'साड्डा हक़, ऐत्थे रख'

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Image caption स्टूडेन्ट्स फॉर फ्री तिब्बत ने इस पोस्टर के ज़रिए 'रॉकस्टार' फिल्म में बदलाव किए जाने का विरोध किया है.

दोरजी सेटेन भारत में रह रहे तिब्बती मूल के नागरिक हैं. जब ‘रॉकस्टार’ फ़िल्म की शूटिंग में तिब्बती मूल के लोगों को शामिल किया गया तो उन्होंने इसे ऐतिहासिक समझा.

पहली बार किसी बॉलीवुड फ़िल्म में तिब्बत की आज़ादी की मांग करते पोस्टर और झंडे दिखाए गए. वो भी एक ऐसे गाने के बोल पर जिसका मतलब है, ‘हमारा हक़ हमें दिया जाए’ (साड्डा हक़, ऐत्थे रख़).

लेकिन फ़िल्म की रिलीज़ से पहले भारतीय सेंसर बोर्ड ने इस पर आपत्ति जताई और शुक्रवार को जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो उसमें ‘आज़ाद तिब्बत’ के पोस्टर को धुंधला कर दिया गया है.

दोरजी सेटेन ‘स्टूडेन्ट्स फ़ॉर ए फ्री तिब्बत’ संस्था के राष्ट्रीय निदेशक भी हैं. फ़िल्म की रिलीज़ से पहले वो मुंबई गए और सेंसर बोर्ड से अनुरोध किया कि गाने के चित्रण में कोई बदलाव ना किया जाए.

दोरजी ने बीबीसी को बताया, "सेंसर बोर्ड से मिलने के बाद हमें हताशा हुई, हमें लगा कि फ़ैसला करने वालों पर पड़ोसी देशों से दोस्ताना रिश्ते बनाए रखने के बारे में कुछ सरोकार हैं और कुछ दबाव हैं, लेकिन ये सही नहीं है क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जिसमें अभिव्यक्ति की आज़ादी होनी चाहिए."

इस पूरे मसले पर फ़िल्म के निर्देशक इम्तियाज़ अली ने कहा, "ये गाना हीरो के निजी ग़ुस्से और हताशा को दर्शाता है, लेकिन इसके चित्रण में तिब्बत के लोगों को इसलिए दिखाया गया है, क्योंकि वो भी गाने में अपना हक़ मांगने के जज़्बे से ख़ुद को जोड़ के देखते हैं, इससे ज़्यादा कुछ नहीं."

आत्मदाह के ज़रिए विरोध

लेकिन तिब्बती मूल के लोगों का ग़ुस्सा और हताशा एक अलग और ज़्यादा ख़तरनाक तरीक़े से भी पिछले महीनों में सामने आया है.

पिछले नौ महीनों में चीन, तिब्बत, नेपाल और भारत में 12 तिब्बती आत्मदाह का प्रयास कर चुके हैं. इनमें से छह की मौत हो गई और बाक़ी छह के बारे में पूरी जानकारी नहीं है.

चीन सरकार ने तिब्बतियों के धार्मिक नेता दलाई लामा पर तिब्बतियों को आत्मदाह के लिए उकसाने का आरोप लगाया है.

चार नवंबर को चीनी दूतावास के बाहर एक 26 वर्षीय तिब्बती नागरिक शेरेब सेडोर ने आत्मदाह का प्रयास किया. शेरेब के मुताबिक़ उन्होंने ऐसा तिब्बत में चीनी सरकार की ओर से किए जा रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन की ओर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए किया.

शेरेब फिलहाल अस्पताल में भर्ती हैं. डॉक्टरों के मुताबिक़ वो 15 से 20 फ़ीसदी जल गए हैं. मैं जब उनसे मिलने पहुंची, तो उन्होंने तिब्बत में किए जा रहे आत्मदाह के प्रयासों के सामने अपनी कोशिश को बहुत छोटा बताया.

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शेरेब ने कहा, "भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए मैं अस्पताल में हूं और मेरे प्रयास की वजह से मेरे परिवार को कोई मुश्किल नहीं हुई, लेकिन तिब्बत में आत्मदाह करनेवाले मेरे भाई जानते हैं कि वो आग लगा लें और झुलस रहे हों, तो सामने खड़ी पुलिस या सुरक्षाकर्मी खड़े तमाशा देखते रहेंगे, उनके परिवार पर यातनाएं होंगी और वो ख़ुद बच गए तो ग़ायब भी किए जा सकते हैं."

शेरेब ने कहा कि असली जोख़िम तो तिब्बत में हैं और भारत में जो उन्होंने किया वो दुनिया को एक लोकतांत्रिक और ग़ैर-लोकतांत्रिक देश में इस फ़र्क को दर्शाने के लिए किया.

तिब्बती युवा

शेरेब क़रीब चार साल तक तिब्बतियों के अंतरराष्ट्रीय संगठन तिब्बतन यूथ कांग्रेस में दिल्ली के महासचिव के पद पर रहे पर अब मानते हैं कि हर तिब्बती को अकेले ही अपनी आवाज़ उठानी होगी.

शेरेब राजधानी दिल्ली के इलाक़े मजनूँ का टीला में रहते हैं. मैं वहाँ पहुंची, तो तंग गलियों के भूल-भूलैया में मानो एक छोटे से देश को बसा पाया.

Image caption शेरेब ने चार नवंबर को चीनी दूतावास के बाहर आत्मदाह करने की कोशिश की थी.

तिब्बती खाने, पहनावे, संगीत, फ़िल्में और इबादत की जगह, सब दिखा वहाँ. तिब्बत की स्थानीय भाषा में बात करते युवा और अधेड़ और इन सबके बीच बहुत मुश्किल से मुझे केलसांग चोडन मिली.

केलसांग दिल्ली में ही पली बढ़ीं और इसी वर्ष उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बी कॉम की पढ़ाई पूरी की है.

उन्होंने मुझे बताया कि भारत में रॉकस्टार फ़िल्म और पड़ोसी देशों में तिब्बतियों के आत्मदाह की चर्चा वहां ख़ूब हो रही है.

केलसांग ने कहा, "हम एक छोटा सा समुदाय हैं और भारत में लंबे समय से रह रहे हैं. लेकिन किसी से पलट के पूछ लिया जाए, तो हमारे संघर्ष के बारे में कई लोग नहीं जानते, इसलिए ये विरोध ज़रूरी है."

लेकिन केलसांग ने ये भी कहा कि अब ये विचार भी तूल पकड़ रहा है कि तिब्बती युवा को बेहतर शिक्षा के अवसर मिलें, तो वो तिब्बत के मुद्दे को विरोध से हटकर, एक अलग स्तर पर उठा पाएंगे.

उम्मीद बाक़ी है

केलसांग की ही तरह सेरिंग चोक भी भारत में पैदा हुए और अब मजनूँ का टीला में एक ट्रैवल एजेंसी चलाते हैं.

सेरिंग कहते हैं, "जैसे ये विरोध तेज़ी पकड़ रहा है, हमें उम्मीद है कि भारत और दुनिया के बाक़ी देश भी तिब्बतियों के प्रति चीन के व्यवहार को देख पा रहे हैं, और हमारा समर्थन कर आज़ादी की हमारी उम्मीद को क़ायम रखने में मदद करेंगे."

1950 के दशक में तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा ने भारत में शरण ली और उनके साथ हज़ारों तिब्बती भी भारत आ गए.

तिब्बती मूल के लोगों का आरोप है कि चीन ने जबरन तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया और अब वहां लोग आज़ादी से नहीं रह पा रहे.

मार्च में फुन्सॉन्ग नाम के तिब्बती भिक्षु के तिब्बत में आत्मदाह करने के बाद, चीन सरकार ने वहां कई बौद्ध मठों को बंद कर दिया, सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी और अचानक सैकड़ों भिक्षु ग़ायब हो गए.

न्यूयॉर्क में अंतरराष्ट्रीय संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी चीनी सरकार को ‘ग़ायब’ तिब्बती आंदोलनकारियों को ढूंढने के लिए पर्याप्त क़दम ना उठाने के लिए फटकार लगाई है.

लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर ईस्ट-एशियन स्टडीज़ की निदेशक, प्रोफ़ेसर अलका आचार्य के मुताबिक़ ये दबाव भी आंदोलन को किसी ठोस दिशा में नहीं ले जाएगा.

उन्होंने कहा, "तिब्बत का आंदोलन कई स्तर पर और कई दिशाओं में काम करता रहा है, हाल की आत्मदाह की घटनाएं एक प्रयास भर हैं चीन सरकार पर दबाव बनाने की और तिब्बत के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय जगत की नज़र में रखने की."

वो कहती हैं कि कभी दलाई लामा का नेतृत्व तो कभी भारत से चलाई जा रही तिब्बती सरकार का, कभी युवा वर्ग का एक हिंसक आंदोलन की ओर रुझान और कभी चीन-तिब्बत की सीधी बातचीत आंदोलन का केंद्र बनती रही है.

इसलिए ये आंदोलन में ज़्यादा वेग का समय हो सकता है लेकिन निर्णायक फ़ैसले की घड़ी आने में अभी वक़्त लगेगा.

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