारे जी रहे हैं.

मगर ग़ौर करने वाली बात यह है कि आज उन्हें किसी भी चीज़ पर कोई पछतावा नहीं है.

संबंधित समाचार